महाभागवत – देवी पुराण – अठारहवाँ अध्याय

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इस अध्याय में भगवती गीता के वर्णन में मोक्ष योग का उपदेश है, देवी के स्थूल स्वरुपों में दस महाविद्याओं का वर्णन है, इस स्वरुपों की आराधना से मोक्ष की प्राप्ति है, अनन्य शरणागति की महिमा का वर्णन है.

हिमालय बोले – देवि ! यदि आपका आश्रय ग्रहण न करने वालों की मुक्ति है ही नहीं तो कृपा करके मुझे यह बताइए कि मनुष्य किस प्रकार आपकी शरण प्राप्त करे।।1।। मात ! देहबन्धन से छुटकारे के लिए मोक्ष की इच्छा रखने वालों को आपके किस रूप का ध्यान करना चाहिए और आपकी कैसी परम भक्ति करनी चाहिए?।।2।।

श्रीपार्वती जी बोलीं – हजारों मनुष्यों में कोई-कोई सिद्धि के लिए प्रयास करता है और सिद्धि के लिए तत्पर उन हजारों लोगों में भी कोई-कोई ही मुझे वस्तुत: जान पाता है।।3।। तात ! मुमुक्षुओं को देहबन्धन से मुक्ति के लिए मेरे निष्कल,सूक्ष्म, वाणी से परे, अत्यन्त निर्मल, निर्गुण, परम ज्योतिस्वरूप, सर्वव्यापक, एकमात्र कारणरूप, विकल्परहित, आश्रयहीन और सच्चिदानन्द विग्रह वाले स्वरूप का ध्यान करना चाहिए।।4-5।।

तात ! मैं बुद्धिमानों की सद्बुद्धि हूँ. पर्वतराज ! मैं ही पृथ्वी में पवित्र गन्ध के रूप में विद्यमान हूँ, मैं ही जल में रस के रूप में व्याप्त हूँ, चन्द्रमा की प्रभा मैं ही हूँ, मैं ही तपस्वियों की तपस्या हूँ, सूर्य का तेज मैं ही हूँ और बलवान प्राणियों का काम-राग आदि से रहित बल भी मैं ही हूँ।।6-7।। राजेन्द्र ! मैं समस्त कर्मों में पुण्यात्मक कर्म हूँ, छन्दों में गायत्री नामक छन्द हूँ, बीजमन्त्रों में प्रणव (ओंकार) हूँ और सभी प्राणियों में धर्मानुकूल काम हूँ. भूधर ! इसी प्रकार और भी जो सात्त्विक, राजस तथा तामस भाव हैं वे मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं, मेरे अधीन हैं और मुझमें विद्यमान हैं. पर्वतश्रेष्ठ ! मैं उनके अधीन कदापि नहीं हूँ।।8-10।।

महाराज ! माया से मोहित हुए लोग मेरे इस सर्वव्यापी, अद्वैत, परम तथा निर्विकार रूप को नहीं जान पाते हैं, किंतु जो लोग भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं. ऋक् आदि श्रुतियाँ भी मेरे परम ऎश्वर्य को नहीं जानती हैं।।11-12।। पिताजी ! नगश्रेष्ठ ! सृष्टि के लिए मैंने ही अपने रूप को स्त्री तथा पुरुष-भेद से दो भागों में विभक्त किया. शिव ही प्रधान पुरुष हैं और शिवा ही परम शक्ति हैं. महाराज ! तत्त्वदर्शी योगिजन मुझे ही शिव-शक्ति से युक्त ब्रह्म एवं परात्पर तत्त्व कहते हैं।।13-14½।।

मैं ब्रह्मरूप से इस चराचर जगत् की सृष्टि करती हूँ, परम पुरुष विष्णु होकर इस सम्पूर्ण विश्व का पालन करती हूँ और अंत में अपनी इच्छा से दुराचारियों के शमन के उद्देश्य से महारुद्र रूप से संहार करती हूँ. इसी तरह महामते ! मैं राम आदि रूपों से पृथ्वी पर बार-बार अवतार लेकर दानवों का वध करके पुन:-पुन: जगत् का पालन करती हूँ. तात ! मेरा शक्त्यात्मक रूप ही प्रधान है, क्योंकि अपने स्वरूप में स्थित रहता हुआ पुरुष उसके बिना कुछ भी करने में समर्थ नहीं है।।15-18½।।

राजेन्द्र ! मेरे इन काली आदि रूपों को स्थूलरूप जानो. निष्पाप ! अपने सूक्ष्म रूप के विषय में मैं आपसे पहले ही बता चुकी हूँ. पर्वतश्रेष्ठ ! ! मेरे स्थूल रूप का ज्ञान किये बिना उस सूक्ष्म रूप का बोध नहीं किया जा सकता है, जिसका दर्शन करके प्राणी मोक्ष का भागी हो जाता है. अत: मोक्ष की कामना करने वाले प्राणी को पहले मेरे स्थूल रूप का आश्रय लेना चाहिए. मनुष्य को चाहिए कि वह क्रियायोग के द्वारा विधानपूर्वक मेरे उन स्थूल रूपों की उपासना करके ही धीरे-धीरे मेरे शाश्वत परम सूक्ष्म रूप का दर्शन करे।।19-22।।

