महाभागवत – देवी पुराण – इक्कीसवाँ अध्याय 

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इस अध्याय में शंकर जी का सती को पुन: पत्नी रूप में प्राप्त करने के लिए हिमालय पर तपस्या में स्थित होना है, दोनों सखियों के साथ देवी पार्वती को लेकर हिमालय का वहाँ जाना है. 

श्रीमहादेवजी बोले – उन मुनिश्रेष्ठ के चले जाने पर मेना के साथ गिरिराज हिमालय ने निश्चित रूप से समझ लिया कि पार्वती पुन: भगवान शंकर की अर्धांगिनी होंगी।।1।। मुने ! इसी बीच भगवान शंकर अपने पुराने स्थान को छोड़कर दुष्कर तपस्या करने के लिए हिमालय पर्वत के शिखर पर चले गये।।2।। प्राचीन काल में ब्रह्मलोक से आकर जहाँ गंगा स्वयं अवतरित हुई थीं, वहाँ परम योगी भगवान विश्वेश्वर पूर्णब्रह्म के ध्यानपरायण होकर समाधि के आनन्द में लीन हो गये।।3½।। 

उन भगवान शंकर के इस प्रकार ध्यानमग्न हो जाने पर कुछ श्रेष्ठ प्रमथगण वहाँ ध्यान करने लगे, कुछ उनकी सेवा में लग गये और अन्य गण उनसे कुछ दूरी पर स्थित हो गये।।4-5।। प्रमथगण फल-पुष्प चुनते हुए और नाचते-गाते हुए आपस में उत्सुकतापूर्वक गेरु आदि को बाँटकर प्रतिदिन खेलते थे।।6।। एक बार सभी गन्धर्व और किन्नर भगवान शंकर को आया हुआ देखकर महात्मा गिरिराज से कहने लगे – प्रभो ! गिरीन्द्र ! आपके शिखर पर समस्त प्रमथगणों के साथ भगवान महेश्वर तपस्या करने के लिए आये हैं।।7-8।। 

चन्द्रलेखा को मस्तक पर धारण करने वाले, योगी, जटाधारी तथा महात्मा वे भगवान शिव उष:काल में प्रस्थनगर के समीप ठहरे हैं. ध्याननिष्ठ और सेवा परायण बहुत-से प्रमथगण भी उनके निकट स्थित हैं. उनके अन्य करोड़ों सेवकगण कुछ दूरी पर नाचते-गाते, खेलते और हँसते रहते हैं. उनमें से कुछ दिगम्बर हैं तो कुछ व्याघ्रचर्म पहने हुए हैं. सभी उज्ज्वल भस्म तथा मस्तक पर जटा-मुकुट धारण किये हुए हैं।।9-12।। पर्वतराज ! भूतनाथ भगवान शंकर का ऎश्वर्य अद्भुत है. महाराज ! एक बार आप स्वयं चलकर उन्हें मन भरकर देख लीजिए।।13।।

पर्वतों के अधिपति हिमवान उन लोगों की इस बात को सुनकर वहाँ गये, जहाँ भगवान विश्वेश्वर कठिन तपस्या कर रहे थे।।14।।

उसके बाद हिमवान ने भक्तिपूर्वक भगवान शंकर की पूजा की, भगवान शंकर ने भी उनकी पूजा आदर के साथ ग्रहण की।।15।। तदनन्तर विधिपूर्वक पूजित भगवान शंकर ने पर्वतराज को प्रसन्न करते हुए कहा – महाराज ! आपके पुण्यमय निर्जन शिखर पर समस्त प्रमथगणों के साथ मैं तपस्या करने आया हूँ. पुण्यात्मा गिरिराज ! आप अपने राज्य में वैसी व्यवस्था करें जिससे कोई भी व्यक्ति मेरे निकट कभी भी न आ सके. संसर्ग से तपस्या की हानि होती है, इसलिए भूधर ! निश्चय ही योगिजन एकान्त स्थान पर निवास करते हैं, जिससे संग न हो सके।।16-18½।।

