कार्तिक माह माहात्म्य – पहला अध्याय

मैं सिमरूँ माता शारदा, बैठे जिह्वा आये। कार्तिक मास की कथा, लिखे ‘कमल’ हर्षाये।। नैमिषारण्य तीर्थ में श्रीसूतजी ने अठ्ठासी हजार शौनकादि ऋषियों से कहा – अब मैं आपको कार्तिक मास की कथा विस्तारपूर्वक सुनाता हूँ, जिसका श्रवण करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और अन्त समय में वैकुण्ठ धाम की…

श्रीगोविन्दाष्टकम् | Shrigovindashtakam

सत्यं ज्ञानमनन्तं नित्यमनाकाशं परमाकाशं गोष्ठप्रांगणरिंगणलोलमनायासं परमायासम्। मायाकल्पितनानाकारमनाकारं भुवनाकारं क्ष्माया नाथमनाथं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम्।।1।।   मृत्स्नामत्सीहेति यशोदाताडनशैशवसंत्रासं व्यादितवक्त्रालोकितलोकालोकचतुर्दशलोकालिम्। लोकत्रयपुरमूलस्तम्भं लोकालोकमनालोकं लोकेशं परमेशं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम्।।2।।   त्रैविष्टपरिपुवीरघ्नं क्षितिभारघ्नं भवरोगघ्नं कैवल्यं नवनीताहारमनाहारं भुवनाहारम्। वैमल्यस्फुटचेतोवृत्तिविशेषाभासमनाभासं शैवं केवलशान्तं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम्।।3।।   गोपालं भूलीलाविग्रहगोपालं कुलगोपालं गोपीखेलनगोवर्धनधृतिलीलालालितगोपालम्। गोभिर्निगदितगोविन्दस्फुटनामानं बहुनामानं गोपीगोचरदूरं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम्।।4।।   गोपीमण्डलगोष्ठीभेदं भेदावस्थमभेदाभं शश्वद्गोखुरनिर्धूतोद्धतधूलीधूसरसौभाग्यम्। श्रद्धाभक्तिगृहीतानन्दमचिन्त्यं चिन्तितसद्भावं चिन्तामणिमहिमानं…

पीपल वृक्ष का महत्व

पद्मपुराण के अनुसार पीपल का वृक्ष भगवान विष्णु का रुप है. इसलिए इसे धार्मिक क्षेत्र में श्रेष्ठ देव वृक्ष की पदवी मिली और इसका विधि विधान से पूजन आरंभ हुआ. हिन्दू धर्म में अनेक अवसरों पर पीपल की पूजा करने का विधान है. मान्यता है कि सोमवती अमावस्या के दिन पीपल के वृक्ष में साक्षात…

तुलसीदास जी कृत हनुमद्बन्दीमोचन

दोहा वीर बखानौ पवनसुत, जानत सकल जहान। धन्य-धन्य अंजनितनय, संकट हर हनुमान।।   चौपाई जय जय जय हनुमान अड़ंगी । महावीर विक्रम बजरंगी।। जय कपीश जय पवनकुमारा । जय जगवन्दन शील अगारा।। जय उद्योत अमल अविकारी । अरिमर्दन जय जय गिरिधारी।। अंजनिउदर जन्म तुम लीन्हा । जय जैकार देवतन कीन्हा।। बजी दुन्दुभी गगन गँभीरा ।…

कामेश्वरीस्तुति:

युधिष्ठिर उवाच – Yudhishthir Uvach नमस्ते परमेशानि ब्रह्मरूपे सनातनि। सुरासुरजगद्वन्द्ये कामेश्वरि नमोSस्तु ते।।1।।   न ते प्रभावं जानन्ति ब्रह्माद्यास्त्रिदशेश्वरा:। प्रसीद जगतामाद्ये कामेश्वरि नमोSस्तु ते।।2।।   अनादिपरमा विद्या देहिनां देहधारिणी। त्वमेवासि जगद्वन्द्ये कामेश्वरि नमोSस्तु ते।।3।।   त्वं बीजं सर्वभूतानां त्वं बुद्धिश्चेतना धृति:। त्वं प्रबोधश्च निद्रा च कामेश्वरि नमोSस्तु ते।।4।।   त्वामाराध्य महेशोSपि कृतकृत्यं हि मन्यते। आत्मानं…

