कार्तिक माह की पाँच की एक कहानी

कार्तिक माह में बहुत सी कहानियाँ कही जाती हैं लेकिन अब जो कहानी बताई जा रही है वह एक ही कहानी की जाती है. एक ब्राह्मण और ब्राह्मणी थे, वो सात कोस दूर गंगा जमुना स्नान करने जाते थे. रोज इतनी दूर आने-जाने से ब्राह्मणी थक जाती थी. एक दिन ब्राह्मणी कहती है कि कोई…

मीनाक्षीपंचरत्नम्

उद्यद्भानुसहस्त्रकोटिसदृशां केयूरहारोज्ज्वलां विम्बोष्ठीं स्मितदन्तपड़्क्तिरुचिरां पीताम्बरालड़्कृताम्। विष्णुब्रह्मसुरेन्द्रसेवितपदां    तत्त्वस्वरूपां    शिवां मीनाक्षीं प्रणतोSस्मि सन्ततमहं कारुण्यवारांनिधिम्।।1।।   मुक्ताहारलसत्किरीटरुचिरां पूर्णेन्दुवक्त्रप्रभां शिण्जन्नूपुरकिंकिणीमणिधरां      पद्मप्रभाभासुराम्। सर्वाभीष्टफलप्रदां गिरिसुतां वाणिरमासेवितां। मीनाक्षीं0।।2।।   श्रीविद्यां शिववामभागनिलयां  ह्रींकारमन्त्रोज्ज्वलां श्रीचक्रांकितबिन्दुमध्यवसतिं  श्रीमत्सभानायिकाम्। श्रीमत्षण्मुखविघ्नराजजननीं   श्रीमज्जगन्मोहिनीं। मीनाक्षीं0।।3।।   श्रीमत्सुन्दरनायिकां   भयहरां   ज्ञानप्रदां    निर्मलां श्यामाभां  कमलासनार्चितपदां  नारायणस्यानुजाम्। वीणावेणुमृदंगवाद्यरसिकां       नानाविधामम्बिकां। मीनाक्षीं।।4।।   नानायोगिमुनीन्द्रहृत्सुवसतिं        नानार्थसिद्धिप्रदां नानापुष्पविराजिताड़्घ्रियुगलां    नारायणेनार्चिताम्। नादब्रह्ममयीं परात्परतरां नानार्थतत्वात्मिकां। मीनाक्षीं0।।5।।   इति श्रीमच्छंकराचार्यकृतं मीनाक्षीपंचरत्नम सम्पूर्णम्।

शिवमानस पूजा

रत्नै: कल्पितमासनं हिमजलै: स्नानं च दिव्याम्बरं नानारत्नविभूषितं   मृगमदामोदांकितं     चन्दनम्। जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं   पुष्पं   च   धूपं   तथा दीपं  देव  दयानिधे  पशुपते हृत्कल्पितं  गृह्यताम्।।1।।   अर्थ – हे दयानिधे! हे पशुपते! हे देव! यह रत्ननिर्मित सिंहासन, शीतल जल से स्नान, नाना रत्नावलिविभूषित दिव्य वस्त्र, कस्तूरिकागन्धसमन्वित चन्दन, जूही, चम्पा और बिल्वपत्र से रचित पुष्पांजलि तथा धूप और दीप यह सब…

तुलसीस्तोत्रम्

जगद्धात्रि   नमस्तुभ्यं   विष्णोश्च  प्रियवल्लभे। यतो  ब्रह्मादयो  देवा:  सृष्टिस्थित्यन्तकारिण:।।1।।   नमस्तुलसि  कल्याणि   नमो  विष्णुप्रिये  शुभे। नमो    मोक्षप्रदे    देवि   नम:   सम्पत्प्रदायिके।।2।।   तुलसी पातु  मां नित्यं सर्वापद्भ्योSपि  सर्वदा। कीर्तितापि  स्मृता  वापि  पवित्रयति  मानवम्।।3।।   नमामि   शिरसा   देवीं   तुलसीं  विलसत्तनुम्। यां दृष्ट्वा पापिनो मर्त्या मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषात्।।4।।   तुलस्या     रक्षितं    सर्वं    जगदेतच्चराचरम्। या  विनिहन्ति पापानि दृष्ट्वा वा पापिभिर्नरै:।।5।।  …

श्रीमदाद्यशंकराचार्यकृत – श्रीहनुमत्पंचरत्न स्तोत्रम्

इस स्तोत्र के जाप से पूर्व हनुमान जी के चित्र का इंतजाम कर लेना चाहिए क्योंकि उनके चित्र अथवा मूर्त्ति के सामने दीया जलाकर ही पाठ किया जाना चाहिए. स्वच्छ आसन ग्रहण कर के हनुमान जी का षोडशोपचार पूजन करना चाहिए. इस स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से व्यक्ति के सारे मनोरथ पूर्ण होते हैं….

