
श्रीमहादेवजी बोले – महामुने ! इस प्रकार पुण्यात्मा राजा भगीरथ ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में हस्त नक्षत्र से युक्त मंगलवार शुभ दिन को उच्च ध्वनि में शंख बजाते हुये रथ पर आरूढ़ हो गये। महामुने ! रथ पर आरूढ़ राजा भगीरथ मध्याह्नकालीन सूर्य की भाँति अपरिमित अतीव तेज से सुशोभित हो रहे थे। वे सभी आभूषणों से सम्पन्न, मस्तक पर उज्जवल मुकुट धारण किये हुए, तेजसम्पन्न, सुन्दर श्याम वर्ण वाले, शोभनीय वस्त्र धारण किये हुये, रक्तनेत्रों वाले, राजाओं में श्रेष्ठ राजर्षि, कमल की भाँति प्रसन्न मुख वाले, सुविभक्त केश राशि से विभूषित, बली राजाओं में श्रेष्ठ तथा धन्यभाक थे।।1-4½।।
उनका रथ स्वच्छ, कान्तियुक्त, विभिन्न रत्नों से सुशोभित, सुमेरुशृङ्ग के समान विशाल और अपनी अत्यधिक कान्ति से सुशोभित था। राजा का वह महान रथ सूर्य के रथ के समान, स्वर्णालङ्कारों से सुशोभित घोड़ों तथा विभिन्न ध्वज-पताकाओं से सुसज्जित था।।5-7।। तदनन्तर पृथ्वी दिव्यरूप वाले नृपश्रेष्ठ भगीरथ को भूमि पर गंगा का अवतरण कराने वाला जानकर उनके सम्मुख प्रकट हो गयीं। मुनिश्रेष्ठ ! धर्मात्मा राजा भगीरथ को नमस्कार कर पृथ्वी ने राजा से इस प्रकार सुन्दर वचन कहा – ।।8-9।।
पृथ्वी बोली – राजन ! आप पृथ्वी पालक महात्मा तथा साक्षात धर्मस्वरूप हैं। मुझे ज्ञात हुआ है कि आप सगर के वंशज अपने पितरों के उद्धार के लिए भगवान् विष्णु के शरीर में स्थित, धन्य, पवित्रतम गङ्गा को वहाँ लायेंगे जहाँ आपके पूर्वज भस्मरूप में अवस्थित हैं।।10-11।। इसलिए भूपते ! मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ कि आप पुण्यात्मा वैसा करें, जिससे वे गंगा चारों दिशाओं में समुद्रपर्यन्त चार धाराओं में होकर मुझे पवित्र करती रहें।।12½।।
राजा बोले – जब वे शाम्भवी महाशक्ति द्रवरूप होकर भगवान् विष्णु के पदकमल से निकलकर मेरुशृङ्ग को प्राप्त करेंगी तब आप भी सुरेश्वरी भगवती की आराधना कीजिएगा।।13-14।।
मैं भी आपके लिए विशेषरूप से उनसे प्रार्थना करूँगा, तब आपके लिए वे मनोवांछित फल देने वाली होगीं। मैं उन्हें पृथ्वी पर लाने का संकल्प करके स्वर्ग में जा रहा हूँ। आप भी उन श्रेष्ठ भगवती की भक्तिपूर्वक प्रार्थना करने के लिए वहाँ आये।।15-16।।
श्रीमहादेव जी बोले – मुने ! खिले हुए कमल के समान मुखवाली उन पृथ्वी ने राजा भगीरथ के साथ ही स्वर्ग में जाने का दृढ़ निश्चय किया। तब रथियों में श्रेष्ठ राजा ने सारथि से कहा – महाबली ! रथ को शीघ्रता से चलाओ और स्वर्गलोक में ले चलो।।17-18।।
मुनिश्रेष्ठ ! यह सुनकर सारथी ने वायुतुल्य तीव्र वेग वाले उत्तम घोड़ों को तुरंत चलाया।।19।। तब वह उत्तम रथ मेरुशृङ्ग पर सहसा पहुँच गया। तदनन्तर राजा ने प्रलयकालीन घनगर्जन के समान महाशंख बजाया।।20।। जब शंख की ध्वनि वैकुण्ठधाम को प्राप्त हुई तब नीररूपिणी पराप्रकृति भगवती गङ्गा द्रवरूप में होकर भगवान् विष्णु के पदकमल से निकलकर कल-कल ध्वनि करती हुई वेगपूर्वक मेरुशृङ्ग पर गिरीं।।21-22।।
तब अतिप्रसन्न राजा जलधारारूपी गङ्गा को देखकर कृतकृत्य हो गए और शंख बजाना छोड़कर नाचने लगे।।23।। शंख की ध्वनि शांत हो जाने पर भगवती गङ्गा ने भी अपने वेग को छोड़कर मेरुपर्वत के शिखर पर कुछ समय तक विश्राम किया।।24।। उसी समय पृथ्वी त्रैलोक्यपावनी गंगा के समीप आकर इस स्तोत्र से भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति करने लगीं – ।।25।।
