
श्रीमहादेवजी बोले – विरोचन पुत्र धर्मात्मा दैत्यराज बलि ने देवराज इंद्र से त्रैलोक्य का राज्य छीन लिया। तब देवमाता अदिति ने अपने पुत्रों का राज्य छिन जाने से दुःखी होकर त्रिलोकीनाथ विष्णु की प्रार्थना की।1-2।। तब प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिए और कहा कि देवमाता ! तुम यथेच्छ वरदान माँग लो, तुम्हारी उग्र तपस्या से संतुष्ट हुआ मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें वह प्रदान करूँगा।।3।।
अदिति बोलीं – भगवन ! यदि आप प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं तो बलि द्वारा अपहृत इंद्र का राज्य उसे लौटा दें।।4।।
श्रीभगवान बोले – प्रह्लाद के वंश में उत्पन्न होने के कारण विरोचनपुत्र बलि मेरे लिए अवध्य है। वह धर्मनिष्ठ, यशस्वी,लोकविख्यात और मेरा भक्त है। इसलिए देवी अदिति ! महर्षि कश्यप से आपके गर्भ से वामनरूप अवतरित होकर मैं छलपूर्वक भिक्षा में त्रिलोकी का राज्य लेकर तुम्हारे पुत्र इंद्र को पुनः दे दूँगा।।5-6।।
श्रीमहादेवजी बोले – इस प्रकार उसे वरदान देकर सर्वलोकाधिपति पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु सहसा अंतर्धान हो गए।।7।। तत्पश्चात भगवान् विष्णु ने दैत्यराज बलि का राज्य अपहरण करने की इच्छा से जन्म लेने के लिए देवमाता अदिति के गर्भ में प्रवेश किया।।8।।
अदिति ने सुन्दर रूप वाले पुत्र वामन को जन्म दिया, जो सभी शुभ लक्षणों से युक्त थे तथा जिनका मुखकमल अत्यन्त मनोहर था।।9।। एक बार ब्राह्मणरूपी वे जनार्दन अन्य ब्राह्मणों के साथ धर्मपरायण महात्मा बलि के पास आये। उन्होंने बलि से तीन पग भूमि की याचना की; जिसे सुनकर राजा बलि ने कहा – द्विज ! इतनी छोटी याचना क्यों करते हो। विप्र ! कोई द्वीप, वर्ष, ग्राम अथवा आधा ग्राम ही क्यों नहीं माँग लेते ! मैं निश्चय ही आपको वह समर्पित कर दूँगा। ब्राह्मणपुत्र ! थोड़ा दान देने से दाता की कीर्ति नष्ट होती है, इसलिए इतना स्वल्प दान आपको देने का मन नहीं करता।।10-13।।
श्रीवामन बोले – महाराज ! आपको इससे क्या प्रयोजन है ? मैंने जो माँगा है, वही मुझे दे दें। इससे आपका कोई अपयश नहीं होगा। महाराज ! मुझे तीन पग भूमिदान का पुण्य आपके लिए अत्यन्त कीर्तिकार होगा, जैसी कीर्ति न किसी की हुई होगी और न भविष्य में होगी।।14-15।।
श्रीमहादेव जी बोले – महात्मा वामन के ऐसे वचन सुनकर सभासदों ने धर्मात्मा महाराज बलि से कहा – ।। 16।।
सभासदों ने कहा – ये ब्राह्मणपुत्र जो माँगते हैं, आप वही दे दें; क्योंकि दान लेनेवाले को संतुष्ट करनेवाला दान ही सफल और कीर्ति बढ़ाने वाला होता है।।17।।
श्रीमहादेव जी बोले – उनकी यह बात सुनकर राजा ने उस ब्राह्मण को तीन पैर के माप की भूमि देने के लिए तिल और कुश हाथ में लिया।।18।। उसी समय दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने दैत्यराज बलि से कहा – महाराज ! क्षणभर ठहरें और मेरी बात सुनें ! ये सामान्य ब्राह्मणपुत्र नहीं है। निश्चय ही ये ब्राह्मणरूपी भगवान विष्णु हैं, जो छल से वामन का रूप धारण करके आपके पास आएं हैं। राजन ! ये बार-बार आपसे जो तीन पग परिमाण की भूमि की याचना कर रहे हैं, वह निश्चय ही इंद्र का कार्य सिद्ध करने हेतु है, ऐसा जानें। यदि आप इन्हें तीन पग परिमाण की भूमि का दान कर देते हैं तो निश्चय ही आपका त्रिलोकी का साम्राज्य ये वामन शीघ्र ही इंद्र को देने के लिए ले जायेंगे।।19-23।।
