गरुड़ पुराण – तीसरा अध्याय

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गरुड़ उवाच

गरुड़ जी ने कहा – हे केशव ! यम मार्ग की यात्रा पूरी कर के यम के भवन में जाकर पापी किस प्रकार की यातना को भोगता है? वह मुझे बतलाइए।

 

श्रीभगवानुवाच

श्री भगवान बोले – हे विनता के पुत्र गरुड़्! मैं नरक यातना को आदि से अन्त तक कहूँगा, सुनो। मेरे द्वारा नरक का वर्णन किये जाने पर उसे सुनने मात्र से ही तुम काँप उठोगे। हे कश्यप नन्दन ! बहुभीतिपुर के आगे चौवालीस योजन में फैला हुआ धर्मराज का विशाल पुर है। हाहाकार से परिपूर्ण उस पुर को देखकर पापी क्रन्दन करने लगता है। उसके क्रन्दन को सुनकर यमपुर में विचरण करने वाले यम के गण – प्रतिहार (द्वारपाल) – के पास जाकर उस पापी के विषय में बताते हैं। धर्मराज के द्वार पर सर्वदा धर्मध्वज नामक प्रतीहार (द्वारपाल) स्थित रहता है। वह द्वारपाल जाकर चित्रगुप्त से उस प्राणी के शुभ और अशुभ कर्म को बताता है। उसके बाद चित्रगुप्त भी उसके विषय में धर्मराज से निवेदन करते हैं।

हे तार्क्ष्य! जो नास्तिक और महापापी प्राणी हैं,  उन सभी के विषय में धर्मराज यथार्थ रूप से भली भाँति जानते हैं। तो भी वे चित्रगुप्त से उन प्राणियों के पाप के विषय में पूछते हैं और सर्वज्ञ चित्रगुप्त भी श्रवणों से पूछते हैं। श्रवण ब्रह्मा के पुत्र हैं। वे स्वर्ग, पृथ्वी तथा पाताल में विचरण करने वाले तथा दूर से ही सुन एवं जान लेने वाले हैं। उनके नेत्र सुदूर के दृश्यों को भी देख लेने वाले हैं।

श्रवणी नाम की उनकी पृथक-पृथक पत्नियाँ भी उसी प्रकार के स्वरूप वाली हैं अर्थात श्रवणों के समान ही हैं। वे स्त्रियों की सभी प्रकार की चेष्टाओं को तत्वत: जानती हैं। मनुष्य छिपकर अथवा प्रत्यक्ष रूप से जो कुछ करता और कहता है, वह सब मनुष्य के मानसिक, वाचिक और कायिक – सभी प्रकार के शुभ और अशुभ कर्मों को ठीक-ठीक जानते हैं।

मनुष्य और देवताओं के अधिकारी वे श्रवण और श्रवणियाँ सत्यवादी हैं। उनके पास ऎसी शक्ति है, जिसके बल पर वे मनुष्यकृत कर्मों को बतलाते हैं। व्रत, दान और सत्य वचन से जो मनुष्य उन्हें प्रसन्न करता है, उसके प्रति वे सौम्य तथा स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाले हो जाते हैं। वे सत्यवादी श्रवण पापियों के पाप कर्मों को जानकर धर्मराज के सम्मुख यथावत कह देने के कारण पापियों के लिए दु:खदायी हो जाते हैं।

सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, आकाश, भूमि, जल, हृदय, यम, दिन, रात, दोनों संध्याएँ और धर्म – ये सभी मनुष्य के वृत्तान्त को जानते हैं। धर्मराज, चित्रगुप्त, श्रवण और सूर्य आदि मनुष्य के शरीर में स्थित सभी पाप और पुण्यों को पूर्णतया देखते हैं। इस प्रकार पापियों के पाप के विषय में सुनिश्चित जानकारी प्राप्त करके यम उन्हें बुलाकर अपना अत्यन्त भयंकर रूप दिखाते हैं।

वे पापी यम के ऎसे भयंकर रूप को देखते हैं – जो हाथ में दण्ड लिये हुए, बहुत बड़ी काया वाले, भैंसे के ऊपर संस्थित, प्रलयकालीन मेघ के समान आवाज वाले, काजल के पर्वत के समान, बिजली की प्रभाव वाले, आयुधों के कारण भयंकर, बत्तीस भुजाओं वाले, तीन योजन के लम्बे – चौड़े विस्तार वाले, बावली के समान गोल नेत्र वाले, बड़ी-बड़ी दाढ़ो के कारण भयंकर मुख वाले, लाल-लाल आँखों वाले और लम्बी नाक वाले हैं।

मृत्यु और ज्वर आदि से संयुक्त होने के कारण चित्रगुप्त भी भयावह हैं। यम के समान भयानक सभी दूत उनके समीप पापियों को डराने के लिए गरजते रहते हैं। उन चित्रगुप्त को देखकर भयभीत होकर पापी हाहाकार करने लगता है। दान न करने वाला वह पापात्मा काँपता है और बार-बार विलाप करता है। तब चित्रगुप्त यम की आज्ञा से क्रन्दन करते हुए और अपने पाप कर्मों के विषय में सोचते हुए उन सभी प्राणियों से कहते हैं।

