
भगीरथ बोले – पार्वतीनाथ, देवदेव,परात्पर,अच्युत, अनघ, पञ्चास्य, भीमास्य, रुचिरानन, ओंकारस्वरूप आपको नमस्कार है। व्याघ्राजिनधर, अनन्त, पारावारविवर्जित, पञ्चानन, महासत्त्व, महाज्ञानमय, प्रभु ! अजित, अमित, दुर्धर्ष, विश्वेश, परमेश्वर, विश्वात्मा, विश्व, भूतेश, विश्वाश्रय, जगत्पति, विश्वोपकारी, विश्वैकधाम, विश्वाश्रयाश्रय, विश्वाधार, सदानन्द, विश्वानन्द आपको नमस्कार है। शर्व, सर्वविद, अज्ञानविवर्जित, सुरोत्तम, सुरवन्द्य, सुरस्तुल्य, सुरराज, सुरोत्तम।।1-5।।
सुरपुज्य, सुरध्येय, सुरेश्वर, सुरान्तक, सुरारिमर्दक, सुरश्रेष्ठ आपको बार-बार नमस्कार है। आप शुद्ध, शुद्धबोध, शुद्धात्मा, जगतां पति, शम्भू, स्वयंभू, अत्युग्र, उग्रकर्मा, उग्रलोचन हैं। उग्रप्रभाव, अत्युग्रमर्दक, अत्युग्ररूपवान, उग्रकण्ठ, शिव, शान्त, सर्वशान्तिविधायक, सर्वार्थद, शिवाधार, निर्मित्रजित, शिवद, शिवकर्ता, शिवहन्ता, शिवेश्वर आप शिव को नमस्कार है। शिशु, शैशवयुक्त, पिङ्गकेश, जटाधर, गङ्गाधर, कपर्दी, जटाजूटविराजित।।6-10।।
जटिल, जटिलाराध्य, सर्वद, उन्मत्तमानस, उन्मत्तकेश, उन्मत्त, उन्मत्तानामधीश्वर, उन्मत्तलोचन, भीम, त्रिनेत्र, भीमलोचन, बहुनेत्र, द्विनेत्री, रक्तनेत्र, सुनेत्रक, दीर्घनेत्र, पिङ्गाक्ष, सुप्रभाक्ष्य, सुलोचन, सोमनेत्र, अग्निनेत्राख्य, सूर्यनेत्र, सुवीर्यवान, पद्माक्ष, कमलाक्ष,नीलोत्पलदलेक्षण, सुलक्षण, शूलपाणि,कपाली,कपिलेक्षण, व्याघूर्णनयन, धूत, व्याघ्रचर्माम्बरावृत्त, श्रीकण्ठ, नीलकण्ठ, शीतिकण्ठ, सुकण्ठक।।11-15।।
चंद्रचूड, चंद्रधर, चंद्रमौलि, शशाङ्कभृत, शशिकान्त, शशाङ्काभ,शशङ्काङ्कितमूर्धज, शशाङ्कवदन, वीर, वरद, वरलोचन, शरच्चंद्रसमाभास, शरदिन्दुसमप्रभ, कोटिसूर्यप्रतिकाश, चन्द्रास्य, चंद्रशेखर, अष्टमूर्ति, महामूर्त्ति, भीममूर्त्ति, भयानक, भयदाता, भयत्राता,भयहर्ता, भयोज्झित, निर्भूत, भूतवन्द्य, भूतात्मा, भूतभावन, कौपीनवासा, दुर्वासा, विवासा, कामिनीपति, कराल, कीर्तिद, वैद्य, किशोर, कामनाशन।।16-20।।
गणाध्यक्ष, खेटकधृक, खर्व, खर्वतर खग, खगारूढ़, खगाराध्य, खेचर, खेचरेश्वर, खेचरत्वप्रद, क्षोणीपति, खेचरमर्दक, गणेश्वर, गणपिता, गरिष्ठ, गण-भूपति,गुरु, गुरुतर, ज्ञेय, गंगापति, अमर्षण, गीतप्रिय, गीतरत, सुगोप्य, गोपवृन्दप, गवारुढ़, जगद्भर्ता, गोस्वामी, गोस्वरूपक, गोप्रद, गोधर, गृध्र, गरुत्मान, गोकृतासन, गोपीश, गुरुतात, गुहावासी, सुगोपित, गजारूढ़, गजास्य, गजाजिनधर, अग्रज।।26-30।।
