राहु/केतु का भावों के अनुसार आत्म-पाठ फल
प्रथम भाव (लग्न) – अहं से आत्मा तक केतु लग्न में – आत्मा पूर्वजन्म में स्वयं पर काम कर चुकी
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प्रथम भाव (लग्न) – अहं से आत्मा तक केतु लग्न में – आत्मा पूर्वजन्म में स्वयं पर काम कर चुकी
केतुः कालः कलयिता धूम्रकेतुर्विवर्णकः। लोककेतुर्महाकेतुः सर्वकेतुर्भगप्रदः॥१॥ रौद्रो रुद्रप्रियो रुद्रः क्रूरकर्मा सुगन्धधृक्। पलालधूमसङ्काशश्चित्रयज्ञोपवीतधृक्॥२॥ तारागणविमर्दी च जैमिनेयो ग्रहाधिपः। गणेशदेवो विघ्नेशो विषरोगार्तिनाशनः॥३॥ प्रव्राज्यदो
केतु ग्रह धड़ है व सिर राहु है. यह ग्रह सभी ग्रहों में सबसे अधिक रहस्यमयी ग्रह है. यह एक
राहु/केतु एक ही राक्षस था जिसका नाम स्वरभानु था. समुद्र मंथन के समय देवताओं को राक्षसों की सहायता लेनी पड़ी
ज्योतिष में बहुत से अच्छे अथवा बुरे योगों का उल्लेख किया गया है. इन्हीं योगो में से एक योग कालसर्प
केतु को सर्प का धड़ माना गया है और सिर के बिना धड़ को कुछ दिखाई नहीं देता कि क्या