अरे पापियों ! दुराचारियों ! अहंकार से दूषितो ! तुम अविवेकियों ने क्यों पाप कमाया है? काम से, क्रोध से तथा पापियों की संगति से जो पाप तुमने किया है, वह दु:ख देने वाला है, फिर हे मूर्खजनों ! तुमने वह पापकर्म क्यों

किया? पूर्वजन्म में तुम लोगों ने जिस प्रकार अत्यन्त हर्षपूर्वक पाप कर्मों को किया है, उसी प्रकार यातना भी भोगनी चाहिए। इस समय यातना भोगने से क्यों पराड्मुख हो रहे हो?

तुम लोगों ने जो बहुत – से पाप किये हैं, वे पाप ही तुम्हारे दु:ख के कारण हैं। इसमें हम लोग कारण नहीं हैं। मूर्ख हो या पण्डित, दरिद्र हो या धनवान और सबल हो या निर्बल – यमराज सभी से समान व्यवहार करने वाले कहे गये हैं। चित्रगुप्त के इस प्रकार के वचनों को सुनकर वे पापी अपने कर्मों के विषय में सोचते हुए निश्चेष्ट होकर चुपचाप बैठ जाते हैं।

धर्मराज भी चोर की भाँति निश्चल बैठे हुए उन पापियों को देखकर उनके पापों का मार्जन करने के लिए यथोचित दण्ड देने की आज्ञा करते हैं। इसके बाद वे निर्दयी दूत उन्हें पीटते हुए कहते हैं – हे पापी ! महान घोर और अत्यन्त भयानक नरकों में चलो। यम के आज्ञाकारी प्रचण्ड और चण्डक आदि नाम वाले दूत एक पाश से उन्हें बाँधकर नरक की ओर ले जाते हैं।

वहाँ जलती हुई अग्नि के समान प्रभा वाला एक विशाल वृक्ष है, जो पाँच योजन में फैला हुआ है तथा एक योजन ऊँचा है। उस वृक्ष में नीचे मुख करके उसे साँकलों से बाँधकर वे दूत पीटते हैं। वहाँ जलते हुए वे रोते हैं, पर वहाँ उनका कोई रक्षक नहीं होता। उसी शाल्मली – वृक्ष में भूख और प्यास से पीड़ित तथा यमदूतों द्वारा पीटे जाते हुए अनेक पापी लटकते रहते हैं। वे आश्रयविहीन पापी अंजलि बाँधकर – ‘हे यमदूतों ! मेरे अपराध को क्षमा कर दो’, ऎसा उन दूतों से निवेदन करते हैं।

बार-बार लोहे की लाठियों, मुद्गरों, भालों और बर्छियों, गदाओं और मूसलों से उन दूतों के द्वारा वे अत्यधिक मारे जाते हैं। मारने से जब वे चेष्टारहित और मूर्छित हो जाते हैं, तब उन निष्चेष्ट पापियों को देखकर यम के दूत कहते हैं। अरे दुराचारियों ! पापियों ! तुम लोगों ने दुराचरण क्यों किया। सुलभ होने वाले भी जल और अन्न का दान कभी क्यों नहीं दिया?

तुम लोगों ने आधा ग्रास भी कभी किसी को नहीं दिया और न ही कुत्ते तथा कौए के लिए बलि ही दी। अतिथि को नमस्कार नहीं किया और पितरों का तर्पण नहीं किया। यमराज तथा चित्रगुप्त का उत्तम ध्यान भी नहीं किया और उनके मन्त्रों का जप नहीं किया, जिससे तुम्हें यह यातना नहीं होती। कभी कोई तीर्थ यात्रा नहीं की, देवताओं की पूजा भी नहीं की। गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी तुमने “हन्तकार” नहीं निकाला।

संतों की सेवा की नहीं, इसलिए अब स्वयं किये गये पाप का फल भोगों।  चूंकि तुम धर्महीन हो, इसलिए तुम्हें बहुत अधिक पीटा जा रहा है। भगवान हरि ही ईश्वर है, वे ही अपराधियों को क्षमा करने में समर्थ हैं, हम तो उन्हीं की आज्ञा से अपराधियों को दण्ड देने वाले हैं। ऎसा कहकर वे दूत निर्दयतापूर्वक उन्हें पीटते हैं और उनसे पीटे जाने के कारण वे जलते हुए अंगार के समान नीचे गिर जाते हैं।

गिरने से उस शाल्मली वृक्ष के पत्तों से उनका शरीर कट जाता है। नीचे गिरे हुए उन प्राणियों को कुत्ते खाते हैं और वे रोते हैं। रोते हुए उन पापियों के मुख में यमदूत धूल भर देते हैं तथा कुछ पापियों को विविध पाशों से बाँधकर मुद्गरों से पीटते हैं। कुछ पापी आरे से काष्ठ की भाँति दो टुकड़ो में किये जाते हैं और कुछ भूमि पर गिराकर कुल्हाड़ी से खण्ड-खण्ड किये जाते हैं।