ग्रहाध्यक्ष, ग्रहगण, दुष्टग्रहविमर्दक, गानरूपी, गानरत, प्रचण्ड, गानविह्वल, गानमत्त, गुणी, गुह्य, गुणग्रामाशय, गुण, गूढ़बुद्धि, गूढ़पादविभूषित, गोता, गोलोकवासी, गुणवान, गुणिनां, वर, हर, हरितवर्णाक्ष, मृत्यु, मृत्युञ्जय, हरि, हव्यभुक, हरिसम्पूज्य, हवि, हविर्भुजां वर, अनादि, आदि, सर्वाद्य, आदितेयवरप्रद, लोके अनन्तविक्रम, लोकानां पापहारक, गीष्पति, सद्गुणोपेत, सगुण, निर्गुण, गुणी।।31-35।।
गुणप्रीत, गुणवर, गिरिजानायक, गिरी, गौरीभर्ता, गुणाढ्य, गोश्रेष्ठासनसंस्थित, पद्मासन, पद्मनेत्र, पद्मतुष्ट, सुपद्मक, पद्मवक्त्र, पद्मकर, पद्मारुढपदाम्बुज, पद्मप्रियतम, पद्मालय, पद्मप्रकाशक, पद्मकाननसंवास, पद्मकाननभुञ्जक, पद्मकाननसंवासी, पद्मारण्यकृतालय, प्रफुलवदनोत्फुल्लकमलाक्षप्रफुल्लकृत, फुल्लेन्दीवरसन्तुष्ट, प्रफुल्लकमलासन,फुल्लाम्भोजकरोत्फुल्लमानस, पापहारक।।36-40।।
पापापहारी, पुण्यात्मा, पुण्यकीर्ति, सुपुण्यवान, पुण्य, पुण्यतम, धन्य, सुपूतात्मा,परात्मक, पुण्येश, पुण्यद, पुण्यनिरत, पुण्यभाजन, परोपकारी, पापिष्ठनाशक, पापहारक, पुरातन, पूर्वहीन, परद्रोहविवर्जित, पीवर, पीवरमुख, पीनकाय, पुरान्तक, पाशी, पशुपति, पाशहस्त, पाषाणविटपति, पलात्मक, परावेत्ता, पाशबद्धविमोचक, पशूनामधिप, पाशच्छेत्ता, पाशविभेदक, पाषाणधारी, पाषाणशयान, पाशिपूजित ।।41-45।।
पश्वारुढ़, पुष्पधनु, पुष्पवृन्दसूपूजित, पुण्डरीक, पीतवासा, पुण्डरीकाक्षवल्लभ, पानपात्रकर, पानमत्त, पानातिभूतक, पोष्टा, पोष्टवर, पूत, परित्राता, अखिलेश्वर, पुण्डरीकाक्षकर्त्ता, पुण्डरीकाक्षसेवित, पल्लवस्थ, प्रपीठस्थ, पीठभूमिनिवासक, पिता, पितामह, पार्थ, प्रसन्नताभीष्टदायक, पितृणां, प्रीतिकर्त्ता, प्रीतिद, प्रीतिभाजन, प्रीत्यात्मक, प्रीतवशी, सुप्रीत, प्रीतिकारक, प्रीतिहृत, प्रीतिरूपात्मा, प्रीतियुक्त।। 46-50।।
प्रणतार्तिहर, प्राणवल्लभ, प्राणदायक, प्राणी, प्राणस्वरूप, प्राणग्राही, सुनिर्दय, प्राणनाथ, प्रीतमना, सर्वेषां प्रपितामह, वृद्ध, प्रवृद्धरूप, प्रेत, प्रणयिनां वर, पराधीश, परं ज्योति, परनेत्र, परात्मक, पारुष्यरहित, पुत्री, पुत्रद, पुत्ररक्षक, पुत्रप्रिय, पुत्रवश्य, पुत्रवत, परिपालक, परित्राता, परावास, परचेता, परेश्वर, सर्वस्य, पति, सम्पालय, पवमान, परान्तक, पुरहा, पुरुहूत, त्रिपुरारि, पुरान्तक।।51-55।।
पुरन्दरातिसम्पूज्य, प्रधर्ष, दुष्प्रधर्षण, पटु, पटुतर, प्रौढ़, प्रपूज्य, पर्वतालय, पुलिनस्थ, पुलस्त्याख्य, पिङ्गचक्षु, प्रपन्नग, अभीरु, असिताङ्ग, चण्डरूप, सिताङ्गक, सर्वविद्याविनोद, सर्वसौख्ययुत, सुखहर्ता, सर्वसुखी, सर्वलोकैकपावन, सदावन, सारद, सुसिद्ध, शुद्धरूपक, सार, सारतर, सूर्य, सोम, सर्वप्रकाशक, सोममण्डलधारी, समुद्र, सिन्धुरूपवान, सुरज्येष्ठ, सुरश्रेष्ठ, सुरासुरनिषेवित।।56-60।।