बलि बोले – भगवान् विष्णु तो हमारे कुलदेवता हैं, गुरो! वे भला त्रिलोकी का राज्य मुझसे छीनकर इंद्र को क्यों देंगे ! ।।23।।
भृगु बोले – महाराज ! देवताओं का कार्य सम्पादन करने में लगे हुए विष्णु के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है। वे कोई भी कठोर कार्य उस निमित्त कर सकते हैं। निश्चित में भगवान् विष्णु ही अदिति के गर्भ से वामनरूप में जन्म लेकर छलपूर्वक आपसे भूमि की याचना कर रहे हैं। इसलिए राजन ! यदि यह त्रिलोकी का साम्राज्य आपको अपने पास रखना है तो आप इन्हें कोई भूमिदान न करें।।24-26।।
बलि बोले – गुरो ! ‘दूँगा’ – ऐसा कहकर अब भला इन्हें दान कैसे न दूँ और यदि ये छलपूर्वक दान लेने आये हैं तो इन्हें भूमि कैसे दूँ? ।।27।।
श्रीमहादेव जी बोले – राजा की यह बात सुनकर दानवों से पूजित शुक्राचार्य ने भूमिदान के लिए उद्यत बलि को पुनः रोका। महामुने ! शुक्राचार्य की बात सुनकर कुछ देर मौन रहकर धर्मात्मा बलि ने अपने मन में दान करने का निश्चय किया और गुरूजी से ऐसा कहा – ।।28-29।।
बलि बोले – गुरो ! यदि भगवान् विष्णु स्वयं छल से वामन का रूप धारण करके मुझसे त्रिलोकी का राज्य माँगें तो इससे बड़ा मेरा क्या सौभाग्य होगा ! उनकी प्रसन्नता के उद्देश्य से मनुष्य जो भी दान करता है, उसका उसे अनंत फल प्राप्त होता है, ब्राह्मणरूप में पधारे उन्हीं वामनरूप विष्णु को यदि मैं त्रिलोकी का दान करूँ तो यह मेरा सौभाग्य होगा।।30-32।।
गुरो ! जो मूढ़मति हैं वे ही भगवान् विष्णु की प्रीति के लिए कर्म नहीं करते, जो उनकी प्रीति हेतु कर्म करते हैं उनकी कभी अधोगति नहीं होती। इसलिए ब्राह्मण वेश में आये इन वामन रूपधारी विष्णु को तीन पग भूमि का दान उनकी प्रसन्नता हेतु मैं अवश्य दूँगा।।33-34।। गुरूजी से इस प्रकार कहकर महाराज बलि ने भगवान् विष्णु की प्रीति को लक्ष्य करके उन परमात्मा को तीन पग भूमि का दान कर दिया।।35।।
मुनिश्रेष्ठ ! उन वामनरूपधारी त्रिविक्रम जगदीश्वर विष्णु ने ‘स्वस्ति’ – ऐसा कहकर विराट रूप धारण कर लिया।।36।। वत्स ! उनका एक पैर ब्रह्माण्ड का अतिक्रमण करता हुआ उससे ऊपर निकला गया। तब उस चरणकमल को प्रजापति ब्रह्मा ने अपने कमण्डलु में स्थित जल से प्रक्षालित किया। जलरूपिणी, सर्वपापनाशिनी गंगा भगवान् विष्णु के चरणकमल को पाकर वहीँ विद्यमान हो गयीं।।37-38।। भगवान् विष्णु ने एक पैर से उसके सिर को छूते हुए धर्मपरायण राजा बलि ने अपराधी की भाँति ऐसा कहा – वत्स ! इस समय तुम्हारा त्रिलोकी का राज्य इंद्र के पास न्यासरूप में रहे और तुम दानवों को साथ लेकर पाताललोक को चले जाओ। आठवें मनु के काल (मन्वन्तर) – में तुम्हें भी इन्द्रपद मिलेगा, तब तुम त्रिलोकी का राज्य पुनः प्राप्त कर लोगे। इसमें संशय नहीं है।।39-41।।
महामुने ! भगवान् विष्णु के ऐसे वचन सुनकर सभी असुरों के साथ बलि उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम करके पाताललोक को चले गए।।42।। जगन्नाथ सुरेश्वर भगवान् विष्णु वैकुण्ठलोक को चले गए और लोकपावनी गंगा उनके चरणों में स्थित हो गई।।43।।
।। इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अंतर्गत वामनावतार के प्रस्ताव में ‘बलिपाताल यात्रा कथन’ नामक पैंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।
