महाभागवत – देवी पुराण – अठत्तरवाँ अध्याय 

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श्रीमहादेव जी बोले – वहाँ भगवती कामाख्या के शक्तिपीठ में जो व्यक्ति वैशाख की तृतीया तिथि को भगवती चण्डिका की पूजा करके उनके श्रेष्ठ मन्त्र का जप करता है उसको करोड़ों गुणा अधिक पुण्य प्राप्त होता है तथा उसका पुनर्जन्म नहीं होता।।1-1½।। चतुर्दशी तिथि को शिवरात्रि के दिन मुझ शंकर की पूजा करके देवताओं के लिए भी दुर्लभ सर्वतीर्थस्वरूप भगवती कामाख्या के उस शक्तिपीठ में उपवास करके सावधान होकर मनुष्य को प्रत्येक प्रहार में सदा वहाँ स्थित रहकर परम भक्तिपूर्वक देवी की पूजा करनी चाहिए, ऐसा करने से वह सैकड़ों अश्वमेध यज्ञ करने के समान महापुण्य प्राप्त करता है और काशी में स्नान-दानादि-जन्य जो फल प्राप्त होता है, वह कामाख्यापीठ में शिवरात्रि के पूजन से प्राप्त हो जाता है।।2-5।। मुनिश्रेष्ठ ! कुरुक्षेत्र में करोड़ों गायों का दान करने से जो फल होता है, उससे अधिक फल उसे प्राप्त हो जाता है।।6।। भक्तिपूर्वक जो व्यक्ति मुझे एक बिल्वपत्र प्रदान करता है, वह उत्तम मुक्ति को प्राप्त करता है। यह सत्य है, सत्य है, इसमें कोई संदेह नहीं है।।7।।  

महामुने ! हजारों स्वर्ण-पुष्पों के अर्पण करने से, मणिमाणिक्य के समूहों का अर्पण करने से तथा मूल्यवान रत्नों के द्वारा पूजा करने से मुझे वैसी प्रसन्नता नहीं होती जैसी बिल्वपत्र चढाने से होती है। बिल्वपत्र के नीचे लोककल्याणकारी भगवान् शंकर की पूजा करके मनुष्य श्रेष्ठ सुरत्व प्राप्त करता है और उससे उसका वियोग नहीं होता।।8-9½।। बिल्ववृक्ष के मूल में उत्तमोत्तम तीर्थों का वास होता है। वहाँ भगवान् शंकर की पूजा करने से महापातक का नाश होता है।।10।। सभी लोकों के कल्याण के लिए सर्वलोकेश्वरेश्वर ब्रह्मरूप साक्षात रूद्र (बिल्व-वृक्ष के रूप में) पृथ्वी पर प्रतिष्ठित हैं।।11।।  

मुनिश्रेष्ठ ! इसलिए बिल्ववृक्ष का मूल महापातक का नाश करने वाला तथा सभी तीर्थों से उत्तम है।।12।। महामते नारद ! गङ्गा, काशी, गयातीर्थ, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, यमुना, सरस्वती, गोदावरी, नर्मदा तथा अन्य उत्तम तीर्थ सदा बिल्ववृक्ष के मूल में सन्निहित रहते हैं – ऐसा जानना चाहिए। वहाँ जो देव तथा पितृकर्म विधानपूर्वक किया जाता है, वह निश्चित ही करोड़ों जन्मों तक अक्षय रहता है, ऐसा जानना चाहिए।।13-15।।  

जो मनुष्य बिल्ववृक्ष के नीचे देह-त्याग करता है, वह परम आनन्द तथा ब्रह्मादि देवताओं के लिए भी दुर्लभ पद प्राप्त करता है।16।। यह बिल्वपत्र पुण्यतम, श्रेष्ठतम तथा भगवान् शंकर के लिए सदा प्रीतिकारक है, इसलिए तीन पत्तोंवाले बिल्वपत्र से भगवान् शंकर की पूजा करके मनुष्य संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है। बिल्व-फल भगवान् शंकर के लिए परम आनन्ददायक है जिसे समर्पित कर मनुष्य सद्य: महापुण्य प्राप्त कर लेता है।। 17-18½।। 

मुने ! बिल्व के पत्र तथा फल अन्यत्र जहाँ-कहीं भी भगवन शिव के लिए महाप्रीतिकरक होते हैं, किन्तु पुण्यक्षेत्र कामरूप में इन्हें विशेष रूप से प्रीतिदायक जानना चाहिए।।9½।। मुने ! आपसे अन्य क्या कहूँ। भगवती कामाख्या के शक्तिपीठ से बढ़कर महापुण्य फलप्रदायक कहीं कोई दूसरा स्थान नहीं है।।20।। चैत्रमास के शुक्लपक्ष में अष्टमी तिथि के दिन सर्वतीर्थमय शुभ लौहित्य (ब्रह्मपुत्र नद) – में विधिवत स्नान करके उसके जल से जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक जगदम्बिका कामाख्यादेवी की पूजा करता है, वह संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है।। 21-22।।  

महादेवी का योनिपीठ सर्वतीर्थस्वरूप, सभी तीर्थों में श्रेष्ठ तथा सभी देवताओं के लिए भी दुर्लभ स्थान है।।23।।  

सर्वदेवमयी भगवती पूर्णा जहाँ साक्षात पूज्यतमा हैं, सर्वतीर्थमय ब्रह्मपुत्र नद भी पुण्यप्रद और दुर्लभ हैं, महापुण्यदायी अष्टमीतिथि भी परम दुर्लभ है – इन तीनों का योग बहुत पुण्य संचय से जिसे मिलता है, उसके पृथ्वी पर पुनः जन्म की आशंका ही नहीं रहती।।24-25।। भगवती कामाख्या के उस शक्तिपीठ में जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक ब्रह्मपुत्र नद के जल से अपने पितरों का तर्पण करता है, उसके सभी पितर निर्विकार ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं।।26।। मुनिश्रेष्ठ ! वहाँ किये गए अन्य तप तथा दान भी पुण्यफलदायी हैं, जो अन्य हजारों तीर्थों में किये उन कार्यों से अधिक पुण्यफल प्रदान करने वाले होते हैं।।27।।

इस संसार में जिस प्रकार शिवप्रिया भगवती भवानी पूज्यतमा हैं, पत्तों में तुलसीपत्र और बिल्वपत्र श्रेष्ठ हैं, जैसे लीलाधारियों में गदाधर भगवान् विष्णु श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार सभी तीर्थों में कामाख्या का श्रीयोनिपीठ श्रेष्ठ है।।28-29।। नारद ! जो व्यक्ति योनिपीठ तीर्थराज के इस माहात्म्य को सुनता है, वह देवी के परम पद को प्राप्त कर लेता है।।30।। नारद ! इस प्रकार मैंने योनिपीठ तीर्थराज के अत्यन्त गोपनीय माहात्म्य को बताया। पुनः आप क्या सुनना चाहते हैं।।31।। 

।। इस प्रकार श्री महाभागवत महापुराण के अंतर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘योनिपीठ माहात्म्य वर्णन’ नामक अठत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।।