सर्वधर्मविनिर्युक्त, सर्वलोकनमस्कृत, सर्वाचारसुत, सौर, शाक्त, परमवैष्णव, सर्वधर्मविधानज्ञ, सर्वाचारपरायण, सर्वरोगप्रशमन, सर्वरोगापहारक, प्रकृष्टात्मा, महात्मा, सर्वधर्मप्रदर्शक, सर्वसम्पद्युत, सर्वसम्पद्दानसमेक्षण, सहास्यवदन, हास्ययुक्त, प्रहसितानन, साक्षी, समक्षवक्ता, सर्वदर्शी, समस्तवित, सकलज्ञ, समर्थज्ञ, सुमना, शैवपूजित, शोकप्रशमन, शोकहन्ता, अशोच्य, शुभान्वित।।61-65।।
शैलज्ञ, शैलजानाथ, शैलनाथ, शनैश्चर, शशाङ्कसदृश-ज्योति, शशाङ्कार्धविराजित, साधुप्रिय, साधुतम, साध्वीपति, अलौकिक, शून्यरूप, शून्यदेह, शून्यस्थ, शून्यभावन, शून्यगामी, श्मशानस्थ, श्मशानाधिपति, सुवाक, शतसूर्यप्रभ, सूर्य, सूर्यदीप्त, सुरारिहा, शुभान्वित, शुभतनु, शुभबुद्धि, शुभात्मक, शुभान्विततनु, शुक्लतनु, शुक्लप्रभान्वित, सुशोक्ल, शुक्लदशन, शुक्लाभ, शुक्लमाल्यधृक, शुक्लपुष्पप्रिय, शुक्लवसन, शुक्लकेतन, शेषालंङ्करण, शेषरहित, शेषवेष्टित।।66-70।।
शेषारूढ़, शेषशायी, शशाङ्गदविराजित, सतीप्रिय, सशक, समदर्शी, समाधिमान, सत्सङ्गी, सत्प्रिय, सङ्गी, नि:सङ्गी, सङ्गवर्जित, सहिष्णु, शाश्वतैश्वर्य, सामगानरत, सामवेत्ता, साम्यतर, श्यामापति, अशेषभुक, तारिणीपति, आताम्रनयन, त्वरिताप्रिय, तारात्मक, त्वग्वसन,तरूणीरमणे रत, तृप्तिरूप, तृप्तिकर्ता, तारकारिनिषेवित, वायुकेश, भैरवेश, भवानीश, भवान्तक, भवबन्धु भवहर, भवबन्धनमोचक।।71-75।।
अभिभूत, अभिभूतात्मा, सर्वभूतप्रेमोहक, भुवनेश, भूतपूज्य, भोगमोक्षफलप्रद, दयालु, दीननाथ, दु:सह, दैत्यमर्दक, दक्षकन्यापति, दुःखनाशक, धनधान्यद, दयावान, दैवतश्रेष्ठ, देवगन्धर्वसेवित, नानायुधधर, नानापुष्पगुच्छविराजित, नानसुखप्रद, नानामूर्तिधारी, नर्तक, नित्यविज्ञानसंयुक्त, नित्यरूप, अनिल, अनल, लब्धवर्ण, लघुतर, लघुत्वपरिवर्जित, लोलाक्ष, लोकसम्पूज्य, लावण्यपरिसंयुत।।76-80।।
नपुरी, न्याससंस्थ, नागेश, नगपूजित, नारायण, नारद, नानाभरणभूषित, नगभूत, नग्नदेश, नग्न, सानन्दमानस, नमस्य, नतनाभि, नम्रमूर्धाभिवन्दित, नन्दिकेश, नन्दिपूज्य, नानानीरजमध्यग, नवीनबिल्वपत्रौघतुष्ट, नवघनद्युति, नन्द, सानन्द, आनन्दमय, आनन्दविह्वल, नालसंस्थ, शोभनस्थ, सुस्थ, सुस्थमति, स्वल्पासन, भीमरुचि, भुवनान्तकराम्बुद, आसन्न, सिकतालीन, वृषासीन।।81-85।।
