
बृहत पराशर होरा शास्त्र के 99वें अध्याय में विकृत प्रसव के बारे में जानकारी दी गई है कि कैसे इसके बुरे फल हो सकते हैं और उनका निवारण कैसे किया जा सकता है, आइए विस्तार से जानें :-
श्लोक 1,2,3,4 का अर्थ
पराशर बोले – अब मैं प्रसव विकार से उत्पन्न अरिष्ट के विषय में कहता हूँ। प्रसव विकार अर्थात विकृत प्रसव होने पर उस कुल व ग्राम का अरिष्ट होता है। समय से पूर्व या बाद में, कम अंग वाला या अधिक अंग वाला, सिर विहीन, दो सिर वाला, स्त्री में पशु जैसी आकृति वाला या पशु में मानव सदृश आकृति वाला प्रसव हो तो प्रसव विकार होता है। इससे विनाश की सूचना मिलती है। घोड़ी, हथिनी या गाय भैंस जुड़वाँ बच्चों को जन्म दें या विजातीय प्रसव हो तो प्रसव विकार होता है। ऐसा होने पर 6 महीने के अंदर राजा या स्वामी का क्षय हो जाता है।
श्लोक 5,6 का अर्थ
जिस घर में स्त्री या पशु को विकृत प्रसव हो उस कुल में महत अनिष्ट होता है। उस दोष की शान्ति के लिए शान्ति विधान भक्तिभाव से करें। यदि नास्तिक बुद्धि से या लोभ से शान्ति नहीं की जाए तो महान संकट उपस्थित होता है।
श्लोक 7 का अर्थ
गाय भैंस का विकृत प्रसव हो तो उस गाय भैंस पशु आदि पशु को परदेश में छोड़ देना चाहिए या किसी गरीब व्यक्ति को दान कर देना चाहिए।
स्त्री विकृत प्रसव शान्ति – श्लोक 8,9,10 का अर्थ
स्त्री को प्रसव विकार हो तो दिन भर व्रत रखकर (रात दिन) अगले दिन रुद्र सूक्त व शान्ति सूक्त का पाठ करवाएँ। बाद में प्राजापत्य विधि से हवन करें। ब्रह्मा, विष्णु, महेश का व ग्रहों का पूजन करें तथा सारा हवन त्रिखल शान्ति अध्याय में बताई गई विधि से करें। बाद में ब्राह्मणों या याचकों को दानादि से संतुष्ट करें। तब मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।
कार्तिक प्रसवादि शान्ति – श्लोक 11,12 का अर्थ
सिंहार्क गत सूर्य में (सौर भाद्रपद) यदि गाय को प्रसव हो तो 6 महीने के अंदर स्वामी का अनिष्ट होता है। माघ सौर मास व् बुधवार को भैंस का प्रसव तथा श्रावण में दिन में घोड़ी का प्रसव हो तो भी यह प्रसव विकार कहलाता है। तब दोष निवारणार्थ शान्ति विधान करना चाहिए।
श्लोक 13,14 का अर्थ
गाय आदि पशुओं का दान या त्याग करना युक्त है तथा शान्ति मध्यम मार्ग है। ऐसा होने पर घी व सरसों का हवन व्याहृतियों द्वारा करना चाहिए। 10000 आहुतियाँ हवन में दें तथा व्रत रखकर यथाशक्ति ब्राह्मण को दक्षिणा दें, तब शान्ति होती है।
श्लोक 15,16,17,18,19,20 का अर्थ
तुला राशि में परम नीचांश पर सूर्य हो तो हजार राजयोगों को नष्ट करने वाला मानव प्रसव होता है। शनि से दुगना मंगल, मंगल से दुगुना बुध, बुध से आठ गुना गुरु, गुरु से आठ गुना शुक्र, शुक्र से 16 गुना चन्द्रमा व चंद्र से 32 गुना सूर्य बलवान होता है। अतः परम नीचगत सूर्य या चंद्र होने पर जातक भाग्य सुख, धन व स्वास्थ्य से रहित होता है। नीच राशि होने पर भी अनिष्ट होता ही है। अतः कल्याणेच्छु व्यक्ति कार्तिक प्रसव व नीचगत चन्द्रमा की शान्ति करें। तब जातक सब प्रकार चिरजीवी होता है।
ऐसी स्थिति में ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इंद्र व ग्रहों का पूजन, कलश स्थापन त्र्यम्बकं मंत्र का जप व होम करना चाहिए। सारी शांति विधि त्रिखल-शान्ति की तरह करें। दान, होम, विप्रभोजन, सुवर्ण या रजत या ताम्र की सूर्य मूर्ति का दान तुलार्क में करें तथा वृश्चिक चंद्र में शिवार्चन व सोमदान करें। जपादि करवाने से अधिक सुख मिलता है।