भूधर ! आप मुनियों, यक्षों, किन्नरों, देवताओं, राक्षसों और द्विजातियों के आश्रय हैं. धर्मवित् आप सभी के व्यवहार को जानते हैं. महामते ! आप धर्मज्ञ हैं. मैं आपसे अधिक क्या कहूँ? वे महेश्वर गिरिराज से इतना कहकर चुप हो गये।।19-21।। उनके स्थिर हो जाने पर गिरिराज ने नम्रता और प्रीतिपूर्वक भगवान शिव से कहा – देवाधिदेव जगन्नाथ ! आप मेरे सौभाग्य से ही यहाँ आये हैं।।22।। ब्रह्मादि देवताओं के द्वारा भी मेरे शिखर पर तप करना दुर्लभ है. जगदीश्वर ! इस निर्जन स्थान पर आप यथेष्ट तप करने में समर्थ हैं।।23।।

साक्षात् इन्द्र भी मेरे समान नहीं हैं, क्योंकि आप अपने गणों के साथ अपनी (तपस्या की) अभिलाषा पूर्ण करने के लिए यहाँ पधारे हैं. मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ. इस संसार में मुझसे अधिक कोई पुण्यवान नहीं हैं, क्योंकि भगवन् ! मेरे इस शिखर पर आप तपस्या करने आये हैं. प्रभो ! आपके निकट यहाँ कोई भी व्यक्ति नहीं आयेगा. महादेव ! आप यहाँ एकान्त में इच्छानुसार तप करें।।24-26½।।   

गिरिराज इस प्रकार कहकर अपने भवन में चले गये. हिमालय ने अपने अधीनस्थ जनों तथा जनपद में रहने वाले अन्य निवासियों को बुलाकर बार-बार अनुशासित करते हुए आज्ञा दी कि जिस शिखर पर गंगा का अवतरण हुआ है, वह स्थान भगवान महेश्वर का है. मेरी आज्ञा के बिना किसी विशिष्ट व्यक्ति को भी वहाँ नहीं जाना चाहिए. यदि मेरी आज्ञा का उल्लंघन करके कोई व्यक्ति वहाँ जाएगा तो वह निश्चय ही दण्ड का भागी होगा और वध के योग्य होगा।।27-30।। 

उनकी इस आज्ञा से भयभीत देवता, गन्धर्व, किन्नर, पिशाच, राक्षस, मनुष्य तथा पशु हिमालय के उस भूभाग पर नहीं जाते थे, जहाँ पर भगवान चन्द्रशेखर विराजमान थे. वे महान तपस्वी, महायोगी उस निर्जन स्थान पर उग्र तपस्या करने लगे।।31-32।। मनोहर अंगों से युक्त सुमुखी पार्वती भी अपने पिता के घर में दिन-प्रतिदिन बढ़ते हुए विवाह के योग्य हो गयीं।।33।। नारदजी के वाक्य का स्मरण करके महामति पर्वतराज हिमवान ने निश्चिन्त रहते हुए पार्वती के विवाह के प्रति कोई चेष्टा नहीं की. तब एक दिन जगन्माता पार्वती ने स्वयं ही अपने माता-पिता से कहा – मैं तपस्या करने के लिए भगवान शंकर के समीप जाऊँगी. 

जब काममोहित ब्रह्मा अपनी पुत्री संध्या को धर्षित करने के लिए उद्यत हुए, उसी समय आकाश में स्थित भगवान शंकर संसार के स्वामी उन पितामह ब्रह्मा को बार-बार धिक्कारने लगे. तब लज्जित होकर ब्रह्मा म्लानमुख हो गये. वे संसार को मोहित करने वाली मुझ शिवा की तपपूर्वक आराधना करने लगे. तदनन्तर मेरे प्रसन्न होने पर उन्होंने मनोभिलषित वर माँगा. पितामह ब्रह्मा वहीं मुझसे बोले कि माता ! आप मनोहर रूप धारण करके संसार से विमुख हुए प्रभु महादेव को मोहित करें. आपको छोड़कर उनके मन को आकर्षित करने वाला कोई अन्य नहीं हो सकता, इसलिए आप अवतार लेकर भगवान शंकर को मोहित करने वाली होवें।।34-40।। 

स्त्री प्राप्ति की मेरी इच्छामात्र को देखकर भगवान शंकर ने मेरी निन्दा की. उससे मैं लज्जित और दु:खी होकर आपके आश्रय में आया हूँ. इसलिए आप मुझे अनुगृहीत करें और भगवान शंकर को मोहित करें।।41½।। जब वे भगवान शंकर सभी प्रकार के संग का परित्याग कर एकान्त में निवास करेंगे, उसी समय आप इच्छानुकूल रूप धारण कर उन भगवान शंकर को मोहित करेंगी।।42½।। 

