बृहत् पराशर होरा शास्त्र – अथ प्रश्नविचाराध्याय: 

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बृहत् पराशर होरा शास्त्र के 100वें अध्याय में प्रश्न शास्त्र के विषय में विस्तार से बताया गया है, आइए जानें :- 

श्लोक 1,2,3 का अर्थ 

मैत्रेय बोले – हे महर्षे ! सतयुग में पूर्ण तपस्वी लोग तपोबल से ही समस्त ज्ञान प्राप्त करके भूत, वर्तमान, भविष्य का ज्ञान कर सकते थे। अब कलियुग में एक चरण धर्म शेष रहने से केवल तपस्या से शास्त्र ज्ञान नहीं हो सकता। अतः कलियुग में मन्द बुद्धि मनुष्य भी किस प्रकार जन्म-पत्रादि के बिना तात्कालिक व निकट भविष्ट में होने वाली घटनाओं को जान सकते हैं, उस उपाय भूत प्रश्नशास्त्र को कृपा करके मुझे कहें। 

 

श्लोक 4,5,6,7,8 का अर्थ 

पराशर बोले – पूर्वकाल में भगवान् शंकर ने अपनी कला से लोकहितार्थ आदि शक्ति विद्यादेवी को उत्पन्न किया था। वह त्रिकाल का ज्ञान देने वाली हैं। अतः उसका मंत्र जपने से मनुष्य त्रिकालज्ञ हो जाता है। 

“ॐ ऐं गौरि वद वद गिरिपरमैश्वर्य सिद्धियर्थ एं” यह शक्ति मंत्र है। 

“ॐ सर्वज्ञ नाथ पार्वतीपते सर्वलोक गुरो शिव् शरणं त्वां प्रपन्नेsस्मि पालये ज्ञानं प्रदापय” यह शिव मंत्र है। 

 

मंत्र विनियोग इस प्रकार है :- 

‘अनयो:मन्त्रयो: दक्षिणामूर्ति ऋषि: गौरीपरमेश्वरी सर्वज्ञ शिवश्च देवते, गायत्र्यनुष्टुपौ छन्दसी ज्योति: शास्त्र ज्ञान प्राप्तये जपे विनियोग:।’  

 

ध्यान विधि – श्लोक 9,10,11,12 का अर्थ 

कैलाश पर्वत पर स्थित एक उद्यान के एक वृक्ष के नीचे प्रसन्न मुद्रा वाली, सज्जित, शुक्ल वर्ण, पवित्र मुस्कान बिखेरती हुई गौरी का ध्यान करें। देवदार के वन में ध्यानमग्न, मुंदे नयनों वाले, चतुर्भुज, त्रिनेत्र, जटाजूटधारी, चंद्रशेखर, शुक्ल वर्ण, परमेश्वर महादेव का ध्यान करें। 

इन दोनों गौरीपरमेश्वर का ध्यान करने से बुद्धि विमल होती है तथा ध्यानानन्तर पूर्वोक्त मंत्र का जप करने भर से ही मनुष्य दैवज्ञत्व को प्राप्त हो जाता है। अर्थात उसकी वाणी में भविष्य कथन की शक्ति आ जाती है। 

 

प्रश्नकर्ता का आचार – श्लोक 13 का अर्थ 

प्रश्नकर्ता लोभी न हो, अनुशासित चरित्र वाला, शुद्ध भावों वाला, विनीत हो। दैवज्ञ के सामने रत्न, सोना, धन, वस्त्र या फल फूल आदि रखकर तब प्रसन्न मन से अपना प्रश्न रखें। अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार उक्त दक्षिणा रखने का आशय है। कुटिल, चरित्रहीन, दुष्ट स्वभाव व भावनाओं वाला, चालाकी से प्रश्न करने वाला प्रश्नकर्ता हो तो उसके प्रश्न का उत्तर नहीं देना चाहिए, यह बात यहाँ अन्यथा सिद्ध है।  

 

दैवज्ञ का कर्त्तव्य – श्लोक 14,15,16 का अर्थ 

ज्योतिषी पूर्व की ओर या उत्तर की ओर मुख करके पवित्र होकर बैठे। अपने सामने कागज़, भूमि, स्लेट आदि पर यथावसर चार खाने खड़े व चार पड़े लिखें। उसके कोणों को आपस में मिला लें। मध्य में स्थित खाली वर्गाकार स्थान में कमल की आकृति लिखें। तब 12 खानों में ईशान कोण से आरम्भ करके मीनादि 12 राशियाँ क्रमशः लिखें। इस पद्धति से प्रश्न या आरूढलग्न लिखें। 

