अथ कीलक स्तोत्रम्

महर्षि श्री मार्कडेयजी बोले – निर्मल ज्ञानरूपी शरीर धारण करने वाले, देवत्रयी रूप दिव्य तीन नेत्र वाले, जो कल्याण प्राप्ति के हेतु है तथा अपने मस्तक पर अर्द्धचन्द्र धारण करने वाले हैं उन भगवान शंकर को नमस्कार है, जो मनुष्य इन कीलक मन्त्रों को जानता है, वही पुरुष कल्याण को प्राप्त करता है, जो अन्य…

अथ अर्गला स्तोत्रम्

नमश्चण्डिकायै नम: मार्कण्डेयजी ककते हैं – जयन्ती मंगला, काली, भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा धात्री, स्वाहा और स्वधा इन नामों से प्रसिद्ध देवी! तुम्हें मैं नमस्कार करता हूँ, हे देवी! तुम्हारी जय हो। प्राणियों के सम्पूर्ण दुख हरने वाली तथा सब में व्याप्त रहने वाली देवी! तुम्हारी जय हो, कालरात्रि तुम्हें नमस्कार है, मधु और…

अथ देव्या कवचम

महर्षि मार्कण्डेयजी बोले – हे पितामह! संसार में जो गुप्त हो और जो मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करता हो और जो आपने आज तक किसी को बताया ना हो, वह कवच मुझे बताइए। श्री ब्रह्माजी कहने लगे – अत्यन्त गुप्त व सब प्राणियों की भलाई करने वाला कवच मुझसे सुनो, प्रथम शैलपुत्री, दूसरी…

भद्रा का शुभाशुभ विचार

भद्रा को कुछ कार्यों के लिए शुभ नहीं माना जाता है, लेकिन कुछ कार्य ऎसे भी हैं जिनमें भद्रा काल को शुभ तथा ग्राह्य माना गया है. लेकिन यदि आवश्यकता पड़े तब भद्रा मुखकाल का त्याग कर उसके बाद के भाग का समय लिया जा सकता है. भद्राकाल में विवाह करना, बच्चे का मुंडन संस्कार…