कुछ को गड्ढे में आधा गाड़कर सिर में बाणों से भेदन किया जाता है। कुछ दूसरे पेरने वाले यन्त्र में डालकर इक्षुदण्ड(गन्ने) – की भाँति पेरे जाते हैं। कुछ को चारों ओर से जलते हुए अंगारों से युक्त उल्मुक (जलती हुई लकड़ी) से ढक करके लौहपिण्ड की भाँति धधकाया जाता है। कुछ को घी के खौलते हुए कड़ाही में, कुछ को तेल के कड़ाहे में तले जाते हुए बड़े की भाँति इधर-उधर चलाया जाता है।

किन्हीं को मतवाले गजेन्द्रों के सम्मुख रास्ते में फेंक दिया जाता है, किन्हीं को हाथ और पैर बाँधकर अधोमुख लटकाया जाता है। किन्हीं को कुएँ में फेंका जाता है, किन्हीं को पर्वतों से गिराया जाता है, कुछ दूसरे कीड़ो से युक्त कुण्डों में डुबो दिये जाते हैं, जहाँ वे कीड़ो के द्वारा व्यथित होते हैं। कुछ पापी वज्र के समान चोंच वाले बड़े-बड़े कौओं, गीधों और मांसभोजी पक्षियों द्वारा शिरो देश में, नेत्र में और मुख में चोंचों से आघात करके नोंचे जाते हैं।

कुछ दूसरे पापियों से ऋण को वापस करने की प्रार्थना करते हुए कहते हैं – ‘मेरा धन दो, मेरा धन दो। यमलोक में मैंने तुम्हें देख लिया है, मेरा धन तुम्हीं ने लिया है’ नरक में इस प्रकार विवाद करते हुए पापियों के अंगों से सड़सियों द्वारा माँस नोचकर यमदूत उन्हें देते हैं। इस प्रकार उन पापियों को सम्यक प्रताड़ित करके यम की आज्ञा से यमदूत खींचकर तामिस्त्र आदि घोर नरकों में फेंक देते हैं।

उस वृक्ष के समीप में ही बहुत दु:खों से परिपूर्ण नरक है, जिनमें प्राप्त होने वाले महान दु:खों का वर्णन वाणी से नहीं किया जा सकता। हे आकाशचारिन गरुड़! नरकों की संख्या चौरासी लाख है, उनमें से अत्यन्त भयंकर और प्रमुख नरकों की संख्या इक्कीस है।

तामिस्त्र, लोहशंकु, महारौरव, शाल्मली, रौरव,कुड्मल, कालसूत्रक, पूतिमृत्तिक, संघात, लोहितोद, सविष, संप्रतापन, महानिरय, काकोल, संजीवन, महापथ, अवीचि, अन्धतामिस्त्र, कुम्भीपाक, सम्प्रतापन तथा तपन – ये इक्कीस नरक हैं\ अनेक प्रकार के पापों का फल इनमें प्राप्त होता है और ये यम के दूतों से अधिष्ठित हैं।

इन नरकों में गिरे हुए मूर्ख, पापी, अधर्मी जीव कल्पपर्यन्त उन-उन नरक-यातनाओं को भोगते हैं। तामिस्त्र और अन्धतामिस्त्र तथा रौरवादि नरकों की जो यातनाएँ हैं, उन्हें स्त्री और पुरुष पारस्परिक संग से निर्मितकर भोगते हैं। इस प्रकार कुटुम्ब का भरण-पोषण करने वाला अथवा केवल अपना पेट भरने वाला भी यहाँ कुटुम्ब और शरीर दोनों को छोड़कर मृत्यु के अनन्तर इस प्रकार का फल भोगता है।

प्राणियों के साथ द्रोह करके भरण-पोषण किये गये अपने स्थूल शरीर को यहीं छोड़कर पापकर्म रूपी पाथेय के साथ पापी अकेला ही अंधकारपूर्ण नरक में जाता है। जिसका द्रव्य चोरी चला गया है ऎसे व्यक्ति की भाँति पापी पुरुष दैव से प्राप्त अधर्मपूर्वक कुटुम्ब पोषण के फल को नरक में आतुर होकर भोगता है।

केवल अधर्म से कुटुम्ब के भरण-पोषण के लिए प्रयत्नशील व्यक्ति अंधकार की पराकाष्ठा अन्धतामिस्त्र नामक नरक में जाता है। मनुष्यलोक के नीचे नरकों की जितनी यातनाएँ हैं, क्रमश: उनका भोग भोगते हुए वह पापी शुद्ध होकर पुन: इस मर्त्यलोक में जन्म पाता है।

।। इस प्रकार गरुड़पुराण के अन्तर्गत सारोद्धार में ‘यमयातनानिरूपण’ नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ।।

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