महाभागवत – देवी पुराण – सतत्तरवाँ अध्याय 

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श्रीनारदजी बोले – महेश्वर ! कामरूप महाक्षेत्र में दस महाविद्याओं की अधिष्ठात्री देवी महेश्वरी कौन है? उनके विषय में बताइये।।1।।  

श्रीमहादेव जी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! साधकों के हित सम्पादन के लिए जप और पूजा का फल प्रदान करने वाली ये दसों महाविद्याएँ इस शक्तिपीठ में स्थित हैं।।2।।  

महामते ! भगवती कामाख्या ही स्वयं आदिशक्ति सनातनी देवी कालिका हैं। उनके बगल में अन्य नौ महाविद्याएँ प्रतिष्ठित हैं।।3।। सर्वविद्यात्मिका काली ही कामाख्यारूपिणी हैं। उस शक्तिपीठ में उनकी तथा अपने इष्टदेवता की पूजा करके भक्तिपूर्वक जो इष्ट मन्त्र का जप करता है, उसका मन्त्र सिद्ध हो जाता है।।4।।  

जो रक्त वस्त्र धारण करने वाली, तीन भयंकर नेत्रों से सुशोभित, चार भुजाओं और विकराल दन्तावली तथा प्रलयकालीन मेघों की आभा से सुशोभित हैं; जो मणिसिंहासन पर विराजमान हैं और सिंह, प्रेत तथा कमल पर आसीन हैं – ऐसी परमेश्वरी महाकालिका भगवती कामाख्या का ध्यान करने वाले भक्तों के लिए भगवती का वाहन सिंह विष्णुस्वरुप, शव शिवस्वरूप तथा कमल ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। लपलपाती जिह्वा वाली, अत्यन्त घोरस्वरूपिणी, स्वर्णकिरीट से प्रकाशित, बहुमूल्य मणि-माणिक्य से जटित उत्तम आभूषणों से अलंकृत तथा सृष्टि-पालन-संहार करने वाली जगद्धात्री कामाख्या की सदा उपासना करनी चाहिए।।5-8।। 

नारद ! इस महापीठ के वाम भाग में भगवती तारा, दक्षिण भाग में भुवनेश्वरी, अग्निकोण में षोडशीविद्या, नैरृत्यकोण में स्वयं भैरवी, वायव्यकोण में छिन्नमस्ता, पृष्ठभाग में बगलामुखी, ईशानकोण में सुंदरी विद्या, ऊर्ध्व भाग में मातङ्गनायिका तथा दक्षिण भाग में धूमावती विद्या प्रतिष्ठित हैं। नीचे के भाग में भस्माचलस्वरुप स्वयं भगवान् शंकर विराजमान हैं।।9-11।।  

पितामह ब्रह्मा तथा भगवान् विष्णु और जो अन्य प्रमुख देवता हैं, वे सभी शक्ति से समन्वित होकर भगवती कामाख्या के लोकदुर्लभ शक्तिपीठ में निरन्तर प्रतिष्ठित रहते हैं।।12।। मुनिश्रेष्ठ ! भगवती को परम प्रसन्न करने की इच्छा वाला जो जितेन्द्रिय व्यक्ति भक्तिपूर्वक अपनी शक्ति की अनुसार प्राप्त वैभव के अनुकूल विविध उपचारों से शक्तिपीठ में परिकरसहित भगवती की पूजा करता है, उसको पुनर्जन्म की आशंका नहीं रहती।। 13-14।। जो व्यक्ति भक्तिभाव से महादेवी भगवती को बिल्वपत्र अर्पित करता है, उसे साक्षात सर्वलोकेश्वरेश्वर शंकर ही जानना चाहिए।।15।। तीन पत्ते वाला बिल्वपत्र ब्रह्मा, विष्णु और शिवात्मक है। यह जड़-चेतनरूप समस्त संसार उससे व्याप्त है।।16।।  

मुनिश्रेष्ठ ! जो व्यक्ति उस बिल्वपत्र को पूर्णा भगवती देवी को अर्पण करता है, उसे सम्पूर्ण संसार का दान करने का फल प्राप्त होता है। वह उत्तम मनुष्य पूर्णकाम होकर पृथ्वी पर विचरण करता है। उसका यह जन्म कृतार्थ हो जाता है तथा कहीं पुनर्जन्म नहीं होता।।17-18।। महामते ! भगवती के उस शक्तिपीठ में शरीर में भस्म लगाकर भक्तिपूर्वक जो व्यक्ति भस्माचलस्वरुप भगवान् शंकर की पूजा करता है, वह मनचाहा भोग प्राप्त कर परम मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।।19।। शैव, शाक्त तथा वैष्णव को सर्वदा रुद्राक्ष धारण किये रहना चाहिए। रुद्राक्ष से युक्त होकर जो व्यक्ति कर्म करता है, वह महापुण्य प्राप्त करता है।।20।।  

