महाभागवत – देवी पुराण – छियासठवाँ अध्याय
श्रीमहादेवजी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! देववन्दित पितामह ब्रह्माजी ने भगवती गंगा को भगवान् विष्णु के चरणकमल में स्थित जानकर अपने
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श्रीमहादेवजी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! देववन्दित पितामह ब्रह्माजी ने भगवती गंगा को भगवान् विष्णु के चरणकमल में स्थित जानकर अपने
श्रीमहादेवजी बोले – विरोचन पुत्र धर्मात्मा दैत्यराज बलि ने देवराज इंद्र से त्रैलोक्य का राज्य छीन लिया। तब देवमाता अदिति
श्रीनारद जी बोले – परमेश्वर ! आपने कृपापूर्वक महापापनाशक, पुण्यप्रद, धन्य करने वाला और दिव्य आख्यान मुझे सुनाया। मैंने जैसा
श्रीमहादेवजी बोले – कुछ समय बाद पुण्य चुनने वाली योगिनियाँ वहाँ आयीं। उन्होंने उन महापुरुषों से पूछा कि आप किस
श्रीमहादेवजी बोले – नारदजी ! कुछ देर मौन रहकर कमललोचन भगवान् विष्णु ने मीठी वाणी में देवराज इंद्र से कहा
श्रीमहादेव जी बोले – महामते ! युद्ध में दुर्धर्ष वृत्रासुर का संहार करके ऐरावत हाथी पर आरूढ़ होकर सभी देवगणों