महाभागवत – देवी पुराण – पाँचवाँ अध्याय 

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इस अध्याय में दक्षप्रजापति की शिव के प्रति द्वेषबुद्धि, महर्षि दधीचि द्वारा दक्ष को समझाना तथा भगवान शिव के माहात्म्य को बताना आदि बातें हैं. 

श्रीमहादेव जी बोले – तदनन्तर भगवान शंकर और सती की भर्त्सना करते हुए क्षीण पुण्यवाले दक्षप्रजापति दु:ख से व्याकुल होकर रोने लगे।।1।। मुनिश्रेष्ठ ! दु:ख से संतप्तहृदय वाले उन दक्ष को देखकर शिवजी की भक्ति में तत्पर रहने वाले परम ज्ञानी मुनि दधीचि ने उनसे यह वचन कहा – ।।2।।

दधीचि बोले – मोह के कारण परम शिव तथा सती के सत्त्व को न जानकर आप क्यों रो रहे हैं? आपके महान भाग्य से ही ये सती आपके घर में पुत्री रूप में उत्पन्न हुई हैं. ये सती साक्षात निराकार आदि प्रकृति ही हैं और शिव साक्षात परम पुरुष हैं, इसमें आप लेशमात्र भी संदेह न करें।।3-4।। प्रजापति ! ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवताओं तथा बड़े-बड़े असुरों के द्वारा कठोर तप करने पर भी जो भगवती उन्हें कभी दर्शन नहीं देती हैं, उन्हें आपने पुत्री रूप में प्राप्त किया है. मोह में पड़कर उन सती को बिना जाने आप उनकी निन्दा क्यों कर रहे हैं? निश्चित रूप से उन्हीं महामोहस्वरूपिणी भगवती ने आपको ठगा है।।5-6।।

दक्ष बोले – वे शम्भु यदि जगत के ईश्वर, अनादि और परम पुरुष हैं तो भयंकर रूप तथा तीन नेत्रों वाले उन्हें प्रेतपति (श्मशान) क्यों प्रिय है? और मुने ! वे भिक्षुकरूप में अपने शरीर में भस्म क्यों पोते रहते हैं?।।7½।। 

दधीचि बोले – वे शम्भु पूर्ण, नित्यानन्दस्वरुप तथा सभी ईश्वरों के भी ईश्वर हैं. जो लोग उनकी शरण ग्रहण करते हैं, वे कभी भी दु:ख प्राप्त नहीं करते. वे भगवान शम्भु भिक्षुक हैं – ऎसी दुर्बुद्धि आपकी क्यों हो गई है?।।8-9।। ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता और तत्त्वदर्शी योगिजन भी जिनके परम स्वरूप को देख पाने में समर्थ नहीं होते हैं, आप उन विरूपाक्ष शम्भु की निन्दा क्यों कर रहे हैं? सर्वत्र विचरणशील वे भगवान सदाशिव सभी जगह विराजमान हैं. वे श्मशान में रहें अथवा सुरम्य पुरी में रहें, उन्हें इसमें कोई विशेषता नहीं दिखाई पड़ती है।।10-11½।।

शिवलोक बड़ा ही अपूर्व है. वह ब्रह्मा, विष्णु आदि के लिए भी दुर्लभ है. वैकुण्ठ, ब्रह्मलोक तथा स्वर्ग उस शिवलोक की एक कला के भी तुल्य नहीं हैं. कैलासपुरी देवताओं के लिए भी अत्यन्त दुर्लभ है. अनेक देवताओं से सुशोभित तथा कल्पवृक्षों से युक्त नन्दनवन से घिरी हुई स्वर्ग के अधिपति इन्द्र की पुरी अमरावती भी उस शिवलोक की सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं है।।12-14।। मृत्युलोक में भी वाराणसी नगरी नामक उनकी एक परम रमणीय पुरी है, जो मुक्ति प्रदान करने के कारण “मुक्तिक्षेत्र” कहलाती है. जहाँ ब्रह्मा आदि प्रधान देवता भी मृत्यु की अभिलाषा रखते हैं तो फिर मानव आदि प्राणियों की बात ही क्या? वह परमात्मा शिव की ऎसी दिव्य पुरी है. यह विचार आपकी दुर्बुद्धि का सूचक है कि बिना श्मशान के अन्यत्र कहीं भी उनका ठिकाना नहीं है।।15-।।16 ½।। ऎसे सत्य-स्वरुप त्रिलोकेश्वर देवाधिदेव भगवान सदाशिव और साक्षात ब्रह्मस्वरूपिणी महेश्वरी सती की भी निन्दा आपको अज्ञानवश कभी नहीं करनी चाहिए. वे आपके बड़े भाग्य से ही आपके घर पुत्रीरूप में प्रादुर्भूत हुई हैं।।17-18½।।