वैरस्यरहित, वार्य, व्रती, व्रतपरायण, ब्राह्यय,विद्यामय, विद्याभ्यासी, विद्यापति, घण्टाकार, घोटकस्थ, घोररावघनस्वन, घूर्णचक्षु, अघूर्णात्मा, घोरहास, गभीरधी, चण्डीपति, चण्डमूर्त्ति, चण्डमुण्डी,प्रचण्डवाक, चितासंस्थ, चितावास, चितिदण्डकर, चिताभस्माभिसंलिप्त, चितानृत्यपरायण, चिताप्रमोदी, चित्साक्षी, चिन्तामणि, अचिन्तक, चतुर्वेदमय, चक्षु, चतुराननपूजित, चिरवासा, चकोराक्ष, चलन्मूर्ति, चलेक्षण।।86-90।।
चलत्कुण्डलभूषाढ्य, चलद्भूषणभूषित,चलन्नेत्र, चलत्पाद, चलन्नुपुरराजित, स्थावर, स्थिरमूर्ति, स्थावरेश, स्थिरासन, स्थापकस्थैर्यनिरत, स्थूलरूपी, स्थलालय, स्थैर्यातिप, स्थितिपर, स्थाणुरूपी,स्थलाधिप, ऐहिक, मदमत्त, महीमण्डलपूजित, महीप्रिय, मत्तरव, मीनकेतु, विमर्दक, मीनरूप, मीनसंस्थ, मृगहस्त, मृगासन, मार्गस्थ, मेखलायुक्त, मैथिलीश्वरपूजित, मिथ्याहीन, मङ्गलद, माङ्गल्य, मकरासन।।91-95।।
मत्स्यप्रिय, मधुरगी, मधुपानपरायण, मृदुवाक्यपर, सौरप्रिय, मोदान्वित, मुण्डालि, भूषण, दण्डी, उद्दण्डोज्ज्वललोचन, असाध्यसाधक,शूरसेव्य, शोकापनोदन, श्रीपति, श्रीसुसेव्य, श्रीधर, श्रीनिकेतन, श्रीमतां, श्रीस्वरूप, श्रीमान, श्रीनिलय, श्रमादिक्लेशरहित, श्रीनिवास, श्रियान्वित, श्रद्धालु, श्राद्धदेव, श्राद्ध, मधुरवाक, प्रलयाग्न्यर्कसंकाश, प्रमत्तनयनोज्ज्वल, शूरसेव्य, शोकापनोदन।।96-100।।
विश्वभूतमय, वैश्वानरनेत्र, अधिमोहकृत, लोकत्राणपर, अपारगुण, पारविवर्जित, अग्निजिह्व, द्विजास्य, विश्वास्य, सर्वभूतधृक, खेचर, खेचराधीश, सर्वग, सार्वलौकिक, सेनानीजनक, क्षुब्धाब्धिवारिक्षोभविनाशक, कपालविलसद्धस्त, कमण्डलुभृत, अर्चित, केवलात्मस्वरूप, केवलज्ञानरूपक, व्योमालयनिवासी, बृहद्व्योमस्वरूपक, अम्भोजनयनाम्भोधिशयान, पुरुषातिग, निरालम्बावलम्ब, सम्भोगानन्दरूपक।।101-105।।
योगनिद्रामय, लोकप्रमोहापहरात्मक, बृहद्वक्त्र, बृहन्नेत्र, बृहद्वाहु, बृहद्वल, बृहत्सर्पाङ्गद, दुष्टबृहद्वलविमर्दक, बृहद्भुजबलोन्मत्त,बृहत्तुण्ड, बृहद्वपु, बृहदैश्वर्ययुक्त, बृहदैश्वर्यद, बृहत्संभोगसंतुष्ट, बृहदानन्ददायक, बृहज्जटाजूटधर, बृह्नमाली, बृहद्धनु, इन्द्रियाधिष्ठित, सर्वलोकेन्द्रियविमोहकृत, सर्वेन्द्रियप्रवृत्तिकृत, सर्वेन्द्रियनिवृत्तिकृत, प्रवृत्तिनायक, सर्वविपत्तिपरिनाशक।।106-110।।
प्रवृत्तिमार्गनेता, स्वतन्त्रेच्छामय, सत्प्रवृत्तिरत, दयानन्दशिवाधर, क्षितिरूप,तोयरूपी, विश्वतृप्तिकर, तर्प, तर्पणसम्प्रीत, तर्पक, तर्पणात्मक, तृप्तिकारणभूत, सर्वतृप्तिप्रसाधक, अभेदाभेदकोच्छिद्यच्छेदक, अछेद्य, अछिन्नधन्वा, अच्छिन्नेषु, अच्छिन्नध्वजवाहन, अधृष्ट, समधृष्टास्त्र, समधृष्ट्यबलोन्नत, चित्रयोधी, चित्रकर्मा, विश्वसंकर्षक, भक्तानामीप्सितकर, सर्वेप्सितफलप्रद।।111-115।।
