अश्लेषा नक्षत्र का उपचार

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शेषनाग को अश्लेषा नक्षत्र का देवता माना गया है इसलिए जन्म नक्षत्र अश्लेषा अगर पीड़ित अथवा अशुभ प्रभाव में है तब नागों का पूजन करना चाहिए. सर्पों को दूध पिलाकर भी इसका पाप प्रभाव कम किया जा सकता है. मतांतर से भगवान विष्णु की पूजा भी कही गई क्योंकि शेषनाग भगवान विष्णु की शैय्या हैं इसलिए इनकी पूजा करके भी इस नक्षत्र के शुभ प्रभाव को बढ़ाया जा सकता है. भगवान शंकर के गले में भी सर्पों की माला सदा पड़ी रहती है इसलिए कुछ विद्वानों का मत है कि भोलेनाथ की पूजा करके भी इस नक्षत्र को शुभ प्रभाव प्रदान किया जा सकता है. भगवान शंकर और विष्णु जी की पूजा नियमित रुप से करने पर पुष्य नक्षत्र अपना पाप प्रभाव निश्चित रुप से खतम कर देगा.

भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र “ऊँ नम: शिवाय” का जाप नियमित रुप से एक माला के रुप में करने से भी व्यक्ति आध्यात्मिक तथा सांसारिक उन्नति कर सकता है. अश्लेषा नक्षत्र के बीज मंत्र “ऊँ गं” का 108 बार जाप करके भी व्यक्ति उन्नति की सीढ़ियाँ चढ़ सकता है चाहे यह उन्नति जीवन के किसी भी क्षेत्र में क्यूँ ना हो.

इस नक्षत्र के पीड़ित होने पर हल्के रंगों का उपयोग करने पर भी यह शुभ फल दे सकता है, जैसे – आसमानी, हल्का पीला अथवा सफेद रंग. इस नक्षत्र को बल प्रदान करने के लिए साँपों की पूजा तो बताई ही गई है साथ ही अगर किसी की सामर्थ्य है तो वह साँप-साँपिन का जोड़ा सोने का बनवाकर उसे प्राण प्रतिष्ठित करवाकर उसकी रोज पूजा कर सकता है. पूजा में कुमकुम या केसर, धूपबत्ती, पुष्प, घी, दीपक, अक्षत आदि का उपयोग करना चाहिए. घी और शक्कर मिलाकर होम करना चाहिए और होम करते हुए अश्लेषा नक्षत्र के वैदिक मंत्र का 108 बार जाप करना चाहिए. यदि होम करना संभव ना हो तब केवल मंत्र का 108 बार जाप प्रतिदिन 108 बार अवश्य करना चाहिए, वैदिक मंत्र है :-

ऊँ नमोस्तु सर्प्पेभ्यो ये के च पृथिवी मनु: ये अन्तरिक्षेदिवितेभ्य: सर्प्पेभ्यो नम:। ऊँ तक्षकेश्वराय नम:।।

 

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