श्रीमहादेव जी बोले – इस प्रकार तत्त्वदर्शी मुनि दधीचि के अनेक प्रकार से समझाने पर भी प्रजापति दक्ष ने उन परमेश्वर शिव को असदाचार से रहित नहीं माना और वे बार-बार उन महादेव के प्रति निन्दास्पद वचन बोलते रहे।।19-20।। नारद ! वे प्रजापति दक्ष पुत्री सती को उलाहना देते हुए ऎसा कहकर रोने लगे – हा वत्से ! सति ! पुत्री ! तुम मेरे प्राण के समान हो, मुझे शोकसमुद्र में निमग्न करके मेरा परित्याग कर तुम कहाँ जा रही हो? बहुमूल्य पर्यंक पर शयन करने योग्य सर्वांग सुन्दरी पुत्री ! कुरूप पति के साथ तुम श्मशान भूमि में कैसे रहोगी? ।।21-22½।। उनका यह वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ दधीचि ने अपने हाथ से उनके नेत्रों के आँसू पोंछते हुए तथा प्रिय वचनों से उन्हें सांत्वना प्रदान करते हुए पुन: कहा – ।।23-24।।

दधीचि बोले – ज्ञानियों में श्रेष्ठ प्रजापति! आप मूर्खों की भाँति क्यों रो रहे हैं? महात्मन् ! देवेश्वर शम्भु को समग्र रूप से जानकर भी आपका अज्ञान नष्ट नहीं हुआ, यह बड़े ही आश्चर्य की बात है!।।25।। पृथ्वी पर, जल में, आकाश में और रसातल में जो भी नर तथा नारी रूप प्राणी हैं, वे सभी उन्हीं दोनों (शिव-शिवा) – के रूप में उत्पन्न हैं – ऎसा आप पवित्र मन से समझ लीजिए।।26।। प्रजापति ! आप इन महेश्वर को यथार्थ रूप से साक्षात अनादि परमपुरुष के रूप में जान लीजिए और इन सती को त्रिगुणात्मिका, चिदात्मस्वरूपिणी परात्पर प्रकृति के रूप में ही समझिए।।27।। 

इन परात्पर सती को भाग्यवश अपनी पुत्री रूप में तथा विश्वेश्वर शिव को उनके पति के रूप में प्राप्त करके भी यदि आप अपना सौभाग्य नहीं मानेंगे तो विधाता के द्वारा ठगे गये आपको बहुत सन्ताप होगा।।28।। प्रजापति ! इस सचाई को सुनो, शोक से व्याकुल तथा कल्याण की इच्छा रखने वाले तुम सती को प्रकृति के रूप में तथा शिव को परमपुरुषरूप में जान लो।।29।।      

दक्ष बोले – मुनीश्वर ! आप यह सत्य कह रहे हैं कि मेरी पुत्री सती प्रकृतिरूपा है और शिव ही सनातन पुरुष तथा तीनों लोकों के ईश्वर हैं. मुनिश्रेष्ठ ! यह सुनकर भी मेरी बुद्धि दृढ़तापूर्वक वैसी नहीं हो पा रही है कि महेश्वर से बढ़कर दूसरा देवता नहीं है. सत्य बोलने वाले ऋषिगण भी यद्यपि यही कहते हैं, फिर भी शम्भु ही सर्वश्रेष्ठ देव हैं – ऎसा मेरा निश्चय नहीं है।।30-32।। [मुने !] मैं जिस लिए शिव की निन्दा कर रहा हूँ, उसका कारण सुनिए. पूर्वकाल में जब मेरे पिता ब्रह्माजी ने प्रजाओं की सृष्टि की, तब ग्यारह रुद्रों का प्रादुर्भाव हुआ था. समान शरीर वाले वे सभी रुद्र महात्मा, प्रचण्ड पराक्रमी, भीषण रूप वाले तथा क्रोध के कारण लाल आँखों वाले थे. वे सभी व्याघ्र चर्म धारण किए हुए थे तथा उनके सिरों पर जटाएँ सुशोभित हो रही थी।।33-35।।