वाञ्छिताभीष्टफलद, भिन्नज्ञानप्रवर्तक, बोधनात्मा, बोधनार्थातिग, सर्वप्रबोधकृत, त्रिजट, एकजटिल, चलज्जटभयानक, जटाटीर, जटाजूटस्पृष्टावरवच, षाणमातुरस्य जनक, शक्तिप्रहरतां वर, अनर्घास्त्रप्रहारी, अनर्घधन्वा, महार्घ्यपात, योनिमण्डलमध्यस्थ, मुखयोनि, अजृम्भन, महाद्रिसदृश, श्वेत, श्वेतपुष्पस्रगन्वित, मकरन्दप्रिय, मासर्तुहायनात्मक, नानापुष्पप्रसू, नानापुष्पैरर्चितगात्रक।।116-120।।
षडङ्गयोगनिरत, सदायोगार्द्रमानस, सुरासुरनिषेव्याड़घ्रि, विलसत्पादपङ्कज, सुप्रकाशितवक्त्राब्ज, सितेतरगलोज्ज्वल, वैनतेयसमारुढ़, शरदिन्दुसहस्त्रवत, तेजोभि, जाज्वल्यमान, ज्वालापुञ्ज, यम, प्रज्वलद्विद्युदाभ, साट्टहासभयंकर, प्रलयानलरूपी, प्रलयाग्निरुचि, जगतामेकपुरुष, जगतां प्रलयात्मक।।121-124।।
जगद्योने ! जगन्नाथ ! आपको नमस्कार है, आप मुझ पर प्रसन्न होइये।।125।।
श्रीमहादेवजी बोले – राजा भगीरथ के द्वारा इस प्रकार एक हजार नामों से स्तुति करने पर अत्यन्त प्रसन्न मुखकमलवाले भगवान् शंकर उनके समक्ष प्रकट हो गए।।126।। देवताओं के एकमात्र स्वामी, पञ्चानन, श्वेतकान्तियुक्त, वृष पर आरूढ़, सर्पों के बाजूबंद से सम्पन्न, प्रसन्न भगवान् शिव को देखकर राजाओं में श्रेष्ठ महाराज भगीरथ नाचने लगे और कहने लगे – परमेश्वर ! आज मेरी तपस्या, होम और मानवजन्म – ये सभी सुख के साधन सफल हो गए; क्योंकि आप परमेश्वर का मैं अपने नेत्रों से दर्शन कर रहा हूँ।।127-128।।
इस पृथ्वी पर अथवा स्वर्ग में मेरे समान कोई दूसरा नहीं हैं; क्योंकि मैं आपका दर्शन कर रहा हूँ। आप परात्पर, पूर्णमय, निर्विकार हैं तथा देवता और असुरों के लिए भी आपका दर्शन दुर्लभ है।।129।। तदनन्तर शरणागतों की पीड़ा का हरण करने वाले भगवान् महेश्वर ने ऐसा कहते हुए भगीरथ से कहा – पुत्र ! तुम्हारे मन में कौन-सी अभिलाषा है, उसे माँगों। मैं वह तुम्हें दूंगा।।130।। उन्होंने कहा कि पूर्वकाल में महाराज सगर के महाबलशाली पुत्र, देवताओं के समान पराक्रमी मेरे पूर्व वंशज कपिलमुनि के शाप से पाताल में भस्मीभूत हो गये हैं। उन्हीं लोगों के उद्धार की इच्छा से मैं गंगा को पृथ्वी पर ले जाना चाहता हूँ। वे तो आपकी परम शक्ति हैं इसलिए वे आपकी आज्ञा के बिना पृथ्वी पर नहीं जा रही हैं।।131-132।। मैं यह चाहता हूँ कि महावेगवती महानदी महेश्वरी गंगा पृथ्वी पर आकर उस पाताल-विवर में प्रवेश कर महाराजा सगर के सभी पुत्रों को पवित्र करें।।133।।
