महाभागवत – देवी पुराण – बीसवाँ अध्याय 

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इस अध्याय में भगवती का विविध बालोचित लीलाओं द्वारा हिमालय तथा मेना को आनन्दित करना, देवर्षि नारद द्वारा देवी के माहात्म्य का वर्णन है. 

नारदजी बोले – हिमवान् के घर में रहती हुई भगवती परमेश्वरी ने लीलापूर्वक योग-ध्यान में तत्पर रहने वाले भगवान शिव को पतिरूप में किस प्रकार प्राप्त किया? प्रभो ! संसार से विरक्त महायोगी भगवान शिव ने परम योग का त्याग करके विवाह करने में अपना मन क्यों प्रवृत्त किया और उन पार्वती ने कामदेव के शत्रु महादेव के अर्धांग को किस प्रकार प्राप्त किया? महेश्वर ! आप यह सब मुझे विस्तारपूर्वक बताइए।।1-3।। 

श्रीमहादेवजी बोले – मुने ! महामते ! जो दुर्गा इस जगत् को परा माया से मोह में डाल देती हैं, उनकी माया को भला कौन जान सकता है? समस्त लोकों का सृजन, पालन तथा संहार करने वाली जो माया स्वरूपिणी दुर्गा हैं, वे शिशुरूप धारण कर हिमालय के घर में रहने लगीं।।4-5।। तदनन्तर वर्षा-ऋतु में बढ़ती हुई गंगा नदी की भाँति वे निरन्तर बढ़ने लगीं और शरत्कालीन ज्योत्स्ना की भाँति दिन-प्रतिदिन सौन्दर्य संपन्न होती गयीं. वे पार्वती सखियों के साथ नित्य क्रीडा करती थीं और अपनी लीला तथा गुणों के द्वारा अपने माता-पिता को सदा संतृप्त रखती थीं. गिरिराज हिमालय तथा मेना उनके मुख को बार-बार देखने में अपनी दृष्टि लगाये रहते थे और अणुमात्र समय के लिए भी अन्यत्र नहीं ले जाते थे।।6-8।। मुनिश्रेष्ठ ! तप करने वाले के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है और तप करने से जो प्राप्त नहीं हो सकता, उस फल का कोई अस्तित्व ही नहीं है।।9।। 

ब्रह्मा आदि देवताओं को भी जिन भगवती का दर्शन दुर्लभ है, प्राणियों को तारने वाली उन जगदम्बा को दिन-रात अपनी गोद में लेकर हिमवान् तथा मेनका पुत्री भाव से कुतूहलपूर्वक उन्हें देखते रहते थे।।10½।। सुरश्रेष्ठ ! इस प्रकार जो लोग भक्तिपूर्वक उनकी उपासना करते हैं, वे जगदम्बा भगवती उन्हें वांछित वर प्रदान करती हैं और कठिनाई से प्राप्त होने योग्य होते हुए भी उन्हें सरलता से प्राप्त हो जाती हैं. इस प्रकार हिमालय के घर में रहती हुई वे साक्षात् भगवती अपने माता-पिता को सर्वदा सन्तुष्ट एवं तृप्त किये रहती थीं।।11-12½।। 

एक समय गिरिराज हिमालय अपनी पुत्री परमेश्वरी भगवती को गोद में लेकर उन्हें अपने हृदय से लगाकर आनन्दपूर्वक बैठे हुए थे. उसी समय मुनिश्रेष्ठ नारद भगवती महेश्वरी का दर्शन करने के लिए आकाश मार्ग से वहाँ आ पहुँचे. उस समय उन्होंने शरद् रात्रि की चन्द्र-ज्योत्स्ना के समान निर्मल कान्ति वाली गौरी को हिमालय के संनिकट बैठी हुई देखा।।13-15½।। इसके बाद प्रखर बुद्धि वाले गिरिराज हिमालय ने अपने घर आये हुए उन देवर्षि नारद को देखकर उनकी विधिवत् पूजा करके दोनों हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया।।16½।।