पृथ्वी बोलीं – जगत का पालन करने वाली सुरेश्वरि, ब्रह्मरूपिणी तथा लोक का उद्धार करने के लिए द्रवरूप धारण करने वाली देवी गङ्गे ! मुझ पर प्रसन्न होइए।।26।।
जो व्यक्ति भक्ति अथवा अभक्ति से भी आपके जलकण का स्पर्श करता है; वह भी मुक्ति को प्राप्त करता है। देवी गङ्गे ! आपको नमस्कार है।।27।। जो पापीजन आपका एक बार भी दर्शन कर लेते हैं, उन्हें यमराज के दंड का भय नहीं होता। देवी गङ्गे ! आपको नमस्कार है।।28।।
दिव्य अक्षरों से युक्त ‘गङ्गा’ इस नाम का जो एक बार स्मरण कर लेते हैं, उनके समान इस लोक में देवता अथवा मनुष्य कोई भी नहीं होता।।29।। द्रवरूपिणी पराप्रकृति आपको जो सदा भक्तिपूर्वक नमन करते हैं, उनकी कभी भी दुर्गति नहीं होती और यमराज से भय भी नहीं रहता, वे उत्तम मोक्ष को प्राप्त करते हैं। देवी गङ्गे आपको नमस्कार है।।30½।। आप एकमात्र परमशक्ति हैं, सभी प्राणियों के ह्रदय में वास करती हैं, अविद्या (माया) को दूर करने वाली विद्यास्वरूपा हैं, भगवान विष्णु के विग्रह में वास करती हैं तथा भगवान् विष्णु के चरण कमल से उत्पन्न हुई हैं, देवी गङ्गे ! आपको नमस्कार है।।31-32।। देवी ! आप विश्वात्मा, विश्व की वन्दनीया, भगवान् शंकर के ध्यान में रहने वाली तथा गिरिराज पुत्री हैं, देवी गङ्गे आपको नमस्कार है।। 33।। जिनकी आपमें भक्ति, प्रीति, श्रद्धा और बुद्धि है, उन्हें कभी भी मृत्यु का भय नहीं होता। देवी गङ्गे ! आपकी कृपा से उनका न अध्:पतन होता है, न उन्हें दुःख और भय ही प्राप्त होता है। माता ! आपको नमस्कार है।।34-35।। विश्वेशि गङ्गे ! आप शुद्ध ज्ञानस्वरूपिणी, सभी प्राणियों में चेतना रूप से स्थित हैं। भगवती आप प्रसन्न होइए और पापों का नाश कीजिए, आपको नमस्कार है।।36।।
श्रीमहादेव् जी बोले – महामुने ! इस प्रकार स्तुति करती हुई उन दिव्यरूपा पृथ्वी से जगदम्बिका गङ्गा ने इस प्रकार कहा – ।।37।।
गङ्गा जी बोली – धरणी ! क्षिते ! आप मुझसे क्या माँगती हैं, वह अपना वाँछित मुझे बताएं। मुझ द्रवरूपिणी को देखकर आप किसलिए स्तुति कर रही हैं? ।।38।।
पृथ्वी बोलीं – आप महात्मा राजा भगीरथ पर कृपा करके पूर्वकाल में महाराज सगर के महायज्ञ में मुनि के शाप से जहां इनके पूर्वज भस्मीभूत हैं, उस विवर की ओर प्रस्थान कर रही हैं।।39।।
सुरेश्वरि ! सरित्श्रेष्ठे ! मैं आपसे यही प्रार्थना करती हूँ कि समुद्र पर्यन्त चारों दिशाओं में विभक्त होकर मेरे तल पर विहार करके मेरे इस शरीर को पवित्र कीजिए।।40।।
गङ्गा जी बोलीं – राजा भगीरथ द्वारा स्तुति किये जाने पर भगवान् विष्णु के चरण कमल को छोड़कर मैं आयी हूँ। अतः उन भगीरथ की इच्छा के अतिरिक्त कुछ भी करने में मैं सक्षम नहीं हूँ।।41।।
श्रीमहादेव जी बोले – तब राजा भगीरथ ने पृथ्वी के हित की इच्छा से साष्टाङ्ग प्रणाम करके उत्तम वेग वाली गङ्गा से इस प्रकार कहा – ।।42।।
राजा बोले – महाभागा, पुण्या, पुण्यतमों में श्रेष्ठतमा तथा सुरवन्दिता माँ गङ्गे ! इन पृथ्वी पर आप कृपा कीजिए।।43।।
