महाभागवत – देवी पुराण – चौथा अध्याय 

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इस अध्याय में दक्ष प्रजापति की तपस्या से प्रसन्न भगवती शिवा का “सती” नाम से उनकी पुत्री के रूप में जन्म लेना, भगवती सती एवं भगवान शिव की परस्पर प्रीति का वर्णन है. 

श्रीमहादेवजी बोले – एक बार की बात है जगत की सृष्टि करने वाले ब्रह्मा ने दक्ष प्रजापति को हर्षित करते हुए उनसे कहा – पुत्र ! मैं तुम्हारे कल्याण की एक बात बता रहा हूँ, तुम उसे सुनो।।1।। साक्षात भगवान शिव ने परमा पूर्णा प्रकृति की आराधना की तथा उन्हें भार्या बनाने के विचार से उनसे प्रार्थना की, इस पर उन प्रकृति ने वह बात स्वीकार कर ली. अत: वे महेश्वरी कहीं-न-कहीं जन्म लेकर उन शिव को पति के रूप में अवश्य प्राप्त करेंगी, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है।।2-3।। वे प्रकृति जिस प्रकार आपकी पुत्री के रूप में उत्पन्न होकर शम्भु की भार्या होवें, इसके लिए आप अति कठोर तपस्या के द्वारा भक्तिपूर्वक उनकी प्रार्थना कीजिए. वे इस लोक में भाग्य से जिसकी पुत्री के रूप में उत्पन्न होंगी, उसका जीवन सफल हो जाएगा और उसके पितृगण भी धन्य हो जाएँगे. अत: इस जगत में उत्पन्न मायारूपिणी लोकवन्द्या उन जगदम्बिका को पुत्री रूप में प्राप्त कर आप अपना जन्म सार्थक कीजिए।।4-6।।

दक्ष बोले – पिताजी ! मैं आपकी आज्ञा से निश्चित रूप से वैसा ही प्रयत्न करूँगा, जिससे वे साक्षात प्रकृतिरूपा जगदम्बा मेरी पुत्री के रूप में जन्म लें।।7।

श्रीमहादेव जी बोले – ब्रह्माजी से ऎसा कहकर दक्ष प्रजापति अति शीघ्रता से क्षीर सागर के तट पर आकर जगदम्बा की आराधना करने लगे. मुनिवर ! उन्होंने उपवास इत्यादि तपश्चरण से भगवती की आराधना करते हुए तीन हजार दिव्य वर्ष बिताए।।8-9।।उस प्रकार की तपस्या में रत दक्ष के सम्मुख भगवती शिवा प्रकट हुईं. उनका विग्रह निखरे हुए काजल के समान था तथा वे चार सुन्दर विशाल भुजाओं से युक्त थीं. वे अपने हाथों में खड्ग, कमल तथा अभय मुद्रा धारण किए हुए थीं, उनके नेत्र नीलकमल के दल की भाँति सुशोभित थे, उनके दाँत अत्यन्त मनोहर थे, वे सुन्दर मुण्डमाला से विभूषित थीं. वे दिशारूपी वस्त्र धारण किए हुए थीं, उनके बाल खुले हुए थे, वे अनेकविध मणियों से शोभा पा रही थीं, सिंह की पीठ पर सवार थीं और मध्याह्नकालीन सैकड़ों सूर्य की प्रभा के समान प्रकाशमान थीं।।10-12।। उन्होंने दक्ष से कहा – वत्स ! तुम मुझसे क्या याचना कर रहे हो? प्रजापते ! तुम्हारे भाव से प्रसन्न होकर मैं उसे तुम्हें शीघ्र दूँगी।।13।।

दक्ष बोले – माता ! यदि आप मुझ निष्पाप दास पर प्रसन्न हैं तो आप मेरी पुत्री के रूप में मेरे घर में जन्म लीजिए।।14।।

श्रीदेवी जी बोलीं – मुझे पत्नी के रूप में प्राप्त करने की कामना से शम्भु ने पूर्वकाल में मुझसे प्रार्थना की थी. वह प्रार्थना मैंने पूर्व में स्वीकार कर ली थी. अब मुझे कहीं जन्म लेना है।।15।। अब मैं आपके घर में जन्म लेकर शम्भु की भार्या बनूँगी. मैं साक्षात प्रकृतिस्वरूपिणी भगवती पूर्णा आपकी इस तपस्या से प्रसन्न हूँ. स्वर्णतुल्य गौर अंगों से युक्त विग्रहवाली मैं आपकी कन्या होऊँगी. सुन्दर शरीर वाली तथा सौम्य रूपवाली मैं तभी तक आपके यहाँ रहूँगी, जब तक आपकी तपस्या का पुण्य क्षीण नहीं हो जाता. पुन: तपस्या का पुण्य़ क्षीण होने पर जब आपके द्वारा मेरा अनादर होगा, तब मैं इसी तरह का विग्रह धारण कर अपनी माया से स्थावर-जंगममय सम्पूर्ण जगत को विमोहित करके अपने धाम चली जाऊँगी।।16-19½।। 

