महाभागवत – देवीपुराण – तीसरा अध्याय 

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तीसरे अध्याय में देवी माहात्म्य का वर्णन है, देवी द्वारा त्रिदेवों को सृष्ट्यादि के कार्यों में नियुक्त करना, आदिशक्ति का गंगा आदि पाँच रूपों में विभक्त होना, ब्रह्माजी के शरीर से मनु तथा शतरूपा का प्रादुर्भाव, दक्ष की कन्याओं से सृष्टि का विस्तार, आदिशक्ति द्वारा भगवान शंकर को भार्यारूप में प्राप्त होने का वर प्रदान करना, है. 

श्रीमहादेव जी बोले – जो शुद्ध, शाश्वत और मूलप्रकृतिस्वरुपिणी जगदम्बा हैं, वे ही साक्षात परब्रह्म हैं और वे ही हमारी देवता भी हैं।।1।। जिस प्रकार ये ब्रह्मा, ये विष्णु और स्वयं मैं शिव इस जगत की उत्पत्ति, पालन और संहार के कार्य में नियुक्त हैं, उसी प्रकार अनेक ब्रह्माण्डों में निवास करने वाले करोड़ों प्राणियों के सृजन, पालन और संहार का विधान करने वाली वे महेश्वरी ही हैं।।2-3।। निराकार रहते हुए वे महादेवी अपनी लीला से देह धारण करती हैं. उन्हीं के द्वारा इस विश्व का सृजन किया जाता है, पालन किया जाता है और अन्त में उन्हीं के द्वारा संहार किया जाता है. उनके द्वारा ही यह जगत मोहग्रस्त होता है. प्राचीनकाल में वे पूर्णा भगवती ही अपनी लीला से दक्ष की कन्या के रूप में, हिमवान की पुत्री के रूप में तथा अपने अंश से विष्णु भार्या लक्ष्मी के रूप में एवं ब्रह्मा की भार्या सावित्री तथा सरस्वती के रूप में प्रकट हुई।।4-6।।

नारदजी बोले – देवेश ! यदि आप मुझ पर पसन्न हैं और मेरे प्रति आपकी उत्तम प्रीति है, तब नाथ ! महामते ! मुझे विस्तारपूर्वक वह सब प्रसंग बताइए, जिस प्रकार वे प्रकृतिरूपा पूर्णा भगवती प्राचीन काल में दक्षकन्या के रूप में अवतरित हुई और जिस प्रकार भगवान शिव ने उन ब्रह्मस्वरुपिणी को पत्नी के रूप में प्राप्त किया, जिस प्रकार वे हिमालय के घर में पुन: पुत्री होकर उत्पन्न हुईं और फिर त्रिनेत्र महादेव ने उन्हें पत्नी के रूप में प्राप्त किया और जिस प्रकार उन्होंने छ: मुखों वाले कार्तिकेय तथा गजानन गणेश – इन दो महान बलशाली और पराक्रमी पुत्रों को जन्म दिया ।।7-10।।

श्रीमहादेवजी बोले – पहले यह जगत सूर्य, चन्द्रमा, तारों, दिन-रात, अग्नि, दिशा, शब्द, स्पर्श आदि से तथा अन्य किसी प्रकार के तेज से रहित था. उस समय श्रुति के द्वारा एकमात्र जिनका प्रतिपादन किया जाता है, ब्रह्मस्वरूपिणी वे भगवती विद्यमान थीं. सच्चिदानन्द विग्रह वाली वे प्रकृतिरूपा भगवती शुद्ध ज्ञान से युक्त, नित्य, वाणी से परे, निरवयव, योगियों के द्वारा कठिनता से प्राप्त होने वाली, सर्वत्र व्याप्त रहने वाली, उपद्रवों से रहित, नित्यानन्दस्वरूपिणी तथा सूक्ष्म और गुरुत्व आदि गुणों से परे हैं।।11-14।।