भगवती कामाख्या के शक्तिपीठ में रुद्राक्ष धारण किया हुआ व्यक्ति संहारकारक भगवान् रूद्र की पूजा कर रुद्रत्व को प्राप्त करता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।।21।। भगवती कामाख्या के शक्तिपीठ में अमावस्या, चतुर्दशी, अष्टमी अथवा तिथिक्षय होने पर या नवमी तिथि की रात्रि में भगवती भैरवी का साहसपूर्वक जो जितेन्द्रिय व्यक्ति निर्भय होकर मन्त्र जपता है, उसे निश्चित ही भगवती का प्रत्यक्ष दर्शन होता है।।22-23।।  आत्मसंरक्षा तथा मंत्रसिद्धि के लिए जो व्यक्ति देवी भगवती के कवच का पाठ करता है उस व्यक्ति को कभी भय नहीं होता।।24।। मुनिश्रेष्ठ ! इसलिए पूर्व में मनुष्य को रक्षा विधान करके निर्भीक होकर सावधानीपूर्वक अपने इष्ट-मन्त्र का जप करना चाहिए।।25।।  

नारदजी बोले – महेश्वर ! महाभय को दूर करने वाला भगवती कामाख्या का कवच कैसा है, वह अब हमें बतायें।।26।।  

श्रीमहादेवजी बोले – सुरश्रेष्ठ ! भगवती कामाख्या का परम गोपनीय, महाभय को दूर करने वाला तथा सर्वमङ्गलदायक वह कवच सुनिए, जिसकी कृपा तथा स्मरण मात्र से सभी योगिनी-डाकिनीगण, विघ्नकारी राक्षसियाँ तथा बाधा उत्पन्न करने वाले अन्य उपद्रव, भूख, प्यास, निद्रा तथा अन्य विघ्नदायक दूर से ही पलायन कर जाते हैं।।27-29।। इस कवच के प्रभाव से मनुष्य भयरहित, तेजस्वी तथा भैरवतुल्य हो जाता है। जप, होम आदि कर्मों में समासक्त मन वाले भक्त की मन्त्र-तंत्रों में सिद्धि निर्विघ्न हो जाती है।।30।।  

कामाख्या – कवच संस्कृत में 

ॐ प्राच्यां रक्षतु में तारा कामरुपनिवासिनी। 

आग्नेय्यां षोडशी पातु याम्यां धूमावती स्वयम।।31।।  

नैऋर्त्यां भैरवी पातु वारुण्यां भुवनेश्वरी। 

वायव्यां सततं पातु छिन्नमस्ता महेश्वरी।।32।।  

कौबेर्यां पातु में देवी श्रीविद्या बगलामुखी। 

ऐशान्यां पातु में नित्यं महात्रिपुरसुन्दरी।।33।।  

ऊर्ध्वं रक्षतु में विद्या मातङ्गी पीठवासिनी। 

सर्वत: पातु में नित्यं कामाख्या कालिका स्वयम।।34।।  

ब्रह्मरूपा महाविद्या सर्वविद्यामयी स्वयम। 

शीर्षे रक्षतु में दुर्गा भालं श्रीभवगेहिनी।।35।।  

त्रिपुरा भ्रूयुगे पातु शर्वाणी पातु नासिकाम। 

चक्षुषी चण्डिका पातु श्रोत्रे नीलसरस्वती।।36।।  

मुखं सौम्यमुखी पातु ग्रीवां रक्षतु पार्वती। 

जिह्वा रक्षतु में देवी जिह्वाललनभीषणा।।37।।  

वाग्देवी वदनं पातु वक्ष: पातु महेश्वरी। 

बाहू महाभुजा पातु करांगुली: सुरेश्वरी।।38।।  

पृष्ठत: पातु भीमास्या कट्यां देवी दिगम्बरी। 

उदरं पातु में नित्यं महाविद्या महोदरी।।39।।  

उग्रतारा महादेवी जङ्घोरु परिरक्षतु। 

गुदं मुष्कं च मेढ्रं च नाभिं च सुरसुन्दरी।।40।।  

पदांगुली: सदा पातु भवानी त्रिदशेश्वरी। 

रक्तमांसास्थितमज्जादीन्पातु देवी शवासना।।41।।  

महाभयेषु घोरेषु महाभयनिवारिणी। 

पातु देवी महामाया कामाख्यापीठनिवासिनी।।42।।  

भस्माचलगता दिव्यसिंहासनकृताश्रया। 

पातु श्रीकालिकादेवी सर्वोत्पातेषु सर्वदा।।43।।     

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं कवचेनापि वर्जितम। 

तत्सर्वं सर्वदा पातु सर्वरक्षणकारिणी।।44।।  

 