श्री महादेव जी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! तीनों लोकों की जननी तथा उत्तम गुणों वाली प्रकृति देवी दक्ष से ऐसा कहकर उनके देखते-देखते अचानक अंतर्धान हो गयीं और इसके बाद प्रजापति दक्ष ने भी अपने घर जाकर ब्रह्मा जी से उस वरदान के विषय में बताया, जिसे जगद्धात्री भगवती ने प्रसन्न होकर उन्हें दिया था ।।20-21½।। 

तत्पश्चात उन आद्या सनातनी पूर्णा प्रकृति ने जन्म लेने के लिए सर्वगुण सम्पन्ना दक्ष पत्नी के गर्भ में प्रवेश किया। तदनन्तर दक्षपत्नी प्रसूति ने शुभ दिन में एक कन्या को जन्म दिया। वह कन्या प्रकृतिस्वरूपिणी भगवती पूर्णा ही थीं, उस कन्या के अंग गौर वर्ण के थे, करोड़ों चन्द्रमा के समान उसकी आभा थी, खिले हुए कमल के समान उसके बड़े-बड़े नेत्र थे, वह आठ भुजलताओं से सुशोभित थी और उसका मुख अतीव सुन्दर था। उस समय आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी, सैकड़ों दुन्दुभियाँ बज उठीं और दिशाएं अत्यंत स्वच्छ हो गयीं।।22-25½।। तब पुत्री का जन्म सुनकर दक्ष प्रजापति वहाँ आ गए और उस कन्या को देखकर अत्यंत प्रसन्न मन वाले उन दक्ष ने बन्धु-बांधवों के साथ महान उत्सव आयोजित किया तथा दसवें दिन उस कन्या का “सती” ऐसा कहकर नामकरण किया।।26-27।। 

वह कन्या वर्षाकालीन मन्दाकिनी की भाँति प्रतिदिन बढ़ने लगी और शरत्कालीन चंद्रज्योत्स्ना के समान दिव्य कान्ति से सुशोभित होने लगी।।28।। प्रजापति दक्ष एक बार सुन्दर मुखवाली उस कन्या को विवाह योग्य देखकर अपने मन में उसके विवाह के लिए विचार करने लगे।।29।। यह कन्या किसे प्रदान करनी चाहिए अथवा ये तो स्वयं पराप्रकृति हैं, जो अपने वर हेतु पहले से ही वचनबद्ध हैं. इसलिए वह बात मेरे पूरी तरह बहुत प्रयत्न करने पर भी किसी प्रकार अन्यथा नहीं हो सकती. जिन शिव के अंश से उत्पन्न रुद्रगण मेरी आज्ञा का अनुगमन करते हैं, उनको बुलाकर यह रूपवती कन्या देने योग्य नहीं है. इसलिए शूलधारी शिव को बिना आमन्त्रित किए श्रेष्ठ देव, दैत्य, गन्धर्व और किन्नरोँ की एक शिवशून्य सभा बुलाकर मुझे स्वयं वरोत्सव – यज्ञ का आयोजन करना चाहिए. तब वही होगा, जो विधि का विधान होगा।।30-34।।

तब अपने मन में भली-भाँति ऎसा निश्चय करके मनस्वी दक्षप्रजापति ने सभी देवताओं तथा असुरों को बुलाकर बिना शिव के ही सभा का आयोजन कर दिया. सती के उस अद्भुत तथा मनोहर स्वयंवर में देवताओं और दैत्यों तथा मुनीन्द्रों की कान्ति से वह सभा भी अत्यन्त सुशोभित हो रही थी. वह सभा सूर्य के सदृश तेजमयी और चन्द्रमा के समान कान्तिमती होकर सुशोभित हो रही थी।।35-36½।। 