तत्पश्चात आसन पर विराजमान होकर नारद मुनि ने पर्वतराज हिमालय को हर्षित करते हुए उनसे कहा – गिरिराज ! मैंने अपने आपसे जो कहा था कि साक्षात् आदिस्वरूपिणी प्रकृति आपकी पुत्रीरूप में उत्पन्न होंगी, अब तो आप उन्हें जान गये होंगे. उसी कारण से कल्याणमयी भगवती प्रकृति ने आपकी पुत्री रूप में स्वयं जन्म लिया है. ये प्रेम वश शम्भु के अर्धांग को ग्रहण करके उनकी भार्या के रूप में प्रतिष्ठित होंगी।।17-19।। वे शम्भु भी इन्हें छोड़कर किसी दूसरी स्त्री के साथ विवाह नहीं करेंगे. गिरिश्रेष्ठ ! भगवान शिव इन्हीं के द्वारा अर्धनारीश्वर कहे जाएँगे. अत: अब आपको यह कन्या महेश्वर को अर्पण कर देनी चाहिए, क्योंकि देवीस्वरुपिणी आपकी यह कन्या उन्हीं शम्भु की पूर्व पत्नी हैं, जो इससे पहले दक्ष प्रजापति के घर में जन्मी थीं।।20-21।। महामते ! इन दोनों में परस्पर जैसा प्रेम होगा, वैसा प्रेम किन्हीं भी पति-पत्नी में न तो हुआ, न है और न तो होगा. भगवान शिव इन्हीं की शक्ति से देवताओं के अनेक कार्य संपन्न करेंगे. इन भगवती का पुत्र भी महान् बलशाली तथा पराक्रमी होगा, जिसके समान बलवान् योद्धा न तो हुआ है और न होगा. अत: आप किसी अन्य को यह कन्या देने के लिये मन मत बनाइए।।22-24।।

नारद मुनि का यह वचन सुनकर गिरिराज हिमालय ने उनसे कहा – “सुना जाता है कि देवताओं के लिए भी अगोचर वे महेश्वर अनासक्त तथा महान् योगी हैं और उन्होंने कठोर तपस्या भी की है. निर्विकार ब्रह्म में सर्वदा अपना चित्त लगाये रखने वाले वे निश्चल शिव अपने अन्त:करण में केवल परम ब्रह्म को देखते रहते हैं, बाहर की ओर अपनी दृष्टि भी नहीं डालते. उन महेश्वर के ऎसे स्थिर चित्त को विचलित करने में भला कौन समर्थ हो सकता है? फिर वे मेरी इस कन्या को पतिरूप में भला कैसे स्वीकार करेंगे?।।25-27½।।

नारदजी बोले – पर्वतश्रेष्ठ ! आप उस विषय में कुछ भी चिन्ता न कीजिए. जिस तरह से उनका ध्यान-भंग होगा, उसे सुनिए।।28½।। 

असुरराज तारकासुर ने मदान्ध होकर सभी देवताओं को बन्धु-बान्धवों सहित जीतकर इन्द्र का राज्य छीन लिया है. उसी प्रकार वह तारकासुर अन्य देवताओं के भी अधिकार बलपूर्वक छीनकर ब्रह्माजी के द्वारा दिये गये वर के अनुसार तीनों लोकों का एकमात्र अधिपति बन बैठा है।।29-30½।। ब्रह्माजी ने भगवान शिव के अमित तेजस्वी औरस पुत्र के द्वारा उस दुरात्मा की मृत्यु होना सुनिश्चित किया है. इसलिए ब्रह्माजी के आदेशानुसार इन्द्र आदि सभी देवता अत्यन्त सावधानीपूर्वक महादेवजी को विमोहित करने के लिए प्रयत्नशील होंगे।।31-32½।। 

पर्वतश्रेष्ठ ! यह सब कार्य केवल निमित्तभर एवं लौकिक ही होगा, वास्तविकता तो यह है कि आपकी यह पुत्री ही महादेवजी को सम्मोहित करेगी. आपकी यह कन्या जगत् को मोहित करने वाली महामाया है, विष्णु को सम्मोहित करने वाली लक्ष्मी है और शिव को सम्मोहित करने वाली शिवा हैं।।33-34½।। 

महान् योगी वे महाकालेश्वर स्थिरचित्त से समाधि में स्थित होकर अपनी अन्तर्यामिनी प्रिया महाकाली का दर्शन करते हैं और इन्हीं के लिए वे आत्मस्वरुप में मन को स्थिर करके निरन्तर तपस्या कर रहे हैं. इन्हें पुन: पत्नी रूप में प्राप्त करके वे योगमुक्त हो जाएँगे. पुन: वे शंकर ध्यानयोग के बल से शीघ्र ही यह जानकर कि ये ब्रह्मस्वरुपिणी सनातनी भगवती आपके घर में उत्पन्न हुई हैं, आपके शिखर पर तप करने के लिए निश्चित रूप से आएँगे।।35-38।।

श्रीमहादेवजी बोले – गिरिराज हिमालय से ऎसा कहकर वे नारद मुनि तत्काल आकाश मार्ग से होते हुए मध्यान्हकालीन सूर्य के समान प्रभा वाले अपने स्थान के लिए प्रस्थित हो गये।।39।।

।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत महादेव-नारद-संवाद में बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।20।।