महाभागवत – देवी पुराण – बत्तीसवाँ अध्याय 

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इस अध्याय में देवासुर-संग्राम में देवसेनापति कार्तिकेय तथा तारकासुर के भीषण युद्ध का वर्णन है. 

श्रीमहादेवजी बोले – तुरही के निनाद, भेरी तथा पणव (नगाड़ों) – की ध्वनियों, दोनों ओर की सेनाओं के चतुर्दिक सिंहनादों और रथ की धुरी के भयंकर घोष से पृथ्वी तथा आकाश का अन्तराल व्यास हो गया और पृथ्वी भी काँपने लगी. इसके बाद युद्ध आरंभ हो गया।।1-2।। इसी बीच ब्रह्माजी सभी महर्षियों के साथ एक दिव्य रथ में बैठकर देवताओं तथा दानवों के परस्पर मारकाट वाले, घोर, कोलाहलपूर्ण तथा रोमांचकारी युद्ध को देखने के लिये आकाश में उपस्थित हुए।।3-4।। 

इन्द्र ने अपने वज्र को चलाकर उस युद्ध में महाबल एवं पराक्रम से युक्त सैकड़ों-हजारों दैत्यो का संहार किया. उसी प्रकार वरुण ने भी क्रोधपूर्वक अपने पाश से श्रेष्ठ असुरों को बाँधकर अपने अस्त्र से प्रहार कर उन्हें यमपुरी भेज दिया. अन्य सभी देवताओं ने भी अनेक प्रकार के बाण चलाकर युद्धभूमि में दैत्यराज तारकासुर के अनेक सैनिकों को मार गिराया. कार्तिकेय जी ने भी युद्धभूमि में दुष्टात्मा तारकासुर से युद्ध करके अनेक महाबली तथा पराक्रमी दैत्यों का संहार किया।।5-8।। 

इस प्रकार देवताओं के शस्त्रास्त्रों के प्रहार से असुरगण तारकासुर के समीप प्राण छोड़ने लगे. वहाँ की युद्धभूमि मरे हुए असुरों, उनके हाथी-घोड़ों तथा टूटे हुए रथों से भरकर अगम्या हो गयी. मुनिवर ! तदनन्तर मारे गये दैत्यसमूहों के रक्त से दोनों सेनाओं के बीच एक भयानक नदी बहने लगी।।9-11।।

नारदजी ! इस प्रकार अपनी सेना के नष्ट होने पर दैत्यश्रेष्ठ तारकासुर ने सेनापति कार्तिकेय के साथ भयानक युद्ध किया. उसने युद्ध में सैकड़ों-हजारों शस्त्रों से कार्तिकेय पर प्रहार किया, जिन्हें गौरीपुत्र ने हँसते हुए काट डाला. उसी प्रकार उस युद्ध में देवसेनापति कार्तिकेय के चलाए सैकड़ों-हजारों दिव्यास्त्रों को तारकासुर ने भी काट डाला. इस प्रकार बाण समूहों के द्वारा परस्पर प्रहार करते हुए उन दोनों के युद्ध को देखकर देवता और किन्नर अत्यन्त आश्चर्यचकित हुए।।12-15।।

तदनन्तर क्रुद्ध दैत्य तारकासुर ने रोष में आकर अनेक स्वर्ण-पुंख (बाण का अग्रभाग) – वाले, यमदण्ड के समान भयंकर बाणों को सेनापति कार्तिकेय पर छोड़ा. नारदजी ! कार्तिकेय जी ने भी अत्यन्त भयंकर अर्धचन्द्र बाण चलाया. उसे तारकासुर ने भी आधे निमेष में ही काट डाला. तत्पश्चात देवसेनापति ने अत्यन्त क्रोधपूर्वक तीव्र वेगवाले तथा झुके हुए पर्व वाले दस भयंकर बाणों से श्रेष्ठ दैत्य को पुन: वेध डाला. मुनिवर ! वह दैत्यराज तारकासुर उन बाणों से घायल तथा मूर्च्छित होकर रथ के पिछले भाग में गिर पड़ा।।16-19।। 

तब पुन: उठकर बार-बार सिंहनाद करते हए उस दैत्य ने क्रोधपूर्वक शूल उठा लिया. उस महाशूल को उठाया देखकर शत्रुसूदन कार्तिकेय ने भी अपना महान ओजस्वी शूल चलाया. उस शूल से दैत्य तारकासुर के हाथ में स्थित शूल तत्क्षण ही भस्मीभूत हो गया. यह एक आश्चर्यजनक सी बात हुई. मुने ! तब क्रोध से जबड़ा चाटते हुए दैत्य तारकासुर ने युद्धभूमि में देवसेनापति की ओर शक्तिशाली लोहे की बनी भयंकर गदा चलायी. देवसेनापति ने उस भयंकर गदा को अपनी गदा से सहसा ही तोड़कर उसके हाथ से गिरा दिया और उसके हाथों पर प्रहार भी किया. तब दानवराज एक अन्य दूसरी गदा उठाकर बार-बार सिंहनाद करते हुए देवसेनापति की दौड़ा. हाथ में गदा लिए उस महादैत्य को अपनी ओर आता देखकर कार्तिकेय जी ने क्षुरप (घोड़े की नाल वाले जैसे अग्रभाग वाले बाण) – से उसकी दोनों भुजाओं पर प्रहार किया. उस अस्त्र से आहत होकर युद्धभूमि में दैत्यराज तारकासुर ने युगान्तकालिक मेघ की भाँति घोर गर्जना की।।20-27।।

।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “कार्तिकेय-तारकासुरसंग्रामवर्णन” नामक बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।32।।