वैदिक ज्योतिष में वक्री ग्रह जिस भाव में स्थित होता है, उस भाव से संबंधित पूर्वजन्मीय कर्म अधूरे माने जाते हैं। उसी भाव के विषय जीवन में बार-बार सक्रिय होकर जातक को सुधार, अनुभव और परिपक्वता की ओर ले जाते हैं।
प्रथम भाव (लग्न) में वक्री ग्रह
- आत्मविश्वास, व्यक्तित्व और जीवन-दृष्टि पर प्रभाव
- जातक स्वयं को बार-बार परखता है
- पहचान बनाने में संघर्ष
- जीवन में आत्मबोध देर से आता है
➡ पूर्वजन्म में आत्म-धर्म या व्यक्तित्व से जुड़े कर्म अधूरे
द्वितीय भाव में वक्री ग्रह
- धन, वाणी और पारिवारिक मूल्य प्रभावित
- धन आता-जाता रहता है
- वाणी में कटुता या आत्म-संयम की परीक्षा
➡ पूर्वजन्म में धन या वाणी का दुरुपयोग
तृतीय भाव में वक्री ग्रह
- साहस, प्रयास, भाई-बहन से संबंधित कर्म
- बार-बार प्रयास करने की मजबूरी
- संचार या लेखन में विलंब से सफलता
➡ पूर्वजन्म में प्रयास अधूरे या जिम्मेदारियों से पलायन
चतुर्थ भाव में वक्री ग्रह
- माता, घर, मानसिक शांति पर प्रभाव
- गृह सुख में अस्थिरता
- बार-बार स्थान परिवर्तन
➡ पूर्वजन्म में पारिवारिक कर्तव्यों की उपेक्षा
पंचम भाव में वक्री ग्रह
- बुद्धि, संतान, शिक्षा, पूर्व पुण्य
- शिक्षा में रुकावट
- संतान सुख में विलंब
➡ पूर्वजन्म में विद्या या संतान से जुड़े कर्म अधूरे
षष्ठ भाव में वक्री ग्रह
- ऋण, रोग, शत्रु
- रोग बार-बार लौटते हैं
- शत्रुओं पर अंततः विजय
➡ पूर्वजन्म के ऋण चुकाने का भाव
सप्तम भाव में वक्री ग्रह
- विवाह, साझेदारी, दांपत्य
- विवाह में विलंब या पुनरावृत्ति
- रिश्तों में कर्मिक खिंचाव
➡ पूर्वजन्म में संबंधों की असफलता या अधूरी जिम्मेदारी
अष्टम भाव में वक्री ग्रह
- गहन कर्म, रहस्य, परिवर्तन
- अचानक उतार-चढ़ाव
- आध्यात्मिक झुकाव
➡ गहरे कर्मिक बंधन, मोक्ष से जुड़ा भाव
नवम भाव में वक्री ग्रह
- भाग्य, गुरु, धर्म
- भाग्य देर से उदय
- गुरु से मतभेद
➡ पूर्वजन्म में धर्म या गुरु से विचलन
दशम भाव में वक्री ग्रह
- कर्म, प्रतिष्ठा, कार्यक्षेत्र
- करियर में बार-बार बदलाव
- सफलता देर से लेकिन स्थायी
➡ पूर्वजन्म में कर्म अधूरे छोड़ना
एकादश भाव में वक्री ग्रह
- लाभ, इच्छाएँ, मित्र
- लाभ में विलंब
- सीमित लेकिन स्थायी मित्र
➡ पूर्वजन्म में स्वार्थपूर्ण इच्छाएँ
द्वादश भाव में वक्री ग्रह
- मोक्ष, व्यय, एकांत
- अनावश्यक खर्च
- आध्यात्मिक झुकाव
➡ पूर्वजन्म में वैराग्य अधूरा

