महाभागवत – देवीपुराण – छठा अध्याय 

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इस अध्याय में सती के साथ भगवान शिव का हिमालय पर्वत पर आना, सभी देवों का हिमालय पर विवाहोत्सव में पहुँचना, नन्दी द्वारा हिमालय पर आकर शिव की स्तुति करना और शंकर द्वारा उनको प्रमथाधिपतिपद प्रदान करना आदि बातों का वर्णन है. 

श्रीमहादेव जी बोले – हिमालय के श्रेष्ठ शिखर पर सती के साथ महादेवजी के आ जाने पर सभी देवगण भी वहाँ पहुँच गए. महर्षिगण, देवपत्नियाँ, सर्प, गन्धर्व एवं हजारों किन्नरियाँ वहाँ पहुँच गईं. सखियों के साथ मेरुदुहिता गिरीन्द्रवनिता मेनका तथा मुनिपत्नियाँ भी वहाँ आ गईं. परम आह्लादित देवताओं ने आकाश से पुष्पवृष्टि की. मुख्य अप्सराएँ नाचने लगीं और श्रेष्ठ गन्धर्व गान करने लगे ।।1-4।। सभी स्त्रियाँ समारोहपूर्वक विवाह से संबंधित मांगलिक कृत्य करने लगीं और सभी प्रमथगणों ने प्रसन्न होकर भगवान शंकर एवं सती को प्रणाम किया और वे ताली बजा-बजाकर नाचने तथा गीत गाने लगे।।5½।।

तदनन्तर सभी श्रेष्ठ देवगण सती और देवेश भगवान शंकर को प्रणाम कर तथा उनकी अनुज्ञा प्राप्त कर अपने-अपने स्थान को चले गए. मुनिश्रेष्ठ ! उसी प्रकार अन्य सभी लोग प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्थान को चले गए तथा मेना आदि स्त्रियाँ भी चली गईं।।6-7½।। परम सुन्दरी, कोमलांगी सती को देखकर मेना मन में सोचने लगीं कि जिसकी यह पुत्री है वह माता धन्य है ! मैं प्रतिदिन यहाँ आकर सुमुखी सती की आराधना करके पुत्री-भाव से इसे प्राप्त करने की प्रार्थना करूँगी, इसमें संशय नहीं है।।8-9½।। इस प्रकार गिरिराजपत्नी मेना मन में विचार करके त्रिलोकमाता अम्बिका को कभी भी नहीं भूल पाई. शंकरप्रिया सती के घर प्रतिदिन आकर वे उनके प्रति परम स्नेहभाव से प्रीति बढ़ाने लगीं।।10-11½।। तदनन्तर एक बार बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, ज्ञानी और शिवभक्त नन्दी, जो दक्ष की सेवा में थे, वहाँ आए और उन्होंने भगवान महेश को भूमि पर गिरकर दण्डवत प्रणाम किया।।12-13।।  

वे बोले – देवाधिदेव ! प्रभो ! मैं प्रजापति दक्ष का सेवक और ब्रह्मर्षि दधीचि का शिष्य हूँ, जो आपके प्रभाव को जानने वाले संत हैं. देवेश ! शरणागतवत्सल ! आप मुझे मोहित मत कीजिए. मैं आपको साक्षात परमेश्वर और परमात्मा के रूप में जानता हूँ. मैं सृष्टि, स्थिति और संहारकारिणी भगवती सती को मूल प्रकृति के रूप में जानता हूँ।।14-15½।। इस प्रकार कहकर नन्दी ने भक्तों पर कृपा करने वाले भगवान शंकर का अपनी परम भक्तिपूर्ण गद्गद वाणी से स्तवन किया।।16-17।।

नन्दी बोले – शिव ! आप त्रिलोकी के आदि परम पुरुष हैं और समस्त जगत के सृष्टि, पालन एवं संहारा करने वाले भी आप ही हैं. देवश्रेष्ठ ! वरदायक भवानीपति ! आप ऎश्वर्ययुक्त, युवक, वृद्ध और एकमात्र ब्रह्म हैं।।18।। हिमधवलकान्ति से युक्त, शशि समूह को पराजित करने वाला और अर्धचन्द्र धारण किए, चन्द्रमा के समान पाँच मुखोंवाला सुन्दर आपका स्वरुप अचिन्त्य है. निर्मल नागमणि से सुशोभित सर्परूपी आभूषण को सिर पर धारण करने वाले और ब्रह्मादि देवताओं के द्वारा पूजित युगचरण कमल वाले आपको मैं नमस्कार करता हूँ।।19।। इस पृथ्वी पर जो व्यक्ति निरन्तर भक्ति अथवा अभक्तिपूर्वक भी आपकी नित्य पूजा करते हैं, आपके नामों का संकीर्तन करते हैं और आपके मन्त्र का निरन्तर जप करते हैं, वे आपके चरणों की संनिधि प्राप्त कर निरन्तर स्वर्ग में रमण करते हैं. प्रभो ! पशुपति ! आप देवाधिदेव को छोड़कर दीनों पर दया करने वाला और कौन है?।।20।।

श्रीमहादेवजी बोले – मुने ! नन्दी की ऎसी स्तुति सुनकर भगवान शंकर उससे बोले – नन्दी ! तुम्हारी क्या इच्छा है, माँगो. वह मैं तुम्हें देता हूँ।।21।।

नन्दी ने कहा – जगदीश्वर ! मैं आपका हमेशा निकट रहने वाला दास बना रहूँ और अपनी आँखों से नित्य आपके दर्शन करता रहूँ, यही आपसे याचना करता हूँ।।22।।

शिवजी बोले – वत्स ! जो तुमने माँगा है, निश्चित रूप से वही होगा. अवश्य ही तुम हमेशा मेरे समीप निवास करोगे।।23।। पृथ्वी पर जो मानव इस स्तोत्र से भक्तिपूवक मेरी स्तुति करेंगे, उनका तीनों लोकों में कभी अशुभ नहीं होगा. इस मृत्युलोक में दीर्घकाल तक रहकर वे अन्त में मोक्ष प्राप्त करेंगे।।24।। महामते ! तुम मेरे इन प्रमथगणों के अधिपति होकर मेरे इस शिवलोक में निवास करो, नन्दी ! तुम मेरे प्रिय भक्त हो।।25-26।।

श्रीमहादेव जी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार वर प्राप्त करके भगवान शंकर के प्रभाव से नन्दी शिव के गणों के अधिपति हो गए।।27।।

।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीशिव-नारद-संवाद में “नन्दिकेश्वरप्रमथाधिपत्ववर्णन” नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ।।