ऐसा सुनकर परमेश्वर भगवान् शंकर ने राजाओं से श्रेष्ठ भगीरथ से कहा कि आप यह जानिये कि मेरी कृपा से आप का यह मनोरथ अविलम्ब ही पूर्ण होगा।।134।। राजन ! जो मानव इस स्तोत्र से भक्तिपूर्वक मेरा स्तवन करेंगे, मेरी कृपा से निश्चित ही उनके सभी मनोरथ पूर्ण होंगे।।135।।
श्रीमहादेवजी बोले – प्रसन्नमनवाले राजा भगीरथ ने ऐसा वरदान प्राप्त कर भगवान् शंकर को दंडवत प्रणाम कर कहा कि आपकी कृपा से मैं धन्य हो गया।।136।। महामते ! मुनिश्रेष्ठ ! तब भगवन शंकर क्षणभर में ही अंतर्धान हो गये और राजा भगीरथ भी पूर्णमनोरथ हो गये।।137।। जो मनुष्य राजा भगीरथ के द्वारा किये गये इस सहस्त्रनाम वाले स्तोत्र का परम भक्ति के साथ पाठ करता है, वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। नारद ! इस संसार में उसे कहीं भी दुःख नहीं होता और भगवान् शंकर की कृपा से उसे परम ऐश्वर्य प्राप्त होता है।138-139।।
जो व्यक्ति महान विपत्ति में तथा कठिन भय की स्थिति में समस्त मंगलों की वृद्धि करने वाले, महाभय को दूर करने वाले, सभी प्रकार की सुख-संपत्ति को देने वाले भगवान् शम्भु के सहस्त्रनाम संज्ञक इस उत्तम स्तोत्र का पाठ करता है, वह महादेव जी की कृपा से महाभय से मुक्त हो जाता है।।140-141।। मुने ! अकाल पड़ने पर, लोगों के पीड़ित होने पर अथवा देश में उपद्रव होने पर धूप-दीप आदि उपचारों से भगवान् शंकर की पूजा कर जो परम भक्ति से इस सहस्त्रनाम स्तोत्र का पाठ करता है, उसके देश में न दुर्भिक्ष रहता है न लोगों को कष्ट होता है और न ही अन्य कोई उपद्रव ही होता है तथा बादल भी यथासमय वृष्टि करते हैं, यह सुनिश्चित है।।142-144।। मुने ! जिस स्थान पर सभी पापों को नष्ट करने वाले इस स्तोत्र का पाठ किया जाता है, वहाँ की भूमि निश्चितरूप से सभी धान्यों से संपन्न रहती है। वहाँ के लोग कभी भी दुष्ट बुद्धि वाले नहीं होते और वहाँ के प्राणियों की अकालमृत्यु नहीं होती।।145-146।।
जिस देश में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को पार्थिवलिंग में भगवान् महेश्वर की भक्तिपूर्वक पूजा करके इस उत्तम स्तोत्र का पाठ किया जाता है, देवाधिदेव् भगवान् शंकर की कृपा से वहाँ के हिंसक जंतु भी हिंसाप्रवृत्ति का परित्याग कर देते हैं, वे देश धन्य हैं तथा वहाँ की जनता भी धन्य है।।