काशी-स्तुति

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सेइत सहित सनेह देह भरि, कामधेनु कलि कासी।

समनि सोक-संताप-पाप-रुज, सकल-सुमंगल-रासी।।1।।

अर्थ – इस कलियुग में काशी रुपी कामधेनु का प्रेम सहित जीवन भर सेवन करना चाहिए. यह शोक, सन्ताप, पाप और रोग का नाश करने वाली तथा सब प्रकार के कल्याणों की खानि है.

 

मरजादा चहुँओर चरनबर, सेवत सुरपुर-बासी।

तीरथ सब सुभ अंग रोम सिवलिंग अमित अबिनासी।।2।।

अर्थ – काशी के चारों ओर की सीमा इस कामधेनु के सुन्दर चरण हैं. स्वर्गवासी देवता इसके चरणों की सेवा करते हैं. यहाँ के सब तीर्थस्थान इसके शुभ अंग हैं और नाश रहित अगणित शिवलिंग इसके रोम हैं.

 

अंतरऎन भल, थन फल, बच्छ बेद-बिस्वासी।

गलकंबल बरुना बिभाति जनु, लूम लसति, सरिताSसी।।3।।

अर्थ – अन्तर्गृही (काशी का मध्यभाग) इस कामधेनु का ऎन (गद्दी) है. अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष – ये चारों फल इसके चार थन हैं, वेद शास्त्रों पर विश्वास रखने वाले आस्तिक लोग इसके बछड़े हैं – विश्वासी पुरुषों को ही इसमें निवास करने से मुक्तिरूपी अमृतमय दूध मिलता है, सुन्दर वरुणा नदी इसकी गल-कंबल के समान शोभा बढ़ा रही है और असी नामक नदी पूँछ के रूप में शोभित हो रही है.

 

दंडपानि भैरव बिषान, मलरुचि-खलगन-भयदा-सी।

लोलदिनेस त्रिलोचन लोचन, करनघंट घंटा-सी।।4।।

अर्थ – दण्डधारी भैरव इसके सींग है, पाप में मन रखने वाले दुष्टों को उन सींगों से यह सदा डराती रहती है. लोलार्क (कुण्ड) और त्रिलोचन (एक तीर्थ है) इसके नेत्र हैं तथा कर्णघण्टा नामक तीर्थ इसके गले का घण्टा है.

 

मनिकर्निका बदन-ससि सुंदर, सुरसरि-सुख सुखमा-सी।

स्वारथ परमारथ परिपूरन, पंचकोसि महिमा-सी।।5।।

अर्थ – मणिकर्णिका इसका चन्द्रमा के समान सुन्दर मुख है, गंगा जी से मिलने वाला पाप-ताप-नाशरूपी सुख इसकी शोभा है. भोग और मोक्षरुपी सुखों से परिपूर्ण पंचकोसी की परिक्रमा ही इसकी महिमा है.

 

बिस्वनाथ पालक कृपालुचित, लालति नित गिरिजा-सी।

सिद्धि, सची, सारद पूजहिं मन जोगवति रहति रमा-सी।।6।।

अर्थ – दयालु हृदय विश्वनाथ जी इस कामधेनु का पालन-पोषण करते हैं और पार्वती-सरीखी स्नेहमयी जगज्जनी इस पर सदा प्यार करती रहती हैं, आठों सिद्धियाँ, सरस्वती और इन्द्राणी शची इसका पूजन कती हैं, जगत का पालन करने वाली लक्ष्मी सरीखी इसका रुख देखती रहती हैं.

 

पंचाच्छरी प्रान, मुद माधव, गब्य सुपंचनदा-सी।

ब्रह्म-जीव-सम रामनाम जुग, आखर बिस्व बिकासी।।7।।

अर्थ – “नम: शिवाय: यह पंचाक्षरी मन्त्र ही इसके पाँच प्राण हैं. भगवान विन्दुमाधव ही आनन्द हैं. पंचनदी (पंचगंगा) तीर्थ ही इसके पंचगव्य (दूध, दही, घी, गोमय और गोमूत्र) हैं. यहाँ संसार को प्रकट करने वाले राम-नाम के दो अक्षर ‘रकार’ और ‘मकार’ इसके अधिष्ठाता ब्रह्म और जीव हैं.

 

चारितु चरति करम कुकरम करि, मरत जीवगन घासी।

लहत परमपद पय पावन, जेहि चहत प्रपंच-उदासी।।8।।

अर्थ – यहाँ मरने वाले जीवों का सब सुकर्म और कुकर्म रूपी घास यह चर जाती है, जिससे उनको वही परमपदरूपी पवित्र दूध मिलता है, जिसको संसार के विरक्त महात्मागण चाहा करते हैं.

 

कहत पुरान रची केसव निज क-करतूति कला-सी।

तुलसी बसि हरपुरी राम जपु, जो भयो चहै सुपासी।।9।।

अर्थ – पुराणों में लिखा है कि भगवान विष्णु ने सम्पूर्ण कला लगाकर अपने हाथों से इसकी रचना की है. हे तुलसीदास ! यदि तू सुखी होना चाहता है तो काशी में रहकर श्रीराम-नाम जपा कर.

(विनय-पत्रिका से)

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