वे सभी रुद्र ब्रह्माजी की सृष्टि का लोप करने हेतु तत्पर हो गए. तब सृष्टि के लोप के लिए उद्यत उन रुद्रों को देखकर ब्रह्माजी ने आज्ञा देकर उन्हें शान्त किया और मुझसे जोर देकर कहा – भयंकर कर्म वाले ये रुद्र जिस भी तरह से शान्त हो जाएँ, तुम शीघ्र ही वैसा उपाय करो. पुत्र ! मेरी आज्ञा से तुम इन्हें वश में करो. ब्रह्माजी के इस प्रकार के वचन से भयभीत वे सभी भीषण पराक्रम वाले रुद्र मेरे अधीन हो गाए और उनका बल तथा पराक्रम क्षीण हो गया. महामुने ! उसी समय से मुझमें शिव के प्रति अनादरभाव उत्पन्न हो गया है।।36-39।।

मेरी आज्ञा के अधीन रहने वाले प्रचण्ड पराक्रमी ये रुद्र जिसके अंश से उत्पन्न हैं, मेरे समक्ष उसकी क्या श्रेष्ठता है?।।40।। मेरी पुत्री सती रूप तथा गुण से जिस प्रकार की है, उसे तो आप भली भाँति जानते ही हैं, अब मैं आपसे और क्या कहूँ? क्या मेरी आज्ञा के अधीन रहने वाला शिव उस कन्या के योग्य वर हो सकता है?।।41½।। सत्पात्र को दिया गया दान पुण्य और यश बढ़ाने वाला होता है. इसलिए बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि योग्य पात्र देखकर ही उसे अपनी कन्या प्रदान करे. 

महामुने ! बन्धु-बान्धवों को साथ में लेकर वर के रूप, स्वभाव तथा कुल पर सम्यक विचार करने के बाद ही प्राज्ञ पुरुष को अपनी कन्या सत्पात्र को देनी चाहिए।।42-43½।। इन्हीं सभी बातों पर विचार करके मैंने पूर्व में सती के स्वयंवर में कुल तथा शील से रहित उस शिव को आमन्त्रित नहीं किया था. सुनिए, मेरे मन में जो कुछ भी है, उसे आपको साफ-साफ बता रहा हूँ. जिसके अंश से मेरी आज्ञा के वशीभूत ये महारुद्र उत्पन्न हुए हैं, वह शिव जब तक इनके साथ मेरे पास आता रहेगा तब तक मैं उनके प्रति ईर्ष्या रखूँगा, यह सच-सच कह रहा हूँ. जब ये शम्भु उस विद्वेष का फल प्रदान करने में समर्थ हो जाएँगे, तभी मैं उनकी पूजा करूँगा, यह मेरी दृढ़् प्रतिज्ञा है।।44-47।। 

श्रीमहादेवजी बोले – दक्ष का यह वचन सुनकर वे मुनीश्वर दधीचि अपने मन में सोचने लगे कि भवानी तथा शिव ने इस महामूर्ख प्रजापति दक्ष को निश्चय ही अपनी कृपा से वंचित कर दिया है।।48।। 

जो लोग मन, वाणी और कर्म से सती और महेश्वर का आश्रय ग्रहण करते हैं, वे भी मोह में पड़ जाने के कारण उन्हें भली-भाँति जानने में समर्थ नहीं हो पाते, तब यह मूढ़मति(दक्ष) समझाया जा सकता तो भला इस संसार में कौन मुक्ति प्राप्त नहीं कर लेता?।।50।। मुने ! ऎसा सोचकर और फिर बिना कुछ बोले मुनि दधीचि अपने आश्रम को चले गए. इसके बाद दक्ष प्रजापति दु:ख से बार-बार लंबी-लंबी साँसें लेते हुए अपने भवन में प्रविष्ट हो गए।।51।। 

।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीशिव-नारद-संवाद में “दक्षप्रजापतिविषादवर्णन” नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।