147-148।। जो व्यक्ति भगवान् शंकर के अत्यन्त सुखदायक इस सहस्त्रनाम स्तोत्र का पाठ करता है, उसे पूर्वजन्म की प्राप्ति नहीं होती। वह वायु के समान बलवान, कुबेर के समान धनवान तथा कामदेव के समान रूपवान होकर निश्चय ही पृथ्वी पर विहार करता है। वह अनुग्रह तथा निग्रह (नियंत्रण) – में समर्थ होकर देवता के समान विचरण करता है। गंगा, कुरुक्षेत्र अथवा प्रयाग में भगवान् शंकर की पूजा करके जो मनुष्य इस सहस्रनामस्तोत्र का पाठ करता है, वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है।।149-151।।
मुनिश्रेष्ठ ! जो व्यक्ति काशी में इस परम मङ्गलदायक स्तोत्र का पाठ करता है, उसके पुण्य के विषय में मैं आपसे क्या कहूँ। इस स्तोत्र के प्रभाव से वह मानव जीते-जी भगवान् महेश्वरत्व को प्राप्त हो जाता है तथा अंत में मुक्ति उसके हाथ में स्थित रहती है।।152-153।। जो नरश्रेष्ठ बिल्ववृक्ष के मूल के पास बैठकर इस स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करता है, उसे देवाधिदेव भगवान शंकर के प्रसाद से सालोक्यमुक्ति प्राप्त होती है।। 154।। जो मनुष्य सभी पापों को दूर करने वाले इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह महापाप से मुक्त हो जाता है, यह मैं आपसे सच-सच कहता हूँ। उसको न ग्रहों की पीड़ा होती है, न अकालमृत्यु का भय रहता है, न उससे राजा लोग द्वेष करते हैं और न ही उसे रोग का भय रहता है।।155-156।।
महामते ! जो मनुष्य सर्वदेवमय, पूर्णस्वरूप, रजत के पर्वत के समान प्रभा वाले, खिले हुए कमल के समान मुखवाले, सुंदररूप से सम्पन्न, जटाजूट से देदीप्यमान, कालकूट से सुशोभित विग्रहवाले, दक्षिण तथा वामहस्त में क्रमश: त्रिशूल एवं डमरू धारण करने वाले, व्याघ्रचर्माम्बरधारी, शांतस्वरूप और तीनो लोकों को मोहित करने वाले वृषध्वज देवाधिदेव, सनातन भगवान् शिव का अपने ह्रदय में ध्यान करके तथा ह्रदय में उनकी भावना करते हुये भक्तिपूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह ऐहिक श्रेष्ठ भोगों को भोगकर परलोक में भगवान् शिव के सारूप्य मोक्ष को प्राप्त करता है। आपसे और अधिक क्या कहूँ।।157-161।।
मुने ! वहीँ जो अन्य मनुष्य उत्तम भक्ति से युक्त होकर मुझे परम प्रसन्न करने वाले इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह निश्चय ही कठिन संसार को पाप से मुक्त करके पवित्र कर देता है।।162।।
।। इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अंतर्गत श्रीशिव-नारद-संवाद में गंगा के आगमनोपाख्यान में ‘भगीरथमुखनिर्गतशिवसहस्त्रनामकथन’ नामक सतासठवां अध्याय पूर्ण हुआ।।