वीथि ज्ञान – श्लोक 17 का अर्थ 

मेष वीथि में 2,3,4,5 राशियाँ, वृष वीथि में 12,1,6,7 राशियों व मिथुन वीथि में 8,9,10,11 राशियाँ समझें। ये सूर्य राशि से देखी जाती हैं। अर्थात प्रश्न का सौरमास जिस वीथि पर पड़े वही वीथि राशि माने। 

 

छत्रराशि विचार – श्लोक 18 का अर्थ 

आरूढ़ लग्न से जितनी राशि आगे वीथि की राशि हो, प्रश्न से उतना ही आगे छत्र राशि होती है। यदि आरुढ़ व प्रश्न लग्न एक ही हो छत्र राशि भी वही होती है। आरुढ़ लग्न, वीथि व छत्र तथा प्रश्नकालीन उदय लग्न से प्रश्न विचार की विधि नितान्त दक्षिण भारतीय है, जो वहाँ आज भी प्रचलित है। ज्ञान प्रदीप प्रश्नानुष्ठान पद्धति, प्रश्नमार्ग कृष्णीयम आदि इस विषय के पौराणिक ग्रन्थ हैं। 

 

प्रश्नशास्त्र का मूल नियम – श्लोक 19 का अर्थ 

जन्म लग्न विचार के जो शुभाशुभ योग पीछे कहे गए हैं, वे सब यथावत प्रश्न लग्न में भी लागू होंगे। यह एक मौलिक नियम है तथा शुभ योग, राजयोग, धन, अरिष्ट, मृत्यु, विवाह, भाग्योदय, लाभ हानि आदि सभी प्रश्नों में लागू होगा, इस विषय में सभी आचार्य व ऋषि एकमत हैं। 

 

आरुढ़ आदि से आयु – श्लोक 20,21,22,23 का अर्थ 

आयु कितनी शेष है? यह प्रश्न हो और आरुढ़, लग्न व छत्र तीनों या दो बलवान होकर स्थित हों तो आयु शेष है, मृत्यु दूर है, ऐसा कहें। 

लेकिन आरुढ़ राशि तुला हो, छत्र धनु हो तो रोगी की मृत्यु नहीं होती है। इसके विपरीत धनु आरुढ़ राशि व तुला छत्र हो तो रोगी की मृत्यु होती है। यदि लग्न का आरुढ़ परस्पर षडाष्टक में हो, चन्द्रमा अष्टम में हो तो रोगी की मृत्यु होती है। जो ग्रह आरुढ़ राशि को देखें या वहाँ स्थित हों, तथा वह ग्रह प्रश्न लग्न से अष्टम में हो तो रोगी की मृत्यु, स्वस्थ व्यक्ति की आयु में संशय होता है। 

 

ग्रह योगों से मृत्यु – श्लोक 24,25 का अर्थ 

1) लग्न में सर्वमुख, कोलमुख आदि दुष्ट द्रेष्काण हो तथा चन्द्रमा अष्टम में हो। 

2) पृष्ठोदय उदय लग्न हो तथा 1,8,12 भावों में पाप ग्रह हों। 

3) द्वितीय या नवम में शनि मंगल हो, अष्टम में चंद्र हो। 

ये उपरोक्त योग प्रश्न लग्न में बने तो आयु शेष नहीं होती है, मृत्यु शीघ्र होगी। 

 

श्लोक 26,27 का अर्थ 

यदि लग्न या चन्द्रमा के दोनों ओर पाप ग्रह हों, 1,4,7 में चंद्र व लग्न में सूर्य हो तो मृत्यु होती है। 

राहु व काल के संयोग के समय (राहुकालम) प्रश्न हो तो निश्चय से मृत्यु होती है। यदि प्रश्न समय केवल राहु या केवल काल का उदय हो तो व्याधि या अनिष्ट होता है। 

अर्धप्रहर, कालपाश, खंड राहु आदि के समय का भी मुहूर्तशास्त्रोक्त विषयानुसार निर्देश है। अनिष्ट वेला में प्रश्न का फल अशुभ होगा, यह नियम स्पष्ट हुआ।  

 

