महाकाल शनि मृत्युंजय स्तोत्र
इस स्तोत्र में 11वें श्लोक से 13वें श्लोक तक करन्यास, हृदयन्यास, अंगन्यास बताया गया है, जिसको विस्तार से दिया गया
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इस स्तोत्र में 11वें श्लोक से 13वें श्लोक तक करन्यास, हृदयन्यास, अंगन्यास बताया गया है, जिसको विस्तार से दिया गया
माना जाता है कि जो कोई व्यक्ति शनि मृत्युंजय स्तोत्र का पाठ करता है या सुन लेता है तब उसे
जन्म कुंडली में किसी प्रकार का भौम दोष अथवा मंगल दोष है या मांगलिक दोष बना हुआ है तब उसकी
शिव उवाच श्रृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम् । येन मन्त्रप्रभावेण चण्डिजाप: शुभो भवेत् ।।1।। अर्थ – शिवजी बोले – देवी! सुनो,
श्रीशं कमलपत्राक्षं देवकीनन्दनं हरिम् । सुतसम्प्राप्तये कृष्णं नमामि मधुसूदनम् ।।1।। नमाम्यहं वासुदेवं सुतसम्प्राप्तये हरिम् । यशोदांकगतं बालं गोपालं नन्दनन्दनम् ।।2।।
सुवर्णवर्णसुन्दरं सितैकदन्तबन्धुरं गृहीतपाशकांकुशं वरप्रदाभयप्रदम् । चतुर्भुजं त्रिलोचनं भुजंगमोपवीतिनं प्रफुल्लवारिजासनं भजामि सिन्धुराननम् ।।1।। अर्थ – जो सुवर्ण के समान उज्जवल वर्ण