कार्तिक माह माहात्म्य – ग्यारहवाँ अध्याय

जिसको जप कर जीव, हो भवसागर से पार। ग्यारहवें अध्याय का, ‘कमल’ करे विस्तार।। एक बार सागर पुत्र जलन्धर अपनी

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कार्तिक माह माहात्म्य – दसवाँ अध्याय

मायापति नारायण के, चरणों में सीस नवाय। दसवाँ अध्याय कार्तिक, लिखूं नारायण राय।। राजा पृथु बोले – हे ऋषिश्रेष्ठ नारद

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कार्तिक माह माहात्म्य – आठवाँ अध्याय

जिसकी दया से सरस्वती, भाव रही उपजाय। कार्तिक माहात्म का ‘कमल’ लिखे आठवाँ अध्याय।। नारदजी बोले – अब मैं कार्तिक

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कार्तिक माह माहात्म्य – सातवाँ अध्याय

मंगलकारी श्री हरि का, सच्चा नाम ध्याऊं। कार्तिक मास माहात्म्य का, सातवाँ अध्याय बनाऊँ।। नारद जी ने कहा – हे

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कार्तिक माह माहात्म्य – पांचवाँ अध्याय

प्रभु मुझे सहारा है तेरा, जग के पालनहार। कार्तिक मास माहात्म की, कथा करूँ विस्तार।। राजा पृथु बोले – हे

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