श्रेणी: Indian Mytology
दशमहाविद्या – त्रिपुरभैरवी
क्षीयमान विश्व के अधिष्ठान दक्षिणामूर्ति कालभैरव हैं और उनकी शक्ति ही त्रिपुरभैरवी है। ये ललिता या महात्रिपुरसुन्दरी की रथवाहिनी हैं।
गरुड़ पुराण – पाँचवां अध्याय
गरुड़ उवाच गरुड़ जी ने कहा – हे केशव ! जिस-जिस पाप से जो-जो चिह्न प्राप्त होते हैं और जिन-जिन
काशी-स्तुति
सेइत सहित सनेह देह भरि, कामधेनु कलि कासी। समनि सोक-संताप-पाप-रुज, सकल-सुमंगल-रासी।।1।। अर्थ – इस कलियुग में काशी रुपी कामधेनु का
श्रीसिद्धसरस्वती स्तोत्रम्
दोर्भिर्युक्ताश्चतुर्भि: स्फटिकमणिमयीमक्षमालां दधाना हस्तेनैकेन पद्मं सितमपि च शुकं पुस्तकं चापरेण । या सा कुन्देन्दुशंखस्फटिकमणिनिभा भासमाना समाना सा मे वाग्देवतेयं निवसतु
गरुड़ पुराण – चौथा अध्याय
नरक प्रदान करने वाले पाप कर्म गरुड़ उवाच गरुड़ जी ने कहा – हे केशव ! किन पापों के