श्रीगणपतिस्तोत्रम्

सुवर्णवर्णसुन्दरं सितैकदन्तबन्धुरं  गृहीतपाशकांकुशं वरप्रदाभयप्रदम् । चतुर्भुजं त्रिलोचनं भुजंगमोपवीतिनं  प्रफुल्लवारिजासनं भजामि सिन्धुराननम् ।।1।। अर्थ – जो सुवर्ण के समान उज्जवल वर्ण

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श्री गणपत्यथर्वशीर्षम्

ऊँ भद्रं कर्णेभि: श्रृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजन्ना: । स्थिरैरंगैस्तुष्टुवा ँ सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायु:।। स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न: पूषा

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शिवमहिम्न: स्तोत्रम्

महिम्न: पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी  स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिर: । अथावाच्य: सर्व: स्वमतिपरिणामावधि गृणन् ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवाद: परिकर: ।।1।।  

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रुद्राष्टाध्यायी  – हिन्दी

श्रीगणेशाय नम:  रुद्राष्टाध्यायी में कुल आठ पाठ हैं जिसमें पाँचवाँ पाठ मुख्य है. यदि किसी व्यक्ति के पास समय का

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श्रीललिताष्टोत्तरशतनामावलि: 

ऊँ ऎं हृीं श्रीं  1) ऊँ ऎँ हृीं श्रीं रजताचलश्रृंगाग्रममध्यस्थायै नमो नम: 2) ऊँ ऎँ हृीं श्रीं हिमाचलमहावंशपावनायै नमो नम:

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श्री पार्वती चालीसा और आरती

श्री पार्वती चालीसा  ।।दोहा।। जय गिरि तनये दक्षजे शंभु प्रिये गुणखानि । गणपति जननी पार्वती अम्बे ! शक्ति ! भवानि

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