श्लोक 28 का अर्थ 

यदि प्रश्न समय मृत्यु योग के साथ धनप्रद योग, शुभ योग व राजयोगादि योग भी पड़ जाएँ, तब निश्चय से रोगोत्पत्ति या मृत्यु नहीं होती है। समस्त पूर्वा पर विचार करके ही तब फलादेश करें। 

 

नक्षत्र गोचर व मृत्यु – श्लोक 29,30,31 का अर्थ 

यदि रोगी के स्वास्थ्य के विषय में प्रश्न हो तथा प्रश्न समय वैधृति या व्यतीपात नामक महापात योग हो, गण्डान्त लग्न हो, विषघड़ियाँ हों, मंगलादि पाँच ग्रहों में से अधिकाँश अस्त हों, रोगी का जन्म नक्षत्र पापयुक्त हो, जन्म राशि पापयुक्त हो, तिथि संधि या लग्न संधि में प्रश्न लग्न हो, मास शून्य नक्षत्र 8,12 में क्षीण चन्द्रमा शत्रुग्रहों से देखा जाता हो तो इन सब योगों में रोगी की मृत्यु हो जाती है। 

 

लग्न का उदयमान – श्लोक 32,33,34 का अर्थ 

मेष मीन – 3.20 घटी। वृष कुम्भ – 4.0 घटी। मिथुन मकर – 4.40 घटी। कर्क धनु – 5.0 घटी। सिंह वृश्चिक 6.0 घटी। कन्या तुला – 6.40 घटी। ये प्रतिदिन राशियों के लग्नोदय काल हैं अर्थात कथित अवधि तक प्रत्येक लग्न उदित होता है। 

 

अंग स्पर्श से अनिष्ट – श्लोक 35,36,37 का अर्थ 

प्रश्नकर्ता प्रश्न के समय पैर, पीठ, पिंडली, घुटना, नाभि, टखना, कान, आँख, माथा, मुँह, गला, अंगों का स्पर्श करता हो तो स्वस्थ व्यक्ति को रोगोत्पत्ति और रोगी व्यक्ति की मृत्यु होती है। अथवा जन्म राशि से आठवीं राशि लग्न या आरुढ़ हो, तब भी मृत्यु होती है। 

प्रश्न समय विपत, वध, प्रत्यरि, वैनाशिक, नक्षत्र तारा हो, या इन नक्षत्रों के अंगों का स्पर्श करे तो स्वस्थ व्यक्ति को रोगोत्पत्ति व रोगी व्यक्ति की मृत्यु होती है। 

 

नक्षत्र विचार – श्लोक 38, 39 का अर्थ 

अंगों में नक्षत्र की स्थापना का क्रम इस प्रकार है :- 

1) अश्विनी – सिर, 2) भरणी – माथा, 3) कृतिका – भौंह, 4) रोहिणी – आँखें, 5) मृगशिरा – नाक, 6) आर्द्रा – कान, 7) पुनर्वसु –    गाल, 8) पुष्य – होंठ, 9) अश्लेषा – ठोड़ी, 10) मघा – गाल, 11) पूर्वा फाल्गुनी – कंधे, 12) उत्तरा फाल्गुनी – हृदय, 13) हस्त – बगलें, 14) चित्रा – छाती, 15) स्वाति – पेट, 16) विशाखा – नाभि, 17) अनुराधा – कमर, 18) ज्येष्ठा – जाँघ, 19) मूल-नितम्ब, 20) पूर्वाषाढ़ा – लिंग, 21) उत्तराषाढ़ा – अंडकोष, 22) श्रवण – पेडू, 23) घनिष्ठा – जाँघे, 24) शतभिषा – घुटने, 25) पूर्वाभाद्रपद – पिंडली, 26) उत्तराभाद्रपद – टखने, 27) रेवती – पैर 

 

श्लोक 40 का अर्थ 

यदि प्रश्न समय पृच्छक तेल लगाए हुए, अशुद्ध (सूतकादि युक्त), पानी के गड्ढे के पास खड़े होकर प्रश्न करे या ज्योतिषी स्वयं ही ऐसी स्थिति में हो तो पृच्छक या जिसके विषय में प्रश्न हो, उस कार्य की हानि या नाश होता है, इसका अर्थ है कि आयु प्रश्न में मृत्यु, धन प्रश्न में हानि, कार्यसिद्धि प्रश्न में असफलता आदि हो सकता है। (ज्योतिषी स्वविवेक से अर्थ ले सकता है)

