श्रीलक्ष्मी स्तोत्रम्

श्रीलक्ष्मी स्तोत्रम् सिंहासनगत: शक्रस्सम्प्राप्य त्रिदिवं पुन: । देवराज्ये स्थितो देवीं तुष्टावाब्जकरां तत: ।।1।। अर्थ – इन्द्र ने स्वर्गलोक में जाकर

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श्रीललिताष्टोत्तरशतनामावलि: 

ऊँ ऎं हृीं श्रीं  1) ऊँ ऎँ हृीं श्रीं रजताचलश्रृंगाग्रममध्यस्थायै नमो नम: 2) ऊँ ऎँ हृीं श्रीं हिमाचलमहावंशपावनायै नमो नम:

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उत्तराभाद्रपद नक्षत्र का उपचार

जन्म नक्षत्र यदि उत्तराभाद्रपद होकर वह पाप अथवा अशुभ प्रभाव में स्थित है तब इसका उपचार अवश्य करना चाहिए अन्यथा

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