शिवमहिम्न: स्तोत्रम्
महिम्न: पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिर: । अथावाच्य: सर्व: स्वमतिपरिणामावधि गृणन् ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवाद: परिकर: ।।1।।
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महिम्न: पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिर: । अथावाच्य: सर्व: स्वमतिपरिणामावधि गृणन् ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवाद: परिकर: ।।1।।
यदि कन्या विवाह में देरी हो रही है या कन्या के योग्य कोई अच्छा वर नहीं मिल रहा हो तब
श्रीलक्ष्मी स्तोत्रम् सिंहासनगत: शक्रस्सम्प्राप्य त्रिदिवं पुन: । देवराज्ये स्थितो देवीं तुष्टावाब्जकरां तत: ।।1।। अर्थ – इन्द्र ने स्वर्गलोक में जाकर
अगस्त्य उवाच अश्वानन महाबुद्धे सर्वशास्त्रविशारद । कथितं ललितादेव्या: चरितं परमाद्भुतम् ।।1।। पूर्वं प्रादुर्भवो मातु: तत: पट्टाभिषेचनम् । भण्डासुरवधश्चैव विस्तरेण त्वयोदित:
यदि कोई व्यक्ति मानसिक अथवा शारीरिक रूप से परेशान है. किसी प्रकार की बीमारी से दुखी है तब इस स्तोत्र
इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसमें वेदरूपी कल्पवृक्ष के परिपक्व फल “निगमकल्पतरोर्गलितं फलं” अर्थात श्रीमद्भागवतमहापुराण के प्रथम स्कन्ध