मूल नक्षत्र का उपचार

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मूल नक्षत्र का देवता भय व मृत्यु की देवी “नृति” को माना गया है. कुछ विद्वान नृति देवी को प्रलंयकारी शिव की संहार शक्ति मानते हैं इसलिए जब यह नक्षत्र पीड़ित अथवा अशुभ प्रभाव में होता है तब भगवान शिव की उपासना को अचूक उपाय बताया गया है. इस नक्षत्र के दुष्प्रभाव हटाने के लिए माँ काली की उपासना भी एक अद्भुत उपाय माना गया है. नृति देवी की प्रतिदिन उपासना से भी इस नक्षत्र के दुष्प्रभाव दूर किए जा सकते हैं.

इस नक्षत्र के अशुभ प्रभाव को शुभ में बदलने के लिए गेरुए रंग का उपयोग अच्छा बताया गया है, लाल, काले अथवा सुनहरी रंग का उपयोग भी किया जा सकता है इनसे भी इस नक्षत्र की शुभता में वृद्धि होती है. कई सारे मिले-जुले रंगों का उपयोग भी शुभ फल प्रदान करता है. कुछ विद्वानों का मत है कि मृत्यु का चिन्तन करने से, शून्य की अनुभूति करने से भी मूल नक्षत्र की जो ऊर्जा है उसे रचनात्मक तथा उपयोगी बनाया जा सकता है.

जब चंद्रमा का गोचर मूल नक्षत्र से हो रहा हो तब भगवान शिव की उपासना करने से इस नक्षत्र को अत्यधिक बल प्राप्त होता है. चंद्रमा के मूल नक्षत्र में गोचर के समय माँ दुर्गा अथवा काली की उपासना से भी इस नक्षत्र को बल प्रदान किया जा सकता है.

इस नक्षत्र की शुभता में वृद्धि के लिए मंदार की जड़ (आक अथवा अर्क) को बाजू अथवा गले में ताबीज के रुप में धारण करना चाहिए. जिस दिन चंद्रमा का गोचर मूल नक्षत्र से हो रहा हो उस दिन इस जड़ को ताबीज के रुप में धारण करना चाहिए. इस नक्षत्र के शुभ परिणाम के लिए इसके वैदिक मंत्र की एक माला का जाप होम करते हुए करना चाहिए और होम करना संभव ना हो तब बिना होम के ही एक माला (108 बार) का जाप प्रतिदिन नियम से करना चाहिए, मंत्र है :-

ऊँ मातवे पुत्रं पृथिवी पुरीष्यमग्निगूं स्वेयोनावाभारुषा ।

तां विश्वेदेवर्ऋतुभि संवदान: प्रजापतिर्विश्वकर्मा विमुचतु ऊँ निर्ऋतये नम: ।।

 

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