भगवान नर-नारायण की कथा

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भगवान विष्णु ने धर्म की पत्नी रुचि के माध्यम से नर और नारायण नाम के दो ऋषियों के रूप में अवतार लिया। वे जन्म से तपोमूर्ति थे अत: जन्म लेते ही बदरी वन में तपस्या करने के लिए चले गये। उनकी तपस्या से ही संसार में सुख और शान्ति का विस्तार होता है। बहुत से ऋषि-मुनियों ने उनसे उपदेश ग्रहण करके अपने जीवन को धन्य बनाया। आज भी भगवान नर-नारायण निरन्तर तपस्या में रत रहते हैं। इन्होंने ही द्वापर में श्रीकृष्ण और अर्जुन के रुप में अवतार लेकर पृथ्वी का भार हरण किया था।

एक बार इनकी उग्र तपस्या को देखकर देवराज इन्द्र ने सोचा कि ये तप के द्वारा मेरे इन्द्रासन को लेना चाहते हैं, अत: उन्होंने इनकी तपस्या को भंग करने के लिए कामदेव, वसन्त तथा अपसराओं को भेजा। उन्होंने जाकर भगवान नर-नारायण को अपनी नाना प्रकार की कलाओं के द्वारा तपस्या से अलग करने का प्रयास किया, किंतु उनके ऊपर कामदेव तथा उनके सहयोगियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। कामदेव, वसन्त तथा अप्सराएँ शाप के भय से थर-थर काँपने लगे। उनकी यह दशा देखकर भगवान नर-नारायण ने कहा – “तुम लोग जरा भी मत डरो, हम प्रेम और प्रसन्नता से तुम लोगों का स्वागत करते हैं।”

भगवान नर-नारायण की अभय देने वाली वाणी को सुनकर काम अपने सहयोगियों के साथ अत्यन्त लज्जित हुआ। उसने उनकी स्तुति करते हुए कहा – “प्रभो! आप निर्विकार परम तत्त्व हैं। बड़े-बड़े आत्मज्ञानी पुरुष आपके चरण-कमलों की सेवा के प्रभाव से काम विजयी हो जाते हैं। देवताओं का तो स्वभाव ही है कि जब कोई तपस्या करके ऊपर उठना चाहता है तब वे उसके तप में विघ्न उपस्थित करते हैं। काम पर विजय प्राप्त करके भी जिन्हें क्रोध आ जाता है, उनकी तपस्या नष्ट हो जाती है। परंतु आप तो देवाधिदेव नारायण हैं। आपके सामने भला ये काम-क्रोधादि विकार कैसे फटक सकते हैं? हमारे ऊपर आप अपनी कृपादृष्टि सदैव बनाए रखें। हमारी आपसे यही प्रार्थना है।”

कामदेव की स्तुति सुनकर भगवान नर-नारायण पर प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी योगमाया द्वारा एक अद्भुत लीला दिखाई। सभी लोगों ने देखा कि साक्षात लक्ष्मी के समान सुन्दर-सुन्दर नारियाँ नर-नारायण की सेवा कर रही हैं। नर-नारायण ने कहा – ‘तुम इन स्त्रियों में से किसी एक को माँगकर स्वर्ग में ले जा सकते हो, वह स्वर्ग के लिए भूषण स्वरुप होगी।’ उनकी आज्ञा मानकर कामदेव ने अप्सराओं में सर्वश्रेष्ठ अप्सरा उर्वशी को लेकर स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया।

उसने देव सभा में जाकर भगवान नर-नारायण की अतुलित महिमा से सबको परिचित कराया, जिसे सुनकर देवराज इन्द्र चकित और भयभीत हो गये। उन्हें भगवान नर-नारायण के प्रति अपनी दुर्भावना और दुष्कृति पर विशेष पश्चाताप हुआ। भगवान नर-नारायण के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं थी। इससे उनके तप के प्रभाव की अतुलित महिमा का परिचय मिलता है। उन्होंने अपने चरित्र के द्वारा काम पर विजय प्राप्त करके क्रोध के अधीन होने वाले और क्रोध पर विजय प्राप्त करके अभिमान से फूल जाने वाले तपस्वी महात्माओं के कल्याण के लिये अनुपम आदर्श स्थापित किया

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