गरुड़ पुराण – सोलहवाँ अध्याय

मनुष्य शरीर प्राप्त करने की महिमा, धर्माचरण ही मुख्य कर्तव्य, शरीर और संसार की दु:खरूपता तथा नश्वरता, मोक्ष-धर्म-निरूपण   गरुड़

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गरुड़ पुराण – तेरहवाँ अध्याय

अशौचकाल का निर्णय, अशौच में निषिद्ध कर्म, सपिण्डीकरण श्राद्ध, पिण्डमेलन की प्रक्रिया, शय्यादान, पददान तथा गया श्राद्ध की महिमा  

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गरुड़ पुराण – बारहवाँ अध्याय

एकादशाहकृत्य-निरुपण, मृत-शय्यादान, गोदान, घटदान, अष्टमहादान, वृषोत्सर्ग, मध्यमषोडशी, उत्तमषोडशी एवं नारायणबलि   गरुड़ उवाच गरुड़जी ने कहा – हे सुरेश्वर !

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