बिल्वाष्टकम्
बिल्वाष्टकम् में बेल पत्र (बिल्व पत्र) के गुणों के साथ-साथ भगवान शंकर का उसके प्रति प्रेम भी बताया गया है.
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बिल्वाष्टकम् में बेल पत्र (बिल्व पत्र) के गुणों के साथ-साथ भगवान शंकर का उसके प्रति प्रेम भी बताया गया है.
न तातो न माता न बन्धुर्न दाता, न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता। न जाया न विद्या न
मुरारिकायकालिमा ललामवारिधारिणी तृणीकृतत्रिविष्टपा त्रिलोकशोकहारिणी। मनोSनुकूलकूल कुंजपुंजधूतदुर्मदा धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा।।1।। मलापहारिवारिपूरभूरिमण्डितामृता भृशं प्रपातकप्रवंचनातिपण्डितानिशम्। सुनन्दनन्दनांगसंगरागरंजिता हिता। धुनोतु0।।2।। लसत्तरंगसंगधूत
वन्दे पद्ममकरां प्रसन्नवदनां सौभाग्यदां भाग्यदां, हस्ताभ्या-अभयप्रदां मणिगणैर्नानाविधैर्भूषिताम्। भक्ताभीष्टफलप्रदां हरिहर-ब्रह्मादिभि: सेवितां, पाश्वे पंकज-शंख-पद्म-निधिभिर्युक्तां सदा शक्तिभि:।।
मधुराष्टकम में श्याम सलोने कृष्ण भगवान के स्वरुप का चित्रण किया गया, जिसमें उनके सभी अदाओं की व्याख्या की गई
नारद उवाच ऊँ वासुदेवं हृषीकेशं वामनं जलशायिनम्। जनार्दनं हरिं कृष्णं श्रीवक्षं गरुडध्वजम्।। वाराहं पुण्डरीकाक्षं नृसिंहं नरकान्तकम्। अव्यक्तं शाश्वतं विष्णुमनन्तमजमव्ययम्।।