महाभागवत – देवी पुराण – इकतीसवाँ अध्याय

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इस अध्याय में कुमार कार्तिकेय का तारकासुर के विनाश के लिए ससैन्य उद्यत होना है, ब्रह्माजी द्वारा उन्हें वाहन के रूप में “मयूर” तथा अमोघ शक्ति प्रदान करना है, कार्तिकेय को देवसेना का सेनापतित्व प्राप्त होने आदि का वर्णन है. 

नारदजी बोले – महादेव ! आप यह बताने की कृपा करें कि पार्वतीपुत्र कार्तिकेय ने युद्ध भूमि में देवशत्रु तारकासुर का कैसे संहार किया? प्रभो ! अपने माता-पिता से उनका परिचय कैसे हुआ और देवी पार्वती तथा महेश्वर ने पुत्र प्राप्ति के बाद क्या किया?।।1-2।।

श्रीमहादेवजी बोले – वत्स ! युद्ध भूमि में पार्वती पुत्र ने जिस प्रकार तारकासुर का संहार किया उसे मैं कहता हूँ सुनें, साथ ही अपने माता-पिता से जिस तरह उनका परिचय हुआ, वह सम्पूर्ण वृत्तान्त भी मैं कहता हूँ, आप ध्यान से सुनें।।3-4।। एक बार तारकासुर से सम्यक् पीड़ित होकर सारे देवता ब्रह्माजी के पास आये और उन महामति को प्रणाम कर कहने लगे – ।।5।।

देवताओं ने कहा – प्रभो ! ब्रह्मन् जिस प्रकार यह तारकासुर हम सबको सदा पीड़ित करता रहता है, उसको क्या आप नहीं जानते, क्या हम आपके समक्ष कहें. इस समय उसके संहार के लिए आप महादेव पुत्र महाबली महान देव कार्तिकेय को शीघ्र ही रणभूमि में भेजिए।।6-7।।

श्रीमहादेवजी बोले – उनकी यह बात सुनकर लोकपितामह ब्रह्माजी ने सभी देवताओं के सामने कार्तिकेय से कहा – ।।8।।

ब्रह्माजी बोले – शिवात्मज ! आप सभी लोकों के रक्षक हैं. तात ! इस समय तारक दैत्य को मारकर देवताओं की रक्षा करें. तारकासुर के सताये ये देवगण आपका आश्रय लेकर उद्धार प्राप्त करें, इसलिए आप उस देवशत्रु का संहार करें।।9-10।।

श्रीमहादेवजी बोले – तब देवताओं के आगे स्थित महाबलशाली कार्तिकेय जी ने स्निग्ध गंभीर वाणी में उन ब्रह्माजी से कहा – ।।11।।

कार्तिकेय जी बोले – मैं उस दुष्ट और दुर्धर्ष दैत्यराज तारकासुर का युद्ध में संहार करूँगा. मेरे लिए वाहन की व्यवस्था की जाए. 

श्रीमहादेवजी बोले – महामुने ! ऎसा कहे जाने पर भगवान ब्रह्माजी ने शिव पुत्र कार्तिकेय के लिए वायु समान तीव्रगामी मयूर वाहन प्रदान किया. उन महातेजस्वी कार्तिकेय को तारकासुर का वध करने के लिए स्वर्ण परिष्कृत एक शक्ति भी प्रदान की, जिसकी आभा करोड़ों सूर्य के समान थी. उसके समान महाशक्ति तीनों भुवनों में नहीं है. इस कारण शिवपुत्र कार्तिकेय “शक्तिधर” यह नाम भी प्राप्त करेगा।।13-15।। तब लोकपितामह ब्रह्माजी ने सारी देवसेना की रक्षा के लिए कार्तिकेय को सेनापति बनाकर युद्ध भूमि में भेजा।।16।।

वे महाबली, पराक्रमी कार्तिकेय जी ब्रह्माजी को साष्टांग प्रणाम कर तथा उस भयावह शक्ति को लेकर मयूर वाहन पर आरूढ़ हो गये।।17।। मुने ! तदनन्तर कार्तिकेय जी को आगे करके सभी देवता युद्ध करने के लिए दैत्यराज तारकासुर की नगरी की ओर आये।।18।। तदनन्तर आते हुए उन देवताओं को घोर कोलाहल को सुनकर अपने असुर समूह के साथ दैत्यराज युद्ध के लिए तत्पर हुआ।।19।। वह दुर्धर्ष दैत्यराज अगणित घुड़सवारों और पैदल सिपाहियों के साथ हजारों हाथी-घोड़े लेकर युद्ध के लिए व्यवस्थित हो गया।।20।।

श्रेष्ठ मयूर वाहन पर आरूढ़, हाथ में चमकती हुई शक्ति धारण किये और सभी देवताओं से घिरे सेनानी कार्तिकेय को आता देखकर तारकासुर भी स्वर्णमण्डित रथ पर आरूढ़ होकर निकल पड़ा. उसके रथ पर सिंहवाहांकित अनेक ध्वजाएँ तथा पताकाएँ सुशोभित हो रही थीं।।21-22।। महामते ! जब वह अपने रथ के धुरे के घोर शब्द से धरती को कँपाता हुआ आगे बढ़ा, तब अति भयंकर अपशकुन दिखाई देने लगे. मुने ! सूर्य का भेदन करके उसके रथ के समीप ही उल्कापात होने लगे और घोड़ों की आँखों से अश्रुधारा निकलने लगी, सभी योद्धागण दु:खीमन हो गये और गृध्रादि अशुभ पक्षीगण भयानक शब्द करते हुए गिरने लगे।।23-25।।

इस प्रकार के अनेक भयानक अपशकुनों को देखकर भी देवताओं को पीड़ित करने वाला वह दैत्यराज तारकासुर विशाल दिव्य धनुष लेकर क्रोधपूर्वक शिवपुत्र कार्तिकेय को युद्ध में जीतने की लालसा से आगे बढ़ा।।26।। मुने ! जिनकी माता स्वयं युद्धभूमि में सभी श्रेष्ठ दैत्यों का संहार करने वाली पर्वतराज हिमालय की पुत्री भगवती पार्वती हैं तथा जिनके पिता प्रलयंकारी रुद्र हैं, उन शक्तिसंपन्न कार्तिकेय को पराजित करने में कौन समर्थ है।।27।।

।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में तारकासुर संग्राम में “कुमारागमनवर्णन” नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।