पीपल वृक्ष का महत्व

पद्मपुराण के अनुसार पीपल का वृक्ष भगवान विष्णु का रुप है. इसलिए इसे धार्मिक क्षेत्र में श्रेष्ठ देव वृक्ष की पदवी मिली और इसका विधि विधान से पूजन आरंभ हुआ. हिन्दू धर्म में अनेक अवसरों पर पीपल की पूजा करने का विधान है. मान्यता है कि सोमवती अमावस्या के दिन पीपल के वृक्ष में साक्षात…

तुलसीदास जी कृत हनुमद्बन्दीमोचन

दोहा वीर बखानौ पवनसुत, जानत सकल जहान। धन्य-धन्य अंजनितनय, संकट हर हनुमान।।   चौपाई जय जय जय हनुमान अड़ंगी । महावीर विक्रम बजरंगी।। जय कपीश जय पवनकुमारा । जय जगवन्दन शील अगारा।। जय उद्योत अमल अविकारी । अरिमर्दन जय जय गिरिधारी।। अंजनिउदर जन्म तुम लीन्हा । जय जैकार देवतन कीन्हा।। बजी दुन्दुभी गगन गँभीरा ।…

शिव 108 नामावली

1) ऊँ श्री सर्वभूतहराय नम: 2) ऊँ श्री शास्वताय नम: 3) ऊँ श्री शमशानवासिने नम: 4) ऊँ श्री तपस्वने नम: 5) ऊँ श्री महारुपाय नम: 6) ऊँ श्री वृषरुपाय नम: 7) ऊँ श्री स्वयम्भूभूताय नम: 8) ऊँ श्री विशालाक्षाय नम: 9) ऊँ श्री घोरतपसे नम: 10) ऊँ श्री महावलाय नम: 11) ऊँ श्री नीलकण्ठाय नम:…

श्री गणपति 108 नामावली

1) ऊँ श्री गणेश्वराय नम: 2) ऊँ श्री गणाध्यक्षाय नम: 3) ऊँ श्री गणप्रियाय नम: 4) ऊँ श्री गणनाथाय नम: 5) ऊँ श्री गणेशाय नम: 6) ऊँ श्री गणपतये नम: 7) ऊँ श्री गणेधीशाय नम: 8) ऊँ श्री गणप्रभवे नम: 9) ऊँ श्री गणस्तुताय नम: 10) ऊँ श्री गुणाप्रियाय नम: 11) ऊँ श्री गौणशरीराय नम:…

सप्तश्लोकी गीता

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। य: प्रयाति त्यजन्देह स याति परमां गतिम्।।1।।   स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघा:।।2।।   सर्वत:पाणिपादं तत्सर्वतोSक्षिशिरोमुखम् । सर्वत:श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ।।3।।   कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्य: । सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं  तमस: परस्तान्।।4।।   ऊर्ध्वमूलमध:शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।5।।   सर्वस्य चहं…

तुलसीदासकृत हनुमानाष्टक

तत: स तुलसीदास: सस्मार रघुनन्दनं । हनुमन्तं तत्पुरस्तात् तुष्टाव भक्त रक्षणं ।।1।।   धनुर्वाणो धरोवीर: सीता लक्ष्मण संयुत: । रामचन्द्र सहायो मां किं करिष्यत्ययं मम ।।2।।   हनुमान् अंजनीसूनुर्वायुपुत्र महाबल: । महालाड्गूल चिक्षपेनिहताखिल राक्षस: ।।3।।   श्रीरामहृदयानन्द विपत्तौ शरणं तव । लक्ष्मणो निहते भूमौ नीत्वा द्रोणचलं यतम्।।4।।   यथा जीवितवानद्य तां शक्तिं प्रच्चटी कुरु ।…

दशरथकृत शनि स्तवन

  शनि की पीड़ा से मुक्ति के अकसर लिए दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ करने का परामर्श दिया जाता है. यदि इस शनि स्तोत्र के साथ दशरथकृत शनि स्तवन का पाठ भी किया जाए तो अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है. यहाँ स्तवन का तात्पर्य – अत्यन्त विनम्र भाव से पूरी तरह समर्पित होकर शनि देव…

शनि कवच

शनि ग्रह की पीड़ा से बचने के लिए अनेकानेक मंत्र जाप, पाठ आदि शास्त्रों में दिए गए हैं. शनि ग्रह के मंत्र भी कई प्रकार हैं और कवच का उल्लेख भी मिलता है. युद्ध क्षेत्र में जाने से पूर्व सिपाही अपने शरीर पर एक लोहे का कवच धारण करता था ताकि दुश्मनों के वार से…

श्रीगणपतिनमस्कार:

विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय। नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषितायगौरीसुताय गणनाय नमो नमस्ते।।1।। गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्।।2।। एकदन्तं महाकायं लम्बोदरगजाननम्। विघ्ननाशकरं देवं हेरम्बं प्रणमाम्यहम।।3।। रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष रक्ष त्रैलोक्यरक्षक। भक्तानामभयं कर्ता त्राता भव भवार्णवात्।।4।। ।।इति श्रीगणपतिनमस्कार: सम्पूर्ण:।।

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ

ऊँ नमश्चण्डिकायै नम: अथ श्री दुर्गा सप्तशती भाषा पहला अध्याय – Chapter First – Durga Saptashati (महर्षि ऋषि का राजा सुरथ और समाधि को देवी की महिमा बताना) महर्षि मार्कण्डेय बोले – सूर्य के पुत्र सावर्णि की उत्पत्ति की कथा विस्तारपूर्वक कहता हूँ सुनो, सावर्णि महामाया की कृपा से जिस प्रकार मन्वन्तर के स्वामी हुए,…

हनुमानबाहुक

  संवत 1664 विक्रमाब्द के लगभग गोस्वामी तुलसीदास जी की बाहुओं में वात व्याधि की गहरी पीड़ा उत्पन्न हुई. फोड़े-फुंसियों के कारण सारा शरीर वेदना का स्थान बन गया. हर प्रकार की औषधि की गई, यंत्र, मंत्र तथा टोटके आदि के भी उपाय किए गए लेकिन रोग कम नहीं हुआ उलटे और बढ़ने लगा. दिनोंदिन…

श्रीकनकधारास्तोत्रम् – Kanakdhara Stotram – 22 Slokas in Praise of Goddess Lakshmi

अंगं हरे: पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृंगांगनेव मुकुलाभरणं तमालम् अंगीकृताखिलविभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया: ।।1।।   मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारे: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि । माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवाया:।।2।।   विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्ष – मानन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोsपि। ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्ध – मिन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिराया:।।3।।   आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्द – मानन्दकन्दमनिमेषमनंगतन्त्रम् आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजंगशयांनाया:।।4।।   बाह्वन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभे या हारावलीव हरिनीलमयी…