हिमालय बोले – माता ! आपके स्थूल रूप अनेक प्रकार के हैं. महेश्वरि ! उनमें किस रूप का आश्रय लेकर मनुष्य शीघ्र मोक्ष का भागी बन सकता है? महादेवि ! यदि मुझ पर आपकी कृपा हो तो मुझे उसे बताइए. भक्तवत्सले ! मैं आपका दास हूँ, अत: इस संसार से मुझे मुक्त कीजिए।।23-24।।

पार्वतीजी बोलीं – भूधर ! मेरे स्थूल रूपों से यह सम्पूर्ण जगत् ही व्यात है, फिर भी शीघ्र मुक्ति प्रदान करने वाली मेरी देवी-मूर्त्ति सर्वाधिक आराधनीया है. महामते ! वे देवी भी मुक्तिदायिनी “(दस) महाविद्या” नाम से अनेक स्वरूपों वाली हैं. महाराज ! मुझसे उनके नाम सुन लीजिए – महाकाली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगला (बगलामुखी), छिन्ना (छिन्नमस्ता), महात्रिपुरसुन्दरी, धूमावती और मातंगी नामों वाली – ये मनुष्यों को मोक्षफल प्रदान करने वाली हैं. इनकी परम भक्ति करने वाला नि:सन्देह मोक्ष प्राप्त कर लेता है।।25-28।। तात ! आप मन और बुद्धि से मेरे प्रति समर्पित होकर इनमें से किसी एक का क्रियायोग के द्वारा आश्रय ग्रहण कीजिए. इससे आप निश्चित रूप से मुझे प्राप्त कर लेंगे. भूधर ! मुझको प्राप्त होकर महात्मा लोग अनित्य तथा दु:खत्रय से परिपूर्ण पुनर्जन्म को कभी नहीं पाते।।29-30।। 

राजन् ! निरन्तर एकनिष्ठ चित्तवाला होकर जो नित्य मेरा स्मरण करता है, उस भक्तिपरायण योगी को मैं मुक्ति प्रदान करती हूँ. भक्तिपूर्वक मेरा स्मरण करते हुए जो अन्त में प्राण त्याग करता है, वह कभी भी (पुनर्जन्मादि) सांसारिक दु:ख समूहों से पीड़ित नहीं होता. महामते ! मेरे प्रति अनन्य चित्त से जो लोग भक्तिपूर्वक होकर नित्य मुझको भजते हैं, उन्हें मैं मोक्ष प्रदान करती हूँ।।31-33।। 

महाराज ! मेरा वह शक्त्यात्मक रूप बिना किसी श्रम के ही मुक्ति देने वाला है, इसलिए आप उस रूप का आश्रय लीजिए. इससे आप अवश्य ही मोक्ष प्राप्त कर लेंगे।।34।। राजेन्द्र ! जो लोग श्रद्धा से युक्त होकर भक्तिपूर्वक अन्य देवताओं की भी उपासना करते हैं, वे भी प्रकारान्तर से मेरी ही उपासना करते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है. समस्त यज्ञों का फल प्रदान करने वाली मैं यद्यपि सर्वव्यापिनी हूँ, फिर भी जो लोग एकमात्र उन्हीं अन्य देवताओं की भक्ति में तत्पर रहते हैं उनकी मुक्ति अत्यन्त दुर्लभ है।।35-36।।

अत: देह-बन्धन से मुक्ति के लिए आप अपने मन को नियन्त्रित करके मेरी ही शरण में जाइए. ऎसा करने से आप मुझे प्राप्त कर लेंगे, इसमें संशय नहीं है. आप जो कुछ करते हैं, खाते हैं, हवन करते हैं और दान करते हैं, वह सब मुझे अर्पण करके आप कर्मबन्धन से छूट जाएँगे।।37-38।। जो लोग सच्ची भक्ति से मेरी आराधना करते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें स्थित हूँ. महामते ! मेरे लिए कोई भी प्रिय और अप्रिय नहीं है. अत्यन्त दुराचारी रहा हुआ मनुष्य भी यदि अनन्य भाव से मेरी उपासना करने लगता है तो वह भी पाप रहित होकर भव बन्धन से छूट जाता है (पूर्वकाल में दुराचारपरायण रहने पर भी यदि सत्संगादि के प्रभाव से उसके चित्त में पश्चाताप का उदय हो जाता है और दुराचरण से निवृत्त होकर उसका जगदम्बा के प्रति अनन्य चित्तता का संबंध बन जाता है तो उस व्यक्ति के सारे पापों का प्रक्षालन होकर उसकी मुक्ति असंदिग्ध रूप से हो जाती है). वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और धीरे-धीरे संसार-सागर को पार भी कर जाता है. पर्वतराज ! मुझमें भक्ति रखने वाले प्राणियों के लिए मुक्ति सुलभ हो जाती है ।।39-41।। 

अत: महामते ! आप पराभक्ति से युक्त होकर मेरी आराधना कीजिए. मैं आपको जन्म-मरण रूपी समुद्र से निश्चित रूप से पार कर दूँगी. आप मुझमें अनुरक्त मन वाले होइए, मेरे उपासक बनिए, मुझे नमस्कार कीजिए और मेरे परायण होइए. ऎसा करने से आप मुझे ही प्राप्त होंगे और सांसारिक कष्ट आपको कभी पीड़ित नहीं कर सकेंगे।।42-43।।

।।इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत श्रीभगवतीगीतोपनिषद् में ब्रह्मविद्या-योगशास्त्र के अन्तर्गत श्रीपार्वती-हिमालय-संवाद में “मोक्षयोगोपदेशवर्णन” नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।18।।