श्रीललिताष्टोत्तरशतनामावलि:
ऊँ ऎं हृीं श्रीं 1) ऊँ ऎँ हृीं श्रीं रजताचलश्रृंगाग्रममध्यस्थायै नमो नम: 2) ऊँ ऎँ हृीं श्रीं हिमाचलमहावंशपावनायै नमो नम:
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ऊँ ऎं हृीं श्रीं 1) ऊँ ऎँ हृीं श्रीं रजताचलश्रृंगाग्रममध्यस्थायै नमो नम: 2) ऊँ ऎँ हृीं श्रीं हिमाचलमहावंशपावनायै नमो नम:
श्री पार्वती चालीसा ।।दोहा।। जय गिरि तनये दक्षजे शंभु प्रिये गुणखानि । गणपति जननी पार्वती अम्बे ! शक्ति ! भवानि
श्री संतोषी माँ चालीसा ।।दोहा।। श्री गणपति पद नाय सिर, धरि हिय शारदा ध्यान । संतोषी माँ की करूं, कीरति
मूल नक्षत्र का देवता भय व मृत्यु की देवी “नृति” को माना गया है. कुछ विद्वान नृति देवी को प्रलंयकारी
श्री तुलसी चालीसा ।।दोहा।। श्री तुलसी महारानी, करूं विनय सिरनाय । जो मम हो संकट विकट, दीजै मात नशाय ।।
।।दोहा।। जय-जय माता शीतला, तुमहिं धरै जो ध्यान । होय विमल शीतल हृदय, विकसै बुद्धि बलज्ञान ।। घट-घट वासी शीतला,