श्रीदुर्गापदुद्धारस्तोत्रम्

नमस्ते शरण्ये शिवे सानुकम्पे नमस्ते जगद्व्यापिकेविश्वरूपे। नमस्ते जगद्वन्द्यपादारविन्दे नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे।।1।। नमस्ते जगच्चिन्त्यमानस्वरूपे नमस्ते महायोगिनि ज्ञानरूपे। नमस्ते नमस्ते सदानन्दूपे नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे।।2।। अनाथस्य दीनस्य तृष्णातुरस्य भयार्तस्य भीतस्य बद्धस्य जन्तो:। त्वमेका गतिर्देवि निस्तारकर्त्री नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे।।3।। अरण्ये रणे दारुणे शत्रुमध्ये- Sनले सागरे प्रान्तरे राजगेहे। त्वमेका गतिर्देवि निस्तारनौका नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे।।4।। अपारे महादुस्तरेSत्यन्तघोरे…

सुरभिस्तोत्रम्

महेन्द्र उवाच नमो देव्यै महादेव्यै सुरभ्यै च नमो नम:। गवां बीजस्वरूपायै नमस्ते जगदम्बिके।।1।। नमो राधाप्रियायै च पद्मांशायै नमो नम:। नम: कृष्णप्रियायै च गवां मात्रे नमो नम:।।2।। अर्थ – देवी एवं महादेवी सुरभि को बार-बार नमस्कार है। जगदम्बिके! तुम गौओं की बीजस्वरुपा हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम श्रीराधा को प्रिय हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम लक्ष्मी…

सन्तानगणपतिस्तोत्रमम्

नमोSस्तु गणनाथाय सिद्धिबुद्धियुताय च । सर्वप्रदाय देवाय पुत्रवृद्धिप्रदाय च ।।1।। अर्थ – सिद्धि-बुद्धि सहित उन गणनाथ को नमस्कार है, जो पुत्रवृद्धि प्रदान करने वाले तथा सब कुछ देने वाले देवता हैं।   गुरूदराय गुरवे गोप्त्रे गुह्यासिताय ते। गोप्याय गोपिताशेषभुवनाय चिदात्मने।।2।। अर्थ – जो भारी पेट वाले (लम्बोदर), गुरु (ज्ञानदाता), गोप्ता (रक्षक), गुह्य (गूढ़स्वरुप) तथा सब…

श्री चन्द्र अष्टोत्तरशतनामावलि:

जिन व्यक्तियों की कुंडली में राहु कर्क राशि में स्थित है या केतु व मंगल की युति कर्क राशि में हो रही हो और गोचरवश भी यही योग बन रहा हो तब उन्हें अनिष्ट निवारण के लिए प्रतिदिन चन्द्र देव का अष्टोत्तर शतनाम स्त्रोत्र का जाप करना चाहिए और जप करके शिव मंदिर में शिवलिंग…

मुण्डमाला तन्त्रोक्त महाविद्या स्तोत्रम्

ऊँ नमस्ते चण्डिके चण्डि चण्डमुण्डविनाशिनी। नमस्ते कालिके कालमहाभयविनाशिनि।। शिवे रक्ष जगद्धात्रि प्रसीद हरवल्लभे। प्रणमामि जगद्धात्रीं जगत्पालनकारिणीम्।। जगत् क्षोभकरीं विद्यां जगत्सृष्टिविधायिनीम्। करालां विकटां घोरां मुण्डमालाविभूषिताम्।। हरार्चितां हराराध्यां नमामि हरवल्लभाम्। गौरीं गुरुप्रियां गौरवर्णालंकारभूषिताम्।। हरिप्रियां महामायां नमामि ब्रह्मपूजिताम्। सिद्धां सिद्धेश्वरीं सिद्धविद्याधरगणैर्युताम्।। मन्त्रसिद्धिप्रदां योनिसिद्धिदां लिंगशोभिताम्। प्रणमामि महामायां दुर्गां दुर्गतिनाशिनीम्। उग्रामुग्रमयीमुग्रतारामुग्रगणैर्युताम्। नीलां नीलघनश्यामां नमामि नीलसुन्दरीम्।।     श्यामांगी श्यामघटितां श्यामवर्णविभूषिताम्। प्रणमामि…

श्री ललिता सौभाग्य कवच स्तोत्रम्

शिखाग्रं सततं पातु मम त्रिपुर-सुन्दरी। शिर: कामेश्वरी नित्या तत् पूर्वं भग-मालिनी।।1।। नित्य-क्लिन्नाSवताद्दक्षं भेरुण्डा तस्य पश्चिमम् । वह्नि-वासिन्यवेद् वामं मुखं विद्येश्वरी तथा।।2।। शिव-दूती ललाटं मे त्वरिता त्सय दक्षिणम् । तद् – वाम – पार्श्वमवतात् तथैव कुल – सुन्दरी।।3।। नित्या पातु भ्रुर्वोमध्यं भ्रुवं नील – पताकिनी। वाम – भ्रुवं तु विजया नयनं सर्व – मंगला।।4।। ज्वाला –…