इस प्रकार ब्रह्मा का सम्भाषण और याचना सुनकर उनकी तपस्या से सन्तुष्ट होकर मैंने उनकी बात पूर्व में ही मान ली थी. इसलिए दक्ष के घर में सती के रूप में जन्म लेकर मैंने एक बार उन्हें उसी प्रकार मोहित किया था, जिस प्रकार सामान्य पुरुष को कोई सुन्दरी स्त्री मोहित करती है।।43-44½।। प्रजापति दक्ष के पुण्य नष्ट हो जाने पर आप दोनों ने मेरी उपासना की थी, तब दक्ष के घर से मुझ शिवप्रिया ने आपके घर में जन्म लिया है. वे परमेश्वर भगवान शंकर भी सती विरह से पीड़ित होकर मुझे ही प्राप्त करने के लिए दीर्घकाल से तप कर रहे हैं. मैं उनको वचन दे चुकी हूँ, अत: पुन: उनको ही पति के रुप में प्राप्त करूँगी. इसलिए मैं वहीं जाऊँगी, जहाँ भगवान चन्द्रशेखर सम्पूर्ण प्रमथ गणों के साथ निर्जन स्थान पर तपस्या में संलग्न हैं. वहाँ स्थित होकर मैं भगवान शंकर को उसी प्रकार मोहित करूँगी कि वे तपस्या का परित्याग कर मुझे पत्नी के रूप में अंगीकार करें।।45-49।।   

मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार उनकी प्रार्थनापूर्ण वाणी को सुनकर और देवर्षि नारद द्वारा कही गई बात को स्मरण कर महामति गिरिराज हिमालय ने अपनी पुत्री को भगवान शंकर के समीप ले जाने के लिए सहसा मन बना लिया।।50½।। मुनीश्वर ! मेना आँख में आँसू भरकर शीघ्र ही पार्वती को अपनी गोद में लेकर जोर-जोर से रोने लगीं और अपनी पुत्री से कहने लगीं – हा माता ! आप मेरे प्राण के समान प्रिय और कोमलांगी हैं, मुझे छोड़कर आप घोर वन में क्यों जाना चाहती हैं।।51-52½।। तदनन्तर पार्वती उनको बार-बार सान्त्वना देकर अपने सुन्दर करकमल से उनके आँसू पोंछकर कहने लगीं – ।।53½।। 

माता ! आप सुन्दर बुद्धिवाली हैं. आप मेरे लिए चिन्ता ना करें. मुझ पुत्री को अशोचनीय जानकर भी आप क्यों इस प्रकार मोहित हो रही हैं. मैं नित्य आनन्दस्वरूपिणी साक्षात् आद्या प्रकृति हूँ. मुझे घर में अथवा वन में कहीं भी दु:ख नहीं हैं. मैं श्मशान में निवास करने वाली, महाकाली, शवरूपी आसन पर रहने वाली हूँ. माता ! मुझे किसी भी निर्जन स्थान में भय नहीं है, आप निश्चिंत रहें. मैं निश्चित ही उन महादेव को मोहित करके पुन: घर आती हूँ और उन शम्भु को पति के रूप में प्राप्त कर भगवान शंकर के पास चली जाऊँगी।।54-57½।। 

मेना पार्वती का महान भय देने वाला यह वचन सुनकर आश्चर्यचकित होकर “उ-मा” इस प्रकार बोलीं, इसी से उनका नाम “उमा” प्रसिद्ध हो गया।।58½।। तदनन्तर मेना गिरिराज हिमालय से बोलीं कि यदि मेरी पुत्री भगवान शंकर के समीप जाएगी तो उसके साथ ये दोनों सखियाँ भी जाएँ और दोनों फल-पुष्पादि से सदा इनकी सहायता करें।।59-60।। गिरिराज हिमालय सुमेरु पुत्री मेना के इस वचन को सुनकर उन दोनों सखियों के साथ अपनी पुत्री उमा को श्रीविश्वनाथ के समीप ले गये. मुने ! सभी देवगण गिरिराज के इस कार्य को देखकर हर्ष से युक्त हो गये और वे सभी भगवान शंकर के कान में पुष्पवृष्टि करने लगे।।61।। 

।। इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “शिवतपवर्णन” नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।।21।।