महाभागवत – देवीपुराण – तैंतीसवाँ अध्याय 

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इस अध्याय में कार्तिकेय जी द्वारा तारकासुर का वध, देवसेना में हर्षोल्लास का वर्णन किया गया है. 

श्रीमहादेवजी बोले – तदनन्तर युद्धभूमि में भयानक गर्जना करते हुए कार्तिकेय जी ने दैत्यराज तारकासुर पर यमदण्ड के समान भयंकर बाणों से प्रहार किया. तत्पश्चात क्रोध से उन्मत्त हुए तारकासुर ने अपनी रत्नजटित भयंकर शक्ति लेकर देवसेनापति के ऊपर चलाई. देवताओं के लिये असहनीय उस शक्ति को आती देखकर देवगण भय से मोहित होकर काँपने लगे।।1-3।। ब्रह्माजी दिव्य महर्षियों के साथ स्वस्तिवाचन करने लगे. पार्वती पुत्र देवसेनानी कार्तिकेय जी ने हँसते हुए सबके देखते-देखते अपनी शक्ति से उस शक्ति को भस्मसात कर दिया. तब देवगण अत्यंत प्रसन्न होकर कार्तिकेय जी के ऊपर पुष्पवृष्टि करने लगे. ब्रह्माजी ने बार-बार उनकी प्रशंसा की. सिद्ध, गन्धर्वगण महादेवपुत्र कार्तिकेय के पराक्रम को देखकर अत्यन्त विस्मित हुए. नारदजी ! तब दैत्यराज तारकासुर ने अत्यन्त क्रोधपूर्वक शीघ्र ही धनुष उठाकर युद्ध में दुर्जेय स्कन्द के ऊपर घनघोर शरवृष्टि करके उन्हें ढक दिया तथा उनके वाहन मयूर पर भी प्रहार किया. मुनिश्रेष्ठ ! तदनन्तर शिवपुत्र कार्तिकेय जी ने भी बाणों के उस जाल को काट दिया और वे करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा से सुशोभित होने लगे।।4-9।।

इसी बीच वृत्रासुर का संहार करने वाले इन्द्र भी दूसरे बड़े-बड़े राक्षसों को मारकर पार्वती पुत्र कार्तिकेय के निकट आये।।10।। उस युद्धभूमि में मरकतमणी के विशाल पर्वत के समान अपने चित्र-विचित्र वर्ण वाले मयूर वाहन पर स्थित पार्वती पुत्र कार्तिकेय तथा ऎरावत नाम के गजराज पर स्थित इन्द्र अत्यन्त सुशोभित हुए. मुनिवर नारद ! उन दोनों को युद्धभूमि में सन्नद्ध देखकर भयंकर पराक्रमी तारकासुर ने कुमार कार्तिकेय तथा इन्द्र – दोनों पर बाणों की वर्षा करते हुए प्रहार किया।।11-12½।। उस घोर संग्राम में तारकासुर के उस शरजाल को काटकर महाबली कुमार और इन्द्र सिंहनाद करने लगे तथा उन्होंने अनेक प्रकार के भयंकर शस्त्रों से तारकासुर पर प्रहार किया।।13-14।। 

नारदजी ! इन्द्र ने उस दैत्य की ओर वेगपूर्वक अपना वज्र चलाया, किंतु उसके वक्ष:स्थल से टकराकर आधे क्षण में ही उसके सैकड़ों टुकड़े हो गये. तब क्रोध से लाल आँखें किये हुए दैत्यराज ने तलवार उठाकर कार्तिकेय को छोड़कर देवराज इन्द्र की ओर धावा किया. तदनन्तर पार्वतीपुत्र भगवान कार्तिकेय ने क्रोधित होकर अपने वाहन मयूर को उस ओर मोड़ते हुए तलवार लिये उसके हाथ को क्षणमात्र में काट डाला।।15-17।।

तब दैत्यराज तारकासुर दाएँ हाथ में भयंकर परिघ लेकर अत्यन्त क्रोधपूर्वक देवसेनापति की ओर दौड़ा. ब्रह्माजी की दी हुई अत्यन्त भयंकर उस शक्ति को लेकर रणभूमि में कार्तिकेय जी ने अपनी ओर आते हुए दैत्यराज तारकासुर पर प्रहार किया. उस शक्ति द्वारा बेधे जाने से नीलाचल पर्वत के समान महाबली वह दैत्यराज धरणी को कोलाहलपूर्ण करता हुआ भूमि पर गिर पड़ा।।18-20।। उस भयंकर दैत्य के मारे जाने से देवता, गन्धर्व, किन्नरगणों को महान हर्ष प्राप्त हुआ, सभी दिशाएँ प्रकाश से भर गई, सूर्य सतेज हो गये और संसार सुव्यवस्थित हो गया।।21-22।।

।।इस प्रकार श्रीमहाभागवमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “तारकासुरवध” नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।33।।