राधाषोडशनामस्तोत्रम्
श्रीनारायण उवाच राधा रासेश्वरी रासवासिनी रसिकेश्वरी। कृष्णप्राणाधिका कृष्णप्रिया कृष्णस्वरूपिणी।।1।। कृष्णवामांगसम्भूता परमानन्दरूपिणी। कृष्णा वृन्दावनी वृन्दा वृन्दावनविनोदिनी ।।2।। चन्द्रावली चन्द्रकान्ता
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श्रीनारायण उवाच राधा रासेश्वरी रासवासिनी रसिकेश्वरी। कृष्णप्राणाधिका कृष्णप्रिया कृष्णस्वरूपिणी।।1।। कृष्णवामांगसम्भूता परमानन्दरूपिणी। कृष्णा वृन्दावनी वृन्दा वृन्दावनविनोदिनी ।।2।। चन्द्रावली चन्द्रकान्ता
उद्यद्भानुसहस्त्रकोटिसदृशां केयूरहारोज्ज्वलां विम्बोष्ठीं स्मितदन्तपड़्क्तिरुचिरां पीताम्बरालड़्कृताम्। विष्णुब्रह्मसुरेन्द्रसेवितपदां तत्त्वस्वरूपां शिवां मीनाक्षीं प्रणतोSस्मि सन्ततमहं कारुण्यवारांनिधिम्।।1।। मुक्ताहारलसत्किरीटरुचिरां पूर्णेन्दुवक्त्रप्रभां शिण्जन्नूपुरकिंकिणीमणिधरां पद्मप्रभाभासुराम्। सर्वाभीष्टफलप्रदां गिरिसुतां वाणिरमासेवितां।
1) ऊँ श्री अव्ययायै नम: 2) ऊँ श्री अच्युतायै नम: 3) ऊँ श्री अंशुभालिन्यै नम: 4) ऊँ श्री अपर्णायै नम:
जगद्धात्रि नमस्तुभ्यं विष्णोश्च प्रियवल्लभे। यतो ब्रह्मादयो देवा: सृष्टिस्थित्यन्तकारिण:।।1।। नमस्तुलसि कल्याणि नमो विष्णुप्रिये शुभे। नमो मोक्षप्रदे देवि नम: सम्पत्प्रदायिके।।2।।
पाठकों की सुविधा के लिए यहाँ हम दो गंगाष्टकम का वर्णन कर रहे हैं – पहला महर्षि वाल्मिकी द्वारा रचित
भवानि स्तोतुं त्वां प्रभवति चतुर्भिनं वदनै: प्रजानामीशानस्त्रिपुरमथन: पंचभिरपि। न षड्भि: सेनानीर्दशशतमुखैरप्यहिपति- स्तदान्येषां केषां कथय कथमस्मिन्नवसर:।।1।। घृतक्षीरद्राक्षामधुमधुरिमा कैरपि पदै- र्विशिष्यानाख्येयो