श्रीमहादेव जी बोले – महाबुद्धिमान राजा के इस प्रकार विचार को जानकार त्रैलोक्य पावनि जगन्माता गङ्गा पश्चिम, उत्तर और पूर्व दिशाओं में तीन धाराओं में विभक्त होकर स्वर्गलोक से चल पड़ी।।44।। दक्षिण दिशा की ओर राजा भगीरथ के पथ का अनुगमन करती हुई एक दूसरी तीव्र धारा स्वर्गलोक में सुशोभित हुई।।45।। सुरतरंगिणी की वह धारा स्वर्ग को आप्लावित करती हुई दक्षिणाभिमुख होकर तीव्र वेग से कुछ दूर तक चलीं।।46।। आगे-आगे मध्याह्नकालीन सूर्य की भाँति कांतिमान राजा भगीरथ अद्वितीय रथ पर आरूढ़ होकर शंख बजाते हुए चले।।47।। स्वर्ग को आप्लावित देखकर देवियाँ तथा किन्नरों के साथ देवता गङ्गा के समीप आकर भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करने लगे।।48।। सभी देवताओं के साथ देवराज इंद्र ने महाबाहु सूर्यवंशी राजा भगीरथ से विनयपूर्वक इस प्रकार कहा – पुन्यकीर्ति ! क्षत्रियश्रेष्ठ ! आप त्रैलोक्य दुर्लभ गङ्गा को लेकर पृथ्वी पर जा रहे हैं। महाभाग ! कुछ क्षण रुक कर हमारी बात सुन लीजिए।।49-50।।
देवराज इंद्र की यह बात सुनकर वहाँ रुककर भगीरथ ने उनको प्रत्युत्तर दिया।।51।। प्रभो ! देवराज ! किस प्रयोजन से आप मुझे ऐसा आदेश दे रहे हैं। वह बतायें,मैं आपकी आज्ञा के अधीन हूँ। मैं वैसा ही करूँगा।। 52।।
देवराज बोले – राजन ! ब्रह्मादि देवताओं के लिए भी अत्यंत दुर्लभ गङ्गा आपके द्वारा लायी गयीं हैं। आप उन सम्पूर्ण गङ्गा को पृथ्वी पर ही क्यों ले जा रहे हैं? ।।53।। गङ्गा की एक सुन्दर, ललित धारा स्वर्ग में भी रहे। मृत्युलोक की भाँति स्वर्गलोक में भी आपकी कीर्ति सुशोभित हो।।54।।
श्रीमहादेव जी बोले – महामुने ! देवराज इंद्र की यह बात सुनकर राजा भगीरथ भगवती गङ्गा की वहीं पर प्रार्थना करने लगे – माता गङ्गे ! महाभागे ! आपकी एक ललित धारा देवताओं को पवित्र करने के लिए स्वर्ग में भी रहे।।55-56।। तब राजा के इस प्रकार प्रार्थना करने पर द्रवमयी गङ्गा दूसरी महाधारा के रूप में परिणत होकर उत्तर दिशा की ओर चल पड़ी।।57।। मुने ! स्वर्गलोक को पवित्र करने वाली वह महापुण्यमयी धारा मंदाकिनी के नाम से विख्यात होकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित हो गई।।58।। वहाँ गंधर्वों सहित सभी देवता तथा ऋषिगण अत्यंत आदर के साथ नित्य स्नान तथा अवगाहन करते हैं।।59।। राजा भगीरथ ने पुनः रथ पर शंख बजाकर भगवती गङ्गा को पीछे करके दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान किया।। 60।। सुमेरु पर्वत के दक्षिण शिखर को प्राप्तकर और उसे ऊँचा देखकर महाबाहु राजा भगीरथ ने हाथ जोड़कर भगवती गङ्गा से कहा – माता ! शिवे ! मैं इस महाशिखर को भेदकर आपको पृथ्वी पर कैसे ले चलूँ। सुरोत्तमे ! वह मुझे बताइये।।61-62।।
गङ्गा जी बोलीं – राजन ! मैं यहाँ रुकती हूँ। आप इस रथ से गिरिशिखर को पार कर दक्षिण भाग की ओर चले जाइये।।63।। वहाँ आपके द्वारा ऊँची ध्वनि में शंख बजाने पर मैं तीव्र वेग से पर्वत के शिखर को भेदकर आपके रथ मार्ग का अनुसरण करके निश्चित ही पीछे-पीछे आ जाऊँगी।।64।।
श्रीमहादेव जी बोले – इस प्रकार गङ्गा की आज्ञा से राजा भगीरथ पर्वत के शिखर को पार कर तीव्र वेग वाले रथ से दक्षिण भाग में आ गए।।65।। वहाँ उन्होंने प्रयलकालीन मेघगर्जन के समान महान शंखध्वनि की, उससे घोर शब्द हुआ, जिससे नभोमण्डल व्याप्त हो गया।।66।। परमवेगिनी भगवती गङ्गा उस घोर नाद को सुनकर सुमेरु पर्वत के दक्षिण शिखर को भेदकर स्वयं अवतरित हो गयीं।।67।।
।। इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अंतर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘गङ्गानिर्गमन-मेरोर्दक्षिणशृङ्गभेदनान्निर्गमन’ नामक अड़सठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।।
