शिवरक्षास्तोत्रम्

विनियोग: – ऊँ अस्य श्रीशिवरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य याज्ञवल्क्य ऋषि:, श्रीसदाशिवो देवता, अनुष्टुप् छन्द:, श्रीसदाशिवप्रीत्यर्थं शिवरक्षास्तोत्रजपे विनियोग: । अर्थ – विनियोग – इस

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शिवमहिम्न: स्तोत्रम्

महिम्न: पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी  स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिर: । अथावाच्य: सर्व: स्वमतिपरिणामावधि गृणन् ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवाद: परिकर: ।।1।।  

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श्रीलक्ष्मी स्तोत्रम्

श्रीलक्ष्मी स्तोत्रम् सिंहासनगत: शक्रस्सम्प्राप्य त्रिदिवं पुन: । देवराज्ये स्थितो देवीं तुष्टावाब्जकरां तत: ।।1।। अर्थ – इन्द्र ने स्वर्गलोक में जाकर

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श्रीललितासहस्त्रनाम स्तोत्रम्

अगस्त्य उवाच अश्वानन महाबुद्धे सर्वशास्त्रविशारद । कथितं ललितादेव्या: चरितं परमाद्भुतम् ।।1।। पूर्वं प्रादुर्भवो मातु: तत: पट्टाभिषेचनम् । भण्डासुरवधश्चैव विस्तरेण त्वयोदित:

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पुरुषोत्तम सहस्त्रनाम स्तोत्रम्

इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसमें वेदरूपी कल्पवृक्ष के परिपक्व फल “निगमकल्पतरोर्गलितं फलं” अर्थात श्रीमद्भागवतमहापुराण के प्रथम स्कन्ध

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दत्तात्रेय स्तोत्र | Dattatreya Stotram

जटाधरं पाण्डुरंगं शूलहस्तं कृपानिधिम् । सर्वरोगहरं देवं दत्तात्रेयमहं भजे ।। अर्थ पीले वर्ण की आकृति वाले, जटा धारण किए हुए,

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श्रीदुर्गापदुद्धारस्तोत्रम्

नमस्ते शरण्ये शिवे सानुकम्पे नमस्ते जगद्व्यापिकेविश्वरूपे। नमस्ते जगद्वन्द्यपादारविन्दे नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे।।1।। नमस्ते जगच्चिन्त्यमानस्वरूपे नमस्ते महायोगिनि ज्ञानरूपे। नमस्ते नमस्ते सदानन्दूपे

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