राहु/केतु का भावों के अनुसार आत्म-पाठ फल

प्रथम भाव (लग्न) – अहं से आत्मा तक केतु लग्न में – आत्मा पूर्वजन्म में स्वयं पर काम कर चुकी

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राहुपञ्चविंशतिनामस्तोत्रम

राहुर्दानवमन्त्री च सिंहिकाचित्तनन्दनः । अर्धकायः सदा क्रोधी चन्द्रादित्यविमर्दनः ।।1।। रौद्रो रुद्रप्रियो दैत्यः स्वर्भानुर्भानुभीतिद:। ग्रहराजः सुधापायी राकातिथ्यभिलाषुक: ।।2। कालदृष्टिः कालरूपः श्रीकण्ठहृदयाश्रय:

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