महालक्ष्मीस्तुति:

अगस्तिरुवाच – Agastiruvach मातर्नमामि कमले कमलायताक्षि श्रीविष्णुहृत्कमलवासिनि विश्वमात:। क्षीरोदजे  कमलकोमलगर्भगौरि लक्ष्मि प्रसीद सततं नमतां शरण्ये।।1।। त्वं श्रीरुपेन्द्रसदने मदनैकमात – र्ज्योत्स्नासि चन्द्रमसि चन्द्रमनोहरास्ये। सूर्ये प्रभासि च जगत्त्रितये प्रभासि लक्ष्मि प्रसीद सततं नमतां शरण्ये।।2।। त्वं जातवेदसि सदा दहनात्मशक्ति – र्वेधास्त्वया जगदिदं विविधं विदध्यात्। विश्वम्भरोSपि बिभृयादखिलं भवत्या लक्ष्मि प्रसीद सततं नमतां शरण्ये।।3।। त्वत्त्यक्तमेतदमले हरते हरोSपि त्वं पासि हंसि…

कात्यायनी स्तुति:

नमस्ते   त्रिजगद्वन्द्ये   संग्रामे    जयदायिनि। प्रसीद   विजयं   देहि   कात्यायनि  नमोSस्तु ते ।।1।।   सर्वशक्तिमये दुष्टरिपुनिग्रहकारिणि। दुष्टजृम्भिणि   संग्रामे   जयं   देहि  नमोSस्तु ते।।2।।   त्वमेका   परमा   शक्ति:   सर्वभूतेष्ववस्थिता। दुष्टं  संहर  संग्रामे  जयं देहि      नमोSस्तु ते।।3।।   रणप्रिये      रक्तभक्षे       मांसभक्षणकारिणि। प्रपन्नार्तिहरे  युद्धे   जयं  देहि  नमोSस्तु ते।।4।।   खट्वांगासिकरे मुण्डमालाद्योतितविग्रहे। ये त्वां  स्मरन्ति  दुर्गेषु  तेषां दु:खहरा भव।।5।।   त्वत्पादपंकजाद्दैन्यं   नमस्ते…

श्रीरामाष्टकम्

कृतार्तदेववन्दनं दिनेशवंशनन्दनम्। सुशोभिभालचन्दनं     नमामि   राममीश्वरम्।।1।।   मुनीन्द्रयज्ञकारकं        शिलाविपत्तिहारकम्। महाधनुर्विदारकं      नमामि   राममीश्वरम्।।2।।   स्वतातवाक्यकारिणं   तपोवने     विहारिणम्। करे    सुचापधारिणं    नमामि   राममीश्वरम्।।3।।   कुरंगमुक्तसायकं जटायुमोक्षदायकम्। प्रविद्धकीशनायकं        नमामि   राममीश्वरम्।।4।।   प्लवंगसंगसम्मतिं निबद्धनिम्नगापतिम्। दशास्यवंशसड़्क्षतिं नमामि   राममीश्वरम्।।5।।   विदीनदेवहर्षणं            कपीप्सितार्थवर्षणम्। स्वबन्धुशोककर्षणं           नमामि राममीश्वरम्।।6।।   गतारिराज्यरक्षणं प्रजाजनार्तिभक्षणम्। कृतास्तमोहलक्षणं        नमामि   राममीश्वरम्।।7।।   हृताखिलाचलाभरं स्वधामनीतनागरम्। जगत्तमोदिवाकरं         नमामि   राममीश्वरम्।।8।।   इदं    समाहितात्मना    नरो   रघूत्तमाष्टकम्। पठन्निरन्तरं…