उन भगवती की सृष्टि करने की इच्छा हुई. उसी समय रूपरहित होते हुए भी प्रकृतिस्वरूपिणी उन पराम्बा ने अपनी इच्छा से शीघ्र ही प्रसन्नतापूर्वक रूप धारण कर लिया. उनका विग्रह निखरे हुए काजल के समान था, विकसित कमल के समान सुन्दर मुख था, चार भुजाएँ थीं, नेत्र लाल वर्ण के थे, बाल खुले हुए थे और दिशारूपी वस्त्र से सुशोभित, स्थूल तथा उन्नत स्तनधारिणी ज्योतिर्मयी वे सिंह की पीठ पर विराजमान थीं।।15-16½ तदनन्तर उन्होंने अपनी इच्छा से अपने रजस, सत्त्व और तमोगुण के द्वारा शीघ्र ही चैतन्यरहित एक पुरुष की सृष्टि की. सत्त्व आदि तीनों गुणों से युक्त उस उत्पन्न पुरुष को देखकर भगवती ने स्वेच्छा से उस पुरुष में सृष्टि करने की अपनी इच्छा का समावेश किया. यह देखकर वह शक्तिमान पुत्र तीनों गुणों के आश्रय से ब्रह्मा, विष्णु और शिव नाम वाले तीन पुरुषों के रूप में प्रकट हो गया।।16-19½ 

इस पर भी सृष्टि नहीं हो रही है – ऎसा देखकर उन भगवती ने उस पुरुष को जीवात्मा और परमात्मा – इन दो रुपों में विभक्त कर दिया. इसके बाद वे प्रकृति अपनी इच्छा से स्वयं अपने को भी तीन भागों में विभक्त कर माया, विद्या और परमा – इन तीन रुपों में प्रकट हो गईं।।20-21½ प्राणियों को विमोहित करने वाली जो शक्ति है, वही माया है और संसार को संचालित करने वाली तथा प्राणियों में स्पंदन आदि का संचार करने वाली जो शक्ति है, वही परमा कही गई हैं. वही तत्त्वज्ञानमयी तथा संसार से मुक्ति दिलाने वाली भी हैं. माया के वशीभूत जीव जब उस परमा शक्ति की उपेक्षा करने लग गया, तब मुने ! मोहात्मिका उस माया का आश्रय ग्रहण करने वाले वे पुरुष भी विषयों के प्रति आसक्त होने लगे. मुनिश्रेष्ठ ! उस समय वे उस माया के प्रभाव से अत्यन्त प्रमत्त हो गये. तीसरी जो परा विद्या है, वह स्वयं गंगा, दुर्गा, सावित्री, लक्ष्मी और सरस्वती – इन पाँचों रूपों में विभक्त हो गई।।22-25½ 

उन साक्षात् जगत्पालिनी पूर्णा प्रकृति ने सृष्टिकार्य में ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव को अलग-अलग नियुक्त करके कहा – मैंने सृष्टि के निमित्त ही आप लोगों को अपनी इच्छा से उत्पन्न किया है. अतएव महाभाग ! आप लोग वैसा ही कीजिए, जैसी मेरी इच्छा है।।26-27½ ब्रह्मा अनेक प्रकार के विचित्र तथा असंख्य स्थवर और जंगम प्राणियों की निर्बन्धभाव से उत्पत्ति करें. विशाल भुजाओं वाले और बलशालियों में श्रेष्ठ विष्णु जगत को क्षुब्ध करने वाले दुष्टों का संहार करते हुए सृष्टि का पालन करें और अन्त में जब मेरी नाश करने की इच्छा होगी, तब तमोगुणयुक्त शिव सम्पूर्ण जगत का नाश करेंगे. आप तीनों पुरुषों को सृष्टि आदि तीनों कार्यों में एक-दूसरे की सहायता भी अवश्य करनी चाहिए।।28-31½  

मैं सावित्री आदि पाँच श्रेष्ठ देवियों के रूपों में विभक्त होकर आप लोगों की पत्नियाँ बनकर स्वेच्छापूर्वक विहार करूँगी और सभी प्राणियों में नारी रूप धारण कर शम्भु के सहयोग द्वारा स्वेच्छा से सभी प्राणियों को जन्म दूँगी. ब्रह्मन् ! अब आप मेरी आज्ञा से मानुषी सृष्टि कीजिए, नहीं तो इस सृष्टि का विस्तार नहीं हो पाएगा।।32-34½।। 

ब्रह्मा आदि से ऎसा कहकर वे प्रकृतिस्वरूपिणी परात्पर महाविद्या उनके देखते-देखते अन्तर्धान हो गईं और उनका यह वचन सुनकर ब्रह्माजी ने सृष्टि कार्य आरम्भ कर दिया।।35-36।। 

इधर भगवान महेश्वर उन पूर्ण प्रकृति को पत्नीरूप में प्राप्त करने के लिए संयतचित्त होकर भक्तिपूर्वक तप के द्वारा आराधना करने लगे।।37।। अपने ज्ञाननेत्र से महेश्वर को ऎसा करते देखकर वे परम पुरुष विष्णु भी उन्हीं को प्राप्त करने के निमित्त तपस्या करने के लिए बैठ गए।।38।।

