तुलसीस्तोत्रम्
जगद्धात्रि नमस्तुभ्यं विष्णोश्च प्रियवल्लभे। यतो ब्रह्मादयो देवा: सृष्टिस्थित्यन्तकारिण:।।1।। नमस्तुलसि कल्याणि नमो विष्णुप्रिये शुभे। नमो मोक्षप्रदे देवि नम: सम्पत्प्रदायिके।।2।।
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जगद्धात्रि नमस्तुभ्यं विष्णोश्च प्रियवल्लभे। यतो ब्रह्मादयो देवा: सृष्टिस्थित्यन्तकारिण:।।1।। नमस्तुलसि कल्याणि नमो विष्णुप्रिये शुभे। नमो मोक्षप्रदे देवि नम: सम्पत्प्रदायिके।।2।।
पाठकों की सुविधा के लिए यहाँ हम दो गंगाष्टकम का वर्णन कर रहे हैं – पहला महर्षि वाल्मिकी द्वारा रचित
1) ऊँ श्री अनन्ताय नम: 2) ऊँ श्री आत्मवते नम: 3) ऊँ श्री अद्भुताय नम: 4) ऊँ श्री अव्यक्ताय नम:
1) ऊँ श्री राजीव लोचनाय नम: 2) ऊँ श्री रामाया नम: 3) ऊँ श्री रामभद्राय नम: 4) ऊँ श्री राजेन्द्राय
भीष्म उवाच – Bhishma Uvach इति मतिरुपकल्पिता वितृष्णा भगवति सात्वतपुंगवे विभूम्नि । स्वसुखमुपगते क्वचिद्विहर्तुं प्रकृतिमुपेयुषि यद्भवप्रवाह: ।।1।। त्रिभुवनकमनं तमालवर्णं
1) ऊँ श्री सर्वभूतहराय नम: 2) ऊँ श्री शास्वताय नम: 3) ऊँ श्री शमशानवासिने नम: 4) ऊँ श्री तपस्वने नम: