प्रथम भाव (लग्न) – अहं से आत्मा तक
- केतु लग्न में – आत्मा पूर्वजन्म में स्वयं पर काम कर चुकी है
- राहु लग्न में – इस जन्म में पहचान, व्यक्तित्व, अहं की परीक्षा
- आत्म-पाठ: “मैं कौन हूँ?”
द्वितीय भाव – मूल्य और वाणी
- केतु – पूर्वजन्मीय पारिवारिक संस्कार बताता है
- राहु – धन, वाणी और मूल्य निर्माण बताता है
- आत्म-पाठ: सही मूल्य, सही वाणी
तृतीय भाव – साहस और प्रयास
- केतु – पूर्व प्रयासों की स्मृति है
- राहु – नया साहस सीखना है
आत्म-पाठ: डर से बाहर निकलना
चतुर्थ भाव – आंतरिक शांति
- केतु – भीतर से विरक्ति देता है
- राहु – भावनात्मक सुरक्षा की खोज में रहता है
आत्म-पाठ: शांति बाहर नहीं, आपके भीतर है
पंचम भाव – बुद्धि और पूर्व पुण्य
- केतु – पूर्वजन्म की विद्या बताता है
- राहु – रचनात्मक बुद्धि का विकास बताता है
आत्म-पाठ: ज्ञान का सही उपयोग
षष्ठ भाव – ऋण और सेवा
- केतु – पुराने ऋण है
- राहु – सेवा और संघर्ष है
आत्म-पाठ: सेवा से ही मुक्ति है
सप्तम भाव – संबंध और प्रतिबिंब
- केतु – पूर्व संबंधों से विरक्ति बताता है
- राहु – नए रिश्तों की सीख देता है
आत्म-पाठ: दूसरा मेरा दर्पण है
अष्टम भाव – परिवर्तन और रहस्य
- केतु – गहरे कर्म बताता है
- राहु – भय और परिवर्तन दिखाता है
आत्म-पाठ: परिवर्तन से मत डरों
नवम भाव – धर्म और मार्ग
- केतु – पूर्व धार्मिक अनुभव है
- राहु – नया दर्शन है
आत्म-पाठ: अपना धर्म पहचानो (इसका अर्थ है कि सही और गलत का मूल्यांकन करना)
दशम भाव – कर्म और उत्तरदायित्व
- केतु – पुराने कर्म पैटर्न बताता है
- राहु – नई जिम्मेदारी बताता है
- आत्म-पाठ: कर्तव्य बिना अहं के निभाना
एकादश भाव – इच्छा और लाभ
- केतु – इच्छाओं से थकान बताता है
- राहु – नई आकांक्षा और इच्छाएं बताता है
आत्म-पाठ: इच्छा का शोधन (purification)
द्वादश भाव – विसर्जन और मोक्ष
- केतु – पूर्ण वैराग्य बताता है
- राहु – अंतिम अनुभव बताता है
आत्म-पाठ: छोड़ना सीखो
निष्कर्ष –
केतु बताता है – तुम क्या बन चुके हो।
राहु बताता है – तुम्हें क्या बनना है।
और इन दोनों के संतुलन से आत्म-यात्रा पूर्ण होती है।
अथवा
केतु अतीत का अनुभव है,
राहु वर्तमान का प्रशिक्षण।
दोनों को समझ लेने पर आत्मा जन्म-मरण के चक्र से ऊपर उठती है।

