उत्तराभाद्रपद नक्षत्र का उपचार

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जन्म नक्षत्र यदि उत्तराभाद्रपद होकर वह पाप अथवा अशुभ प्रभाव में स्थित है तब इसका उपचार अवश्य करना चाहिए अन्यथा जीवन में कई प्रकार की परेशनियों, बाधाओं तथा असफलताओं का मुँह देखना पड़ सकता है. इस नक्षत्र पर अशुभ प्रभाव के परिणामस्वरुप अनिष्ट फलों की प्राप्ति से जीवनयापन कठिन हो जाता है. इन अशुभ फलों को मिटाने के लिए विद्वानों ने भगवान शिव, माँ दुर्गा अथवा भगवान विष्णु की पूजा-उपासना करना अचूक उपाय बताया है. कुछ अन्य के मतानुसार योग के द्वारा यदि कुंडलिनी जागरण का प्रयास किया जाए तब यह भी इस नक्षत्र के अनिष्ट प्रभाव को खतम करने में सहायक होता है.

उत्तराभाद्रपद नक्षत्र के बीज मंत्र “ऊँ शं”, “ऊँ सं” अथवा “ऊँ हं” का जाप 108 बार प्रतिदिन करने पर भी इस नक्षत्र के शुभ फलों में वृद्धि होती है. इन बीज मंत्र का जाप, जिस दिन उत्तराभाद्रपद नक्षत्र पड़ता हो उस दिन से आरंभ करना चाहिए. उत्तराभाद्रपद मास के दिनों में भी इन मंत्र का जाप आरंभ किया जा सकता है. विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने से भी अनिष्ट से छुटकारा पाया जा सकता है. विष्णु भगवान के किसी भी अवतार की पूजा प्रतिदिन करने से भी शुभ फल मिलते हैं. देवी के तीर्थों की यात्राएँ करने से भी इस नक्षत्र के अशुभ परिणाम समाप्त होते हैं. इसी तरह से शिव तथा विष्णु भगवान अथवा इनके अवतारों के तीर्थ स्थानों की यात्राएँ करने से भी इस नक्षत्र के शुभ फलों में वृद्धि होती है.

उत्तराभाद्रपद नक्षत्र की शुभता में वृद्धि के लिए नीले अथवा पीले रंग का उपयोग भी लाभदायक सिद्ध होता है. इस नक्षत्र के देवता अहिर्बुध्न्य है तो इनकी प्रतिदिन पूजा करने से भी इस नक्षत्र के शुभ फल बढ़ाए जा सकते हैं. इस नक्षत्र का शुभत्व पाने के लिए व्यक्ति को होम करना चाहिए और होम करते हुए “महामृत्युंजय अष्टक” का पाठ् “वशिष्ठ कल्पोक्त महामृत्युंजय मंत्र”, “आदित्य हृदय स्तोत्र” आदि का पाठ अवश्य करना चाहिए. “अश्वत्थ” की जड़ को चाँदी के ताबीज में गले में अथवा बाजू में पहनने से भी इस नक्षत्र के अशुभ प्रभाव मिटाए जा सकते हैं.

उत्तराभाद्रपद नक्षत्र के शुभ परिणाम पाने के लिए इस नक्षत्र के वैदिक मंत्र का जाप प्रतिदिन नियम से करना चाहिए. जाप करते हुए अश्वत्थ और जौ के मिश्रण से होम करना चाहिए. अगर होम संभव ना हो तब केवल वैदिक मंत्र का ही प्रतिदिन 108 बार जाप करना चाहिए, मंत्र है :-

ऊँ शिवोनामासि स्वधितिस्तेपिता नमस्ते अस्तु मामाहि गूंसी:

निवर्त्तयाम्यायुषेSन्नाद्यायप्प्रजननाय ।

रायस्पोषाय सुप्प्रजास्त्वायसुवीयर्याय ।। ऊँ अहिर्बुध्न्याय नम: ।।

 

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