दशमहाविद्या – छिन्नमस्ता/छिन्नमस्तिका

भगवती छिन्नमस्तिका का स्वरुप अत्यन्त ही गोपनीय है, इसे कोई साधक ही जान सकता है. दशमहाविद्याओं में इनका तीसरा स्थान है. इनके प्रादुर्भाव की कथा इस प्रकार से है – एक बार भगवती भवानी अपनी सहचरी जया और विजया के साथ मन्दाकिनी में स्नान के लिए गईं. स्नान करने के बाद क्षुधाग्नि (भूख) से पीड़ित…

दशमहाविद्या – तारा

भगवती काली को ही नीलरुपा होने के कारण तारा भी कहा गया है. वचनान्तर से तारा नाम का रहस्य यह भी है कि ये सर्वदा मोक्ष देने वाली, तारने वाली हैं इसलिए इन्हें तारा भी कहा जाता है. महाविद्याओं में ये द्वितीय स्थान पर परिगणित हैं. अनायास ही वाकशक्ति प्रदान करने में समर्थ हैं इसलिए…

देवी षष्ठी की कथा

प्राचीन समय में प्रियव्रत नाम के एक बहुत प्रसिद्ध राजा हुए, इनके पिता का नाम स्वायम्भुव मनु था. प्रियव्रत योगीराज थे और इस कारण विवाह भी नहीं करना चाहते थे. तपस्या में इनकी विशेष रुचि थी लेकिन ब्रह्माजी की आज्ञा तथा सत्प्रयत्न के प्रभाव से उन्होंने विवाह कर लिया. विवाह के काफी वर्ष बीत जाने…

प्रदोषस्तोत्रम्

जय देव जगन्नाथ जय शंकर शाश्वत । जय सर्वसुराध्यक्ष जय सर्वसुरार्चित ।।1।। जय सर्वगुणातीत जय सर्ववरप्रद । जय नित्यनिराधार जय विश्वम्भराव्यय।।2।। जय विश्वैकवन्द्येश जय नागेन्द्रभूषण । जय गौरीपते शम्भो जय चन्द्रार्धशेखर ।।3।। जय कोट्यर्कसंकाश जयानन्तगुणाश्रय । जय भद्र विरूपाक्ष जयाचिन्त्य निरंजन ।।4।। जय नाथ कृपासिन्धो जय भक्तार्तिभंजन । जय दुस्तरसंसारसागरोत्तारण प्रभो ।।5।। प्रसीद मे महादेव…

दशमहाविद्या – काली

दस महाविद्याओं में काली का प्रथम स्थान है. महाभागवत के अनुसार महाकाली ही मुख्य हैं और उनके उग्र तथा सौम्य दो रुपों में से ही अनेक रुप धारण करने वाली दस महाविद्याएँ हैं. भगवान शिव की शक्तियाँ ये महाविद्याएँ अनन्त सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं. माना जाता है कि महाकाली या काली ही समस्त…

खग्रास चन्द्रग्रहण – 31 जनवरी, 2018

31 जनवरी, सन 2018, दिन बुधवार, माघ पूर्णिमा के दिन सायंकाल से खग्रास चन्द्रग्रहण सारे भारतवर्ष में दिखाई देगा. इस ग्रहण की खग्रास आकृति सारे भारत में देखी जाएगी. यह ग्रहण मिजोरम, अरु-प्रदेश, आसाम, सिक्किम, मेघालय, पूर्वी पश्चिम बंगाल में चन्द्रोदय के बाद आरम्भ होगा. भारत के अन्य भागों में इस ग्रहण का आरंभ चन्द्रोदय…

गंगा स्तुति

जय जय भगीरथनन्दिनि, मुनि-चय चकोर-चन्दिनि, नर-नाग-बिबुध-बन्दिनि जय जह्नु बालिका। बिस्नु-पद-सरोजजासि, ईस-सीसपर बिभासि, त्रिपथगासि, पुन्यरासि, पाप-छालिका।।1।। अर्थ – हे भगीरथनन्दिनी! तुम्हारी जय हो, जय हो. तुम मुनियों के समूह रूपी चकोरो के लिए चन्द्रिका रूप हो. मनुष्य, नाग और देवता तुम्हारी वन्दना करते हैं. हे जह्नु की पुत्री! तुम्हारी जय हो. तुम भगवान विष्णु के चरण…

देवीस्तोत्रम्

श्रीभगवानुवाच नमो देव्यै प्रकृत्यै च विधात्र्यै सततं नम:। कल्याण्यै कामदायै च वृद्धयै सिद्धयै नमो नम:।।1।।   सच्चिदानन्दरूपिण्यै संसारारणयै नम:। पंचकृत्यविधात्र्यै ते भुवनेश्यै नमो नम:।।2।।   सर्वाधिष्ठानरूपायै कूटस्थायै नमो नम:। अर्धमात्रार्थभूतायै हृल्लेखायै नमो नम:।।3।।   ज्ञातं मयाsखिलमिदं त्वयि सन्निविष्टं त्वत्तोsस्य सम्भवलयावपि मातरद्य। शक्तिश्च तेsस्य करणे विततप्रभावा ज्ञाताsधुना सकललोकमयीति नूनम्।।4।।   विस्तार्य सर्वमखिलं सदसद्विकारं सन्दर्शयस्यविकलं पुरुषाय काले।…

माघ माहात्म्य – अठ्ठाईसवाँ अध्याय

वशिष्ठजी कहने लगे कि हे राजा दिलीप! बहुत से जन-समूह सहित अच्छोद सरोवर में स्नान करके सुखपूर्वक मोक्ष को प्राप्त हो गए तब लोमशजी कहने लगे संसार रूपी इस तीर्थ राजा को सब श्रद्धापूर्वक देखो. यहाँ पर तैंतीस करोड़ देवता आकर आनंदपूर्वक रहते हैं. यह अक्षय वट है जिनकी जड़े पाताल तक गई हैं और…

माघ माहात्म्य – सत्ताईसवाँ अध्याय

प्रेत कहने लगा कि हे पथिक! मैं इस समय तुम्हारे पास जो यह गंगा जल हैं, उसे माँगता हूँ क्योंकि मैंने इसका बहुत कुछ माहात्म्य सुना है. मैंने इस पर्वत पर गंगा जल का बड़ा अद्भुत आश्चर्य देखा था इसलिए यह जल मांगता हूँ, मैं प्रेत योनि में अति दुखी हूँ. एक ब्राह्मण अनधिकारी को…

माघ माहात्म्य – छब्बीसवाँ अध्याय

पथिक कहने लगा कि हे प्रेत! तुमने सारस के वचन किस प्रकार और क्या सुने थे. सो कृपा करके कहिए. प्रेत कहने लगा कि इस वन में कुहरा नाम की नदी पर्वत से निकली है. मैं घूमता-घूमता उस नदी के किनारे पहुंचा और थकावट दूर करने के लिए वहाँ पर ठहर गया. उसी समय लाल…

माघ माहात्म्य – पच्चीसवाँ अध्याय

पिशाच कहने लगा कि हे मुनि! केरल देश का ब्राह्मण किस प्रकार मुक्त हुआ यह कथा कृपा करके विस्तारपूर्वक कहिए. देवद्युति कहने लगा केरल देश में वासु नाम वाला एक वेद पारंगत ब्राह्मण था. उसके बंधुओं ने उसकी भूमि छीन ली जिससे वह निर्धन और दुखी होकर अपनी जन्मभूमि त्यागकर देश-विदेश में घूमता किसी व्याधि…