बिल्वाष्टकम्

बिल्वाष्टकम् में बेल पत्र (बिल्व पत्र) के गुणों के साथ-साथ भगवान शंकर का उसके प्रति प्रेम भी बताया गया है. सावन मास में प्रतिदिन बिल्वाष्टकम का पाठ श्रद्धा भक्ति से किया जाना चाहिए.     त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रयायुधम् । त्रिजन्मपाप-संहारमेकबिल्वं शिवार्पणम्।।1।।   त्रिशाखैर्बिल्वपत्रैश्च ह्यच्छिद्रै: कोमलै: शुभै: । शिवपूजां करिष्यामि ह्येकबिल्वं शिवार्पणम्।।2।।   अखण्डबिल्वपत्रेण…

श्रीयमुनाष्टकम्

मुरारिकायकालिमा ललामवारिधारिणी तृणीकृतत्रिविष्टपा त्रिलोकशोकहारिणी। मनोSनुकूलकूल कुंजपुंजधूतदुर्मदा धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा।।1।।   मलापहारिवारिपूरभूरिमण्डितामृता भृशं प्रपातकप्रवंचनातिपण्डितानिशम्। सुनन्दनन्दनांगसंगरागरंजिता हिता। धुनोतु0।।2।।   लसत्तरंगसंगधूत भूतजातपातका नवीनमाधुरीधुरीण भक्तिजातचातका। तटान्तवासदासहंस संसृता हि कामदा। धुनोतु0।।3।।   विहाररासखेदभेद धीरतीरमारुता गता गिरामगोचरे यदीयनीरचारुता। प्रवाहसाहचर्यपूत मेदिनीनदीनदा। धुनोतु0।।4।।   तरंगसंगसैकतांचितान्तरा सदासिता शरन्निशाकरांशु मंजुमंजरीस-भाजिता। भवार्चनाय चारुणाम्बुनाधुना  विशारदा। धुनोतु0।।5।।   जलान्तकेललिकारिचारुराधिकांगरागिणी स्वभर्तुरन्य दुर्लभांग संगतांशभागिनी। स्वदत्तसुप्तसप्त सिन्धुभेदनातिकोविदा। धुनोतु0।।6।।  …

मधुराष्टकम्

मधुराष्टकम में श्याम सलोने कृष्ण भगवान के स्वरुप का चित्रण किया गया, जिसमें उनके सभी अदाओं की व्याख्या की गई है.  इस स्तुति में भगवान की एक अलग छवि उभरकर सामने आती है. अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम्। हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्।।1।।   वचनं मधुरं चरितं मधुरं वसनं मधुरं वलितं…

विष्णु शतनाम स्तोत्रम्

नारद उवाच ऊँ वासुदेवं हृषीकेशं वामनं जलशायिनम्। जनार्दनं  हरिं  कृष्णं श्रीवक्षं गरुडध्वजम्।।   वाराहं  पुण्डरीकाक्षं  नृसिंहं नरकान्तकम्। अव्यक्तं शाश्वतं विष्णुमनन्तमजमव्ययम्।।   नारायणं गदाध्यक्षं गोविन्दं कीर्तिभाजनम्। गोवर्द्धनोद्धरं     देवं     भूधरं    भुवनेश्वरम्।।   वेत्तारं    यज्ञपुरुषं    यज्ञेशं   यज्ञवाहकम्। चक्रपाणिं गदापाणिं शंख्हपाणिं नरोत्तमम्।।   वैकुण्ठं   दुष्टदमनं   भूगर्भं   पीतवाससम्। त्रिविक्रमं त्रिकालज्ञं त्रिमूर्ति नन्दिकेश्वरम्।।   रामं  रामं  हयग्रीवं  भीमं  रौद्रं  भवोद्भवम्। श्रीपतिं…