यह सब जानकर भगवान ब्रह्मा भी सृष्टि करना छोड़कर उसी अभिलाषा के साथ तपस्याहेतु निश्चल होकर बैठ गए।।39।। इस प्रकार आराधनारत उन तीनों के तप की परीक्षा करने के लिए स्वयं प्रकृति ब्रह्माण्ड को क्षुब्ध करने वाला भयंकर रूप धारण कर उनके पास आयीं. उन्हें देखकर ब्रह्माजी भयाक्रान्त हो गए और उन्होंने अपना मुख फेर लिया. वे उनके सम्मुख पुन : गईं, तब भी ब्रह्माजी व्मुख हो गए. इस प्रकार वे चारों दिशाओं में क्रम से चार बार गईं. इससे अत्यन्त डरे हुए वे ब्रह्मा जी चार मुख वाले हो गए और भय से संत्रस्त होकर वे तपस्या छोड़कर उसी समय वहाँ से भाग गए।।40-43।।

इसके बाद महान भय उत्पन्न करने वाली वे प्रकृति वहाँ पर शीघ्र पहुँची, जहाँ परम पुरुष विष्णु एकाग्रचित्त होकर तप कर रहे थे. उन्हें देखकर हजार सिर, हजार नेत्र तथा हजार पैरों वाले वे विष्णु भी उस समय भयभीत हो गए और तपस्या छोड़कर आँखें बंद किए हुए जल के अंदर प्रविष्ट हो गए. इस प्रकार उन दोनों की तपस्या भंग हो जाने पर भीषण रूपवाली वे प्रकृति महेश के पास गईं, किंतु वे किसी भी तरह उनका ध्यान भंग करने में समर्थ नहीं हो सकीं।।44-47।। 

अपने विज्ञान विशेष से भगवान शिव भयंकर रूपवाली देवी प्रकृति को परीक्षा के लिए आयी हुई जानकर समाधि में ही बैठे रहे।।48।। उससे अत्यन्त प्रसन्न हुई प्रकृति-स्वरूपिणी श्रेष्ठ भगवती जो गंगास्वरूप से स्वर्ग में स्थित हैं, भगवान शिव को देवी पूर्णा के स्वरूप में प्राप्त हुईं. उन्होंने अपनी पूर्वप्रतिज्ञा के अनुसार अपने अंश से सावित्री होकर पतिरूप में ब्रह्माजी को प्राप्त किया. महामते ! इसी प्रकार उन्होंने अपने ही अंश से लक्ष्मी होकर विष्णु को पतिरूप में प्राप्त किया और अपने ही अंश से सरस्वती के भी रूप में वे भगवती प्रतिष्ठित हुईं।।49-50½।।

इसके बाद महामते ! समाधि भंग हो जाने के अनन्तर उन लोकपितामह ब्रह्मा ने पृथ्वी आदि महाभूतों तथा अन्य तत्त्वों की उत्पत्ति करके मरीचि, अत्रि, पुलह, क्रतु, अंगिरा, प्रचेता, वसिष्ठ, नारद, भृगु और पुलस्त्य – इन दस मानस पुत्रों का सृजन किया. महामते ! ये सभी दस पुत्र समान गुण-प्रभाव वाले थे. इसके बाद उन्होंने दक्ष आदि प्रमुख प्रजापतियों तथा मनुष्यों की उत्पत्ति की।।51-54।। तदनन्तर उन्होंने मानसी पुत्री सन्ध्या और मनोभव कामदेव को उत्पन्न किया तथा पुन: स्वर्ग, मृत्युलोक एवं पाताललोक में स्त्री-पुरुषों को विमोहित करने के लिए कामरूप उस पुरुष को स्वयं नियुक्त कर दिया. प्रजापति ब्रह्मा ने सभी प्राणियों में विमोह उत्पन्न करने के उद्देश्य से उन्हें पुष्पमय धनुष तथा पुष्पमय पाँच बाण प्रदान किए।।55-56½ 

तत्पश्चात ब्रमाजी ने अपने उत्तम शरीर को दो भागों में विभक्त किया. उनके शरीर के बायें आधे भाग से शतरूपा नामक सुन्दर रूपवाली स्त्री उत्पन्न हुई और दाएँ आधे भाग से स्वायम्भुव नाम वाले मनु उत्पन्न हुए. उन्होंने कामदेव के पाँच पुष्प बाणों से आहत मनोहर मुसकानयुक्त उस सुन्दर अंगोंवाली शतरूपा को भार्या के रूप में ग्रहण किया।।57-59।। मुने ! तत्पश्चात उन स्वायम्भुव मनु ने उस शतरूपा से तीन कन्याएँ तथा दो पुत्र उत्पन्न किए. देवर्षिवर ! वे आकूति, देवहूति और प्रसूति नाम की कन्याएँ थीं तथा प्रियव्रत और उत्तानपाद नाम के पुत्र थे।।60-61।। 