तुलसीदासकृत हनुमानाष्टक

तत: स तुलसीदास: सस्मार रघुनन्दनं । हनुमन्तं तत्पुरस्तात् तुष्टाव भक्त रक्षणं ।।1।।   धनुर्वाणो धरोवीर: सीता लक्ष्मण संयुत: । रामचन्द्र सहायो मां किं करिष्यत्ययं मम ।।2।।   हनुमान् अंजनीसूनुर्वायुपुत्र महाबल: । महालाड्गूल चिक्षपेनिहताखिल राक्षस: ।।3।।   श्रीरामहृदयानन्द विपत्तौ शरणं तव । लक्ष्मणो निहते भूमौ नीत्वा द्रोणचलं यतम्।।4।।   यथा जीवितवानद्य तां शक्तिं प्रच्चटी कुरु ।…

श्रीशनि व शनिभार्या स्तोत्र

  श्रीशनि एवं शनिभार्या स्तोत्र एक दुर्लभ पाठ माना गया है, शनि के अन्य स्तोत्रों के साथ यदि इस दुर्लभ स्तोत्र का पाठ भी किया जाए तो खोया हुआ साम्राज्य भी पुन: प्राप्त किया जा सकता है. राजा नल ने इस श्रीशनि एवं शनिभार्या स्तोत्र का नियमित रुप से पाठ किया और अपना छीना हुआ…

शनि कवच

शनि ग्रह की पीड़ा से बचने के लिए अनेकानेक मंत्र जाप, पाठ आदि शास्त्रों में दिए गए हैं. शनि ग्रह के मंत्र भी कई प्रकार हैं और कवच का उल्लेख भी मिलता है. युद्ध क्षेत्र में जाने से पूर्व सिपाही अपने शरीर पर एक लोहे का कवच धारण करता था ताकि दुश्मनों के वार से…

श्रीशनि वज्रपंजर कवच

आधुनिक समय में हर व्यक्ति शनि के नाम से भयभीत रहता है. इसका कारण शनि के विषय में फैली गलत भ्राँतियाँ भी हैं. शनि ग्रह किसी व्यक्ति को कैसे फल देगा, ये जन्म कुंडली में शनि की स्थिति तथा योगों पर निर्भर करता है. कई बार योगकारी होते भी अपनी दशा/अन्तर्दशा में शनि पूरे फल…

अथ अर्गला स्तोत्रम्

नमश्चण्डिकायै नम: मार्कण्डेयजी ककते हैं – जयन्ती मंगला, काली, भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा धात्री, स्वाहा और स्वधा इन नामों से प्रसिद्ध देवी! तुम्हें मैं नमस्कार करता हूँ, हे देवी! तुम्हारी जय हो। प्राणियों के सम्पूर्ण दुख हरने वाली तथा सब में व्याप्त रहने वाली देवी! तुम्हारी जय हो, कालरात्रि तुम्हें नमस्कार है, मधु और…

अथ देव्या कवचम

महर्षि मार्कण्डेयजी बोले – हे पितामह! संसार में जो गुप्त हो और जो मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करता हो और जो आपने आज तक किसी को बताया ना हो, वह कवच मुझे बताइए। श्री ब्रह्माजी कहने लगे – अत्यन्त गुप्त व सब प्राणियों की भलाई करने वाला कवच मुझसे सुनो, प्रथम शैलपुत्री, दूसरी…

कार्तिक माह में पंच भीखू व्रत

कार्तिक माह में सुबह पाँच दिन तक पंच भीखू की पूजा की जाती है. इसमें एकादशी व द्वादशी का व्रत करते हैं, त्रयोदशी को भोजन ग्रहण करते हैं फिर चतुर्दशी व पूर्णिमा का व्रत कर के पूर्णिमा के दिन पाँच वस्तुएँ ब्राह्मणी को दान करते हैं. इस प्रकार चार साल तक कार्तिक के शुक्ल पक्ष…