महाभागवत – देवी पुराण – उन्नीसवाँ अध्याय 

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इस अध्याय में हिमालय को तत्त्व ज्ञान का उपदेश प्रदान कर देवी का सामान्य बालिका की भाँति क्रीडा करना है, गिरिराज द्वारा जन्म-महोत्सव, षष्ठी-महोत्सव तथा नामकरण आदि उत्सवों को संपादित करना है, भगवती गीता (पार्वती गीता) – के पाठ की महिमा का अध्ययन है. 

श्रीमहादेवजी बोले – मुने ! इस प्रकार श्रीपार्वती जी के मुख से श्रेष्ठ योगसार को सुनकर पर्वतश्रेष्ठ हिमालय जीवन्मुक्त हो गये. वे महेश्वरी भी गिरिराज से योग का वर्णन करके लीलापूर्वक प्राकृत (सामान्य) बच्ची की भाँति माता का दूध पीने लगीं।।1-2।। गिरिराज हिमालय ने भी अत्यन्त हर्षोल्लास के साथ बड़ा भारी उत्सव किया, जैसा किसी ने कहीं भी न तो देखा था और न सुना था. छठे दिन षष्ठी देवी की पूजा कर दसवाँ दिन आने पर पर्वतराज हिमालय ने उनका “पार्वती” – ऎसा सार्थक नाम रखा।।3-4।। 

इस प्रकार तीनों लोकों की जननी नित्यस्वरूपिणी श्रेष्ठ प्रकृति मेनका के गर्भ से उत्पन्न होकर हिमालय के घर में रहने लगीं।।5।। नारद ! जो मनुष्य पार्वती के द्वारा हिमालाय से कहे गये उत्तम योग का पाठ करता है, उसके लिए मुक्ति सुलभ हो जाती है. मुनिवर ! भगवती शर्वाणी उस मनुष्य पर सदा प्रसन्न रहती हैं और देवी पार्वती के प्रति उसके मन में दृढ़ भक्ति उत्पन्न हो जाती है।।6-8।। अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी तिथि को भक्तिपरायण होकर श्रीपार्वती गीता का पाठ करने वाला मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है. शरत्काल में महाष्टमी तिथि को उपवास करके तथा रात भर जागरण करके जो मनुष्य इसका पाठ करता है, उसके पुण्य का वर्णन मैं क्या करूँ? 

दुर्गा-भक्तिपरायण वह मनुष्य सभी देवताओं का पूज्य हो जाता है और इन्द्र आदि लोकपाल उसकी आज्ञा के अधीन हो जाते हैं. वह साक्षात् भगवती की कृपा से दैवीकला को स्वयं प्राप्त हो जाता है और उसके ब्रह्महत्या आदि पाप भी नष्ट हो जाते हैं. वह सर्वगुणसंपन्न तथा दीर्घजीवी पुत्र प्राप्त करता है, उसके शत्रु नष्ट हो जाते हैं और वह नित्य कल्याण की प्राप्ति करता है।।8-12।।

अमावस्या तिथि के आने पर जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस श्रीपार्वती गीता का अपठ करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर दुर्गातुल्य हो जाता है. जो बेल के वृक्ष की संनिधि में बैठकर अर्धरात्रि में इसका पाठ करता है, उसे एक वर्ष में ही दुर्गा साक्षात् दर्शन देती है।।13-14।। नारद ! इसके विषय में अधिक क्या कहा जाए? तत्त्व की बात यह है पृथ्वी तल पर इस (श्रीपार्वती गीता) – के पाठ के समान कोई भी पुण्य नहीं है।।15।। मुनिश्रेष्ठ ! इस लोक में तप, यज्ञ-दान आदि कर्मों के फल तो परिमित हैं, किंतु इसके पाठ के फल की कोई सीमा नहीं है. इस प्रकार शाश्वत होते हुए भी परमेश्वरी जिस तरह से लीलापूर्वक मेनका के गर्भ से उत्पन्न हुई – वह वृत्तान्त मैंने आपसे कह दिया. अब आप पुन: क्या सुनना चाहते हैं?।।16-17।। 

।।इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “श्रीभगवतीगीतामाहात्म्यवर्णन” नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।