मुनिवर ! दिव्य माला और वस्त्र तथा प्रभामय स्वर्ण के मुकुट धारण किए हुए श्रेष्ठ देवगण उस सभा में विराजमान थे. मणियों तथा स्वर्ण सजाए गए उनके रथों, घोड़ों और हाथियों एवं विभिन्न वर्णों के ध्वजों, छत्रों तथा पताकाओं – इन सभी से सुसज्जित वह दक्षपुरी कान्तियुक्त होकर शोभा पा रही थी।।37-39।। सैकड़ों-हजारों नगाड़े, मृदंग और ढोल बजने लगे. उस ध्वनि से सारा आकाश गूँज उठा. उस सभा में गन्धर्वगण मनोहर गीत गा रहे थे और सैकड़ों-हजारों श्रेष्ठ अप्सराएँ आनन्दित होकर नाच रही थीं।।40-41।। इसके बाद प्रजापति दक्ष ने शुभ समय आने पर त्रैलोक्य सुन्दरी उस कन्या सती को सभा में बुलाया. मुनिश्रेष्ठ ! मनोहर तथा कान्तियुक्त वह सती परम प्रसन्नतापूर्वक वहाँ उपस्थित हुई. वह सौन्दर्य की प्रतिमा के समान सुशोभित हो रही थी।।42-43।।

इसी बीच सर्वश्रेष्ठ महेश्वर नन्दी पर सवार होकर वहाँ आ गए और अन्तरिक्ष में स्थित हो गए. तदनन्तर शिवविहीन उस सभा को देखकर प्रजापति दक्ष ने अपनी परम सुन्दरी कन्या सती से यह कहा – ।।44-45।। माता ! ये देवता, असुर, ऋषि तथा महात्मा लोग यहाँ उपस्थित हैं. इनमें से जो भी आपको अच्छा प्रतीत होता हो, उस गुणवान तथा सुन्दर रूपवाले को माला पहनाकर आप उसका वरण कर लें. ऎसा कहने पर प्रकृतिरूपिणी देवी सती ने “शिवाय नम:” – ऎसा कहकर वह माला भूमि को समर्पित कर दी और वहाँ पर प्रकट होकर भगवान शिव ने सती के द्वारा अर्पित की गई उस माला को अपने सिर में धारण कर लिया. रत्नों से विभूषित समस्त अंगों वाले, करोड़ों चन्द्रमाओं के समान प्रभा वाले, दिव्य माला तथा वस्त्र धारण करने वाले, दिव्य गन्धों से लिप्त शरीर वाले, खिले हुए कमल के समान तीन सुन्दर नेत्र वाले, दिव्यरूपधारी भगवान सदाशिव सती के द्वारा प्रदत्त उस माला को धारण कर प्रसन्नतापूर्वक सभी देवताओं के देखते-देखते उस स्थान से सहसा अन्तर्धान हो गए।।46-51।।

मुनिश्रेष्ठ ! सती ने महेश्वर को माला अर्पित कर दी थी, उस कारण से दक्षप्रजापति का उस सती के प्रति आदरभाव कुछ कम हो गया।।52।। इसके बाद मरीचि आदि अपने मानस पुत्रों तथा अन्य मुनीश्वरों के साथ वहाँ विराजमान ब्रह्माजी ने सभी प्रजाओं के स्वामी दक्ष से यह बात कही – “आपकी इस कन्या ने देवाधिदेव शिव का वरण किया है, इसलिए उन श्रेष्ठ महेश्वर को बुलाकर प्रयत्नपूर्वक वैवाहिक विधि-विधान से अपनी पुत्री उन्हें दे दीजिए”।।53-54।। उनका यह वचन सुनकर और प्रकृतिदेवी द्वारा कही गई पूर्व बात को याद करके दक्ष ने महेश्वर को बुलाकर उन्हें सती को सौंप दिया. महेश ने भी वैवाहिक-विधान के साथ उनका प्रसन्नतापूर्वक पाणिग्रहण कर लिया।।55½।।                                                                                                                                                                                                                                                                       इसके अनन्तर ब्रह्मा, विष्णु और नारद आदि ऋषिगण वेद-वाक्यों के द्वारा उन स्तुति-प्रिय शिव तथा शिवा को स्तुति से प्रसन्न करने लगे. सभी देवतागण उनके ऊपर पुष्पों की वर्षा करने लगे. सैकड़ों-हजारों दुन्दुभियाँ भी बजने लगीं और सभी देवता, गन्धर्व तथा किन्नर अत्यन्त प्रसन्न हो गए।।56-58।। जटा तथा भस्म धारण किए हुए विश्वेश्वर शिव को देखकर दक्षप्रजापति के चित्त में बड़ी व्याकुलता छायी हुई थी और वे मन ही मन सती को भी कोस रहे थे।।59।। तत्पश्चात सभी लोकों में एकमात्र सुन्दरी सती को साथ में लेकर महेश्वर हिमालय के अत्यन्त सुन्दर शिखर (कैलास) के लिए प्रस्थान कर गए।।60।। मुनिश्रेष्ठ ! महादेव के साथ सती के चले जाने पर दक्षप्रजापति का दिव्य ज्ञान विलुप्त हो गया।।61।। 

।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीशिव-नारद-संवाद में “सती विवाह वर्णन” नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ।। 

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