श्रीसिद्धसरस्वती स्तोत्रम्

दोर्भिर्युक्ताश्चतुर्भि: स्फटिकमणिमयीमक्षमालां दधाना हस्तेनैकेन पद्मं सितमपि च शुकं पुस्तकं चापरेण । या सा कुन्देन्दुशंखस्फटिकमणिनिभा भासमाना समाना सा मे वाग्देवतेयं निवसतु वदने सर्वदा सुप्रसन्ना ।।11।।   आरूढ़ा श्वेतहंसे भ्रमति च गगने दक्षिणे चाक्षसूत्रं वामे हस्ते च दिव्याम्बरकनकमयं पुस्तकं ज्ञानगम्या । सा वीणां वादयन्ती स्वकरकरजपै: शास्त्रविज्ञानशब्दै: क्रीडन्ती दिव्यरूपा करकमलधरा भारती सुप्रसन्ना ।।2।।   श्वेतपद्मासना देवी श्वेतगन्धानुलेपना ।…

देवी षष्ठी की कथा

प्राचीन समय में प्रियव्रत नाम के एक बहुत प्रसिद्ध राजा हुए, इनके पिता का नाम स्वायम्भुव मनु था. प्रियव्रत योगीराज थे और इस कारण विवाह भी नहीं करना चाहते थे. तपस्या में इनकी विशेष रुचि थी लेकिन ब्रह्माजी की आज्ञा तथा सत्प्रयत्न के प्रभाव से उन्होंने विवाह कर लिया. विवाह के काफी वर्ष बीत जाने…

प्रदोषस्तोत्रम्

जय देव जगन्नाथ जय शंकर शाश्वत । जय सर्वसुराध्यक्ष जय सर्वसुरार्चित ।।1।। जय सर्वगुणातीत जय सर्ववरप्रद । जय नित्यनिराधार जय विश्वम्भराव्यय।।2।। जय विश्वैकवन्द्येश जय नागेन्द्रभूषण । जय गौरीपते शम्भो जय चन्द्रार्धशेखर ।।3।। जय कोट्यर्कसंकाश जयानन्तगुणाश्रय । जय भद्र विरूपाक्ष जयाचिन्त्य निरंजन ।।4।। जय नाथ कृपासिन्धो जय भक्तार्तिभंजन । जय दुस्तरसंसारसागरोत्तारण प्रभो ।।5।। प्रसीद मे महादेव…

देवीस्तोत्रम्

श्रीभगवानुवाच नमो देव्यै प्रकृत्यै च विधात्र्यै सततं नम:। कल्याण्यै कामदायै च वृद्धयै सिद्धयै नमो नम:।।1।।   सच्चिदानन्दरूपिण्यै संसारारणयै नम:। पंचकृत्यविधात्र्यै ते भुवनेश्यै नमो नम:।।2।।   सर्वाधिष्ठानरूपायै कूटस्थायै नमो नम:। अर्धमात्रार्थभूतायै हृल्लेखायै नमो नम:।।3।।   ज्ञातं मयाsखिलमिदं त्वयि सन्निविष्टं त्वत्तोsस्य सम्भवलयावपि मातरद्य। शक्तिश्च तेsस्य करणे विततप्रभावा ज्ञाताsधुना सकललोकमयीति नूनम्।।4।।   विस्तार्य सर्वमखिलं सदसद्विकारं सन्दर्शयस्यविकलं पुरुषाय काले।…

दशमयीबालात्रिपुरसुन्दरीस्तोत्रम्

दशमयीबालात्रिपुरसुन्दरीस्तोत्रम् श्रीकाली बगलामुखी च ललिता धूम्रावती भैरवी मातंगी भुवनेश्वरी च कमला श्रीवज्रवैरोचनी। तारा पूर्वमहापदेन कथिता विद्या स्वयं शम्भुना लीलारूपमयी च देशदशधा बाला तु मां पातु सा।।1।। अर्थ – प्रारंभ से ही सर्वोत्कृष्ट पद धारण करने वाले स्वयं भगवान शिव के द्वारा श्रीकाली, बगलामुखी, ललिता, धूम्रावती, भैरवी, मातंगी, भुवनेश्वरी, कमला, श्रीवज्रवैरोचनी तथा तारा – इन दस…

स्वधा स्तोत्रम्

ब्रह्मोवाच – Brahmovach स्वधोच्चारणमात्रेण तीर्थस्नायी भवेन्नर:। मुच्यते सर्वपापेभ्यो वाजपेयफलं लभेत्।।1।। अर्थ – ब्रह्मा जी बोले – ‘स्वधा’ शब्द के उच्चारण से मानव तीर्थ स्नायी हो जाता है. वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर वाजपेय यज्ञ के फल का अधिकारी हो जाता है.   स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं यदि वारत्रयं स्मरेत्। श्राद्धस्य फलमाप्नोति कालस्य तर्पणस्य च।।2।। अर्थ…