राहु/केतु की कहानी

rahu and ketu

राहु/केतु एक ही राक्षस था जिसका नाम स्वरभानु था. समुद्र मंथन के समय देवताओं को राक्षसों की सहायता लेनी पड़ी और उसके लिए कहा गया कि समुद्र से जो अमृत निकलेगा उसका रसपान राक्षसों को भी कराया जाएगा. अंत में जब अमृत निकला तब एक लाईन में देवता तो दूसरी लाईन में राक्षसों को बिठाया गया. विष्णु जी जानते थे कि राक्षसों को अमृत पिलाते ही वह अमर हो जाएंगे और फिर अत्यधिक उत्पात मचा देगें. इसलिए विष्णु भगवान ने मोहिनी का रुप धारण किया ओर मुस्कुराते हुए देवताओं को अमृत पिलाना शुरु कर दिया साथ ही वह राक्षसों को अपनी मोहिनी मुस्कुना से देखते रहे.

स्वरभानु राक्षस को यह समझते देर नहीं लगी कि उन्हें अमृत नहीं पिलाया जाएगा और वह वेष बदलकर चुपके से देवताओं की लाईन में जा बैठा. मोहिनी बने विष्णु जी ने स्वरभानु के प्याले में भी अमृत उड़ेल दिया और वह प्याले को मुँह से लगाकर पीने लगा, जैसे ही उसने पीना शुरु किया तब तक सूर्य व चंद्रमा ने उसे पहचान लिया कि यह स्वरभानु राक्षस है. विष्णु जी ने तुरंत अपना चक्र स्वरभानु की ओर चला दिया लेकिन जब उसकी गर्दन धड़ से अलग होने लगी तब तक अमृत की कुछ बूँदे उसके गले से नीचे जा चुकी थी. अमृत जाने से स्वरभानु को तो अमर होना ही था लेकिन वह दो भागों में बंट चुका था, एक गर्दन का हिस्सा और दूसरा धड़.

गरद्न से ऊपर का हिस्सा राहु बना और धड़ को केतु का नाम दिया गया तब से यह आसमान में भटक रहे हैं. राहु को सांप का मुँह तो केतु को पूँछ कहा गया है. सूर्य और चंद्रमा ने स्वरभानु को पहचान लिया था इसीलिए इन्हीं दोनों को ग्रहण लगता है. जब भी ग्रहण होता है तब उस दिन ये ग्रह राहु/केतु अक्ष पर होते हैं. इन्हें यह ग्रसित करता है अर्थात निगलता है.

वैसे कहा यह गया है के सूर्य का जो विस्तारित पथ आसमान में बना हुआ है. उस पथ को जब चंद्रमा का विस्तारित पथ दो बिंदुओं पर काटता है उन बिंदुओं को राहु तथा केतु कहा गया है. अमृत की कुछ बूंदे गले से नीचे जाने की वजह से केतु को मोक्षकारी ग्रह भी कहा गया है. राहु शरीर का ऊपरी हिस्सा है जो देख तो रहा है लेकिन कुछ कर नहीं पाता है. केतु शरीर का दूसर भाग है जिसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा है तो निर्णय कैसे लेगा? इसलिए राह/केतु की दशा में व्यक्ति की बुद्धि भ्रमित सी रहती है. किसी भी काम की स्पष्ट तस्वीर दिखाई नहीं देती हैं. समझते बूझते हुए भी निर्णय गलत हो जाते हैं.

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