कामाख्या कवच – हिंदी में 

कामरूप में निवास करने वाली भगवती तारा पूर्व दिशा में, षोडशी देवी अग्निकोण में तथा स्वयं धूमावती दक्षिण दिशा में रक्षा करें।।31।।  

नैऋर्त्यकोण में भैरवी, पश्चिम दिशा में परमेश्वरी और वायव्यकोण में भगवती महेश्वरी छिन्नमस्ता निरन्तर मेरी रक्षा करें।।32।। उत्तर दिशा में श्रीविद्या देवी बगलामुखी तथा ईशानकोण में महात्रिपुरसुन्दरी सदा मेरी रक्षा करें।।33।। भगवती कामाख्या के शक्तिपीठ में निवास करने वाली मातङ्गी विद्या उर्ध्वभाग में और भगवती कालिका कामाख्या स्वयं सर्वत्र मेरी नित्य रक्षा करें।।34।। ब्रह्मरूपा महाविद्या सर्वविद्यामयी स्वयं दुर्गा सिर की रक्षा करें और भगवती श्रीभवगेहिनी मेरे ललाट की रक्षा करें।।35।। त्रिपुरा दोनों भौंहों की, शर्वाणी नासिका की, देवी चण्डिका आँखों की तथा नीलसरस्वती दोनों कानों की रक्षा करें।।36। ।  

भगवती सौम्यमुखी मुख की, देवि पार्वती ग्रीवा की और जिह्वाललनभीषणा देवी मेरी जिह्वा की रक्षा करें।।37।।  वाग्देवी वदन की, भगवती महेश्वरी वक्ष:स्थल की, महाभुजा दोनों बाहु की तथा सुरेश्वरी हाथ की अँगुलियों की रक्षा करें।।38।। भीमास्या पृष्ठभाग की, भगवती दिगम्बरी कटि प्रदेश की और महाविद्या महोदरी सर्वदा मेरे उदर की रक्षा करें।।39।। महादेवी उग्रतारा जङ्घा और ऊरुओं की एवं सुरसुन्दरी गुदा, अण्डकोश, लिङ्ग तथा नाभि की रक्षा करें।।40।। भवानी त्रिदशेश्वरी सदा पैर की अँगुलियों की रक्षा करें और देवी शवासना रक्त, मांस, अस्थि, मज्जा आदि की रक्षा करें।।41।। भगवती कामाख्या के शक्तिपीठ में निवास करने वाली, महाभय का निवारण करने वाली देवी महामाया भयंकर महाभय से रक्षा करें।।42।। भस्माचल पर स्थित दिव्य सिंहासन पर विराजमान रहने वाली श्रीकालिका देवी सदा सभी प्रकार के विघ्नों से रक्षा करें।।43।। जो स्थान कवच में नहीं कहा गया है, अतएव रक्षा से रहित है उन सबकी रक्षा सर्वदा भगवती सर्वरक्षककारिणी करें।।44।।   

मुनिश्रेष्ठ ! मेरे द्वारा आपसे कहा गया सभी प्रकार की रक्षा करने वाला भगवती कामाख्या का जो उत्तम कवच है, वह अत्यन्त गोपनीय एवं श्रेष्ठ है।।45।।  

इस कवच से रक्षित होकर साधक निर्भय हो जाता है। मंत्रसिद्धि का विरोध करने वाले भयंकर भय उसका कभी स्पर्श तक नहीं करते हैं।।46।। महामते ! जो व्यक्ति इस महान कवच को कण्ठ में अथवा बाहु में धारण करता है, उसे निर्विघ्न मनोवांछित सिद्धि मिलती है।।47।। वह अमोघ आज्ञा वाला होकर सभी विद्याओं में प्रवीण हो जाता है तथा सभी जगह दिनानुदिन मङ्गल और सुख प्राप्त करता है।।48।। जो जितेन्द्रिय व्यक्ति इस अद्भुत कवच का पाठ करता है, वह भगवती के दिव्य धाम को  जाता है, यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं है।।49।।  

।। इस प्रकार महाभागवत महापुराण के अंतर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘श्रीमहाकामाख्या कवच वर्णन’ नामक सतत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।