उन्होंने आकूति नामक अपनी पुत्री रुचि प्रजापति को, मध्यमा पुत्री देवहूति ऋषि कर्दम को तथा सुन्दर स्वरूपवाली तीसरी पुत्री प्रसूति दक्षप्रजापति को समर्पित कर दी।।62।। कर्दम ने देवहूति से अरुन्धती आदि नौ पुत्रियाँ कीं. वे पुत्रियाँ वसिष्ठ आदि ऋषियों की भार्याएँ हुईं।।63।। प्रजापति दक्ष की भी चौदह कन्याएँ हुईं. अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्टा, सुरसा, तिमि, मनु, क्रोधवशा, ताम्रा, विनता, कद्रु, स्वाहा और भानुमती – ये उन कन्याओं के नाम कहे गए हैं।।64-65।। उन्होंने उनमें से स्वाहा नाम की कन्या अग्नि को और शेष तेरह कन्याएँ ऋषि कश्यप को प्रदान कर दीं. कश्यप ने स्वयं उन पत्नियों से नानाविध प्रजाएँ उत्पन्न कीं, तब उन प्रजाओं से सम्पूर्ण जगत व्याप्त हो गया. इस प्रकार भगवान ब्रह्मा ने इस सारे संसार की सृष्टि की।।66-67।।

तदनन्तर देवी प्रकृति ने उन ब्रह्मा से कहा – महामते ! द्विजगण तीनों संध्याओं में जिनकी उपासना करते हैं, वे सावित्री मेरे अंश से उत्पन्न हुई हैं. वे सरस्वती तथा लक्ष्मी भी मेरे ही अंश से उत्पन्न हुई हैं, जिन्होंने अपनी लीला से तीनों लोकों के पालनकर्त्ता विष्णु को पतिरूप में प्राप्त किया. आप दोनों ब्रह्मा तथा विष्णु विषयासक्त हो गए।।68-69।। देवर्षिवर ! उन साक्षात पराप्रकृति को पूर्णभाव से पत्नीरूप में पाने की अभिलाषा करते हुए भी शिव परम योगी बने रहे. उस प्रकार की तपस्या में रत उन भगवान शिव से पराप्रकृति जगदम्बिका ने प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष रूप से कहा।।70-71।।

प्रकृति बोलीं – शम्भो ! आपका कौन-सा अभीष्ट वर है? मुझसे वह माँग लें. आपकी तपस्यापूर्ण उपासना से परम प्रसन्नता को प्राप्त मैं वह वर आपको अवश्य दूँगी।।72।।

शिवजी बोले – जिनसे पूर्व में पाँच श्रेष्ठ नारियाँ प्रकट हुई थीं, वे आप विशुद्ध प्रकृति ही हम ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर को प्राप्त होगीं. उनमें से अपने अंश से सावित्री के रूप में उत्पन्न होकर आप ब्रह्माजी को प्राप्त हुईं और अपने ही अंश से लक्ष्मी एवं सरस्वती होकर विष्णु को प्राप्त हुई हैं, किंतु परमा पूर्णा प्रकृति आप स्वयं अपनी लीला से कहीं जन्म लेकर मुझे प्राप्त हों।।73-75।।

प्रकृति बोली- दक्षप्रजापति के यहाँ अपनी माया से उत्पन्न होकर मनोहर शरीर वाली पूर्णा प्रकृति मैं ही आपकी भार्या बनूँगी।।76।। जब दक्ष के यहाँ उनके देहाभिमान से मेरा तथा आपका अनादर होगा, तब अपने मायारूपी अंश से उन्हें विमोहित कर मैं अपने स्थान को चली जाऊँगी. महेश्वर ! उस समय आपसे मेरा वियोग हो जाएगा और तब आप भी मेरे बिना कहीं भी नहीं ठहर सकेंगे. इस प्रकार हम दोनों के बीच परम प्रीति बनी रहेगी।।77-79।।

श्रीमहादेवजी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! वे परमेश्वरी प्रकृति महेश्वर से ऎसा कहकर अन्तर्धान हो गईं और शिव के मन में प्रसन्नता व्याप्त हो गई।।80।।

।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीशिव-नारद-संवाद में “महेश्वरदानवर्णन” नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ।।3।।

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