 

रोग शान्ति के योग – श्लोक 41,42 का अर्थ 

इन योगों में प्रश्न का विषय शुभ या सफल होता है – 

1) 1,3,5,6,7,9,10,11 में ही सारे शुभ ग्रह हों तथा शुभ ग्रह (बुध, गुरु, शुक्र केंद्र त्रिकोणेश) शत्रु क्षेत्री या नीचगत न हों तो रोगी को आराम, काम में सफलता, धन का लाभ, यात्रा की सिद्धि आदि होती है। 

2) इसके विपरीत इन्हीं स्थानों में पाप ग्रह हों तथा वे स्वक्षेत्री, उच्चगत या मित्रक्षेत्री न हों तो सब कार्यों में हानि होती है। 

 

समस्त प्रश्न विचार – श्लोक 43 का अर्थ 

जिस भाव संबंधी प्रश्न हो, उसी भाव को लग्न समझकर, उससे 8,12 में शुभ ग्रह हों या कोई भी ग्रह न हों, उस भाव में शुभ ग्रह हो या स्वामी बैठा हो, अथवा उस भाव से केंद्र व त्रिकोणों में शुभ ग्रह हों तो उस भाव संबंधी प्रश्न के विषय में शुभ फल सफलता, सिद्धि आती है। 

 

अंगविद्या से प्रश्न – श्लोक 44 

प्रश्नकर्ता के स्थान, दिशा, काल, चेष्टा, वस्तुदर्शन, अंगप्रत्यंग का स्पर्श देखकर विद्वान् दैवज्ञ प्रश्न का फल कहें।  

(स्थान के विषय में पहले कह चुके हैं। काल के विषय में आगे कह रहे हैं।) 

 

श्लोक 45 का अर्थ 

पूर्वान्ह में किया गया प्रश्न सफलता का द्योतक है, जबकि सन्ध्या, अपरान्ह व रात्रि में प्रश्न करना निन्दित होता है। 

 

श्लोक 46 का अर्थ 

यात्रा के समय जो शकुन शुभ या अशुभ कहे हैं, वे ही शकुन प्रश्न के समय में भी शुभ व अशुभ ही होते हैं। इस विषय का विस्तृत विवेचन संहिता ग्रंथों में देख सकते हैं। 

 

अंगस्पर्श से प्रश्न फल – श्लोक 47,48,49 का अर्थ 

पैर के अंगूठों को हिलाते हुए या छूते हुए प्रश्न हो तो नेत्ररोग का द्योतक होता है। पैर की अँगुलियों को छूकर प्रश्न हो तो संतान की हानि, सिर पर चोट करते हुए या ठक-ठक करते हुए प्रश्न हो तो राजपक्ष से भय होता है। 

छाती का स्पर्श करते हुए प्रश्न हो तो वियोग की सूचना है। यदि कपडे उतारते हुए प्रश्न करें तो अनर्थ होने वाला है। यदि पैर पर पैर रखकर व कपडे को हाथ या पैर से छूते हुए प्रश्न हो तो प्रिय अर्थात मन के अनुसार फल मिलता है। 

 

श्लोक 50 का अर्थ 

अंगूठे से भूमि कुरेदते हुए प्रश्न हो तो जमीन, खेत या अचल संपत्ति आदि की चिंता होती है। यदि हाथ से पैरों को खुजाते हुए प्रश्न करे तो सेविका, नौकरानी, अधीनस्थ कर्मचारी या दासी आदि की चिंता होती है। 

 

शरीर में नक्षत्रन्यास – श्लोक 51,52 का अर्थ 

युद्धादि का प्रश्न हो तो 1-1-3-1-1-4-3-1-4-3 क्रम से अश्विनी अदि 27 नक्षत्रों को क्रमशः मुँह, बायीं आँख, मस्तक, दायाँ फेफड़ा, गला, दायाँ हाथ, दायाँ पैर, बायाँ फेफड़ा, गले का दायाँ भाग, बायाँ हाथ व पैर इन ग्यारह अंगों से न्यास करें। 

जिस अंग से नक्षत्र में अनिष्टकारी पाप ग्रह हो तो युद्ध, दुर्घटना आदि में उसी अंग में चोट लगे। रोग प्रश्न में वही रोग हो, ऐसा कहें।