बृहत् पराशर होरा शास्त्र – अथ ग्रहशांतिविवेकाध्याय 

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बृहत् पराशर होरा शास्त्र के 87वें अध्याय में ग्रहों की शान्ति के बारे में बताया गया है कि किन विभिन्न प्रकारों से अनिष्ट ग्रहों की शान्ति की जा सकती है। आइए इनके बारे में विस्तार से जानें। 

 

श्लोक 1,2,3 का अर्थ 

मैत्रेय बोले – ग्रहों के दोष की शान्ति के लिए क्या विधि होती है, हे मुने ! कृपया कहें। इससे मानवों का हित होगा। 

पराशर बोले – सूर्यादि ग्रहों के अधीन ही इस संसार के प्राणियों का समस्त सुख व दुःख है। इसीलिए शांति, लक्ष्मी, शोभा, दृष्टि, आयु, पुष्टि आदि शुभ फलों की कामना से सदैव नव ग्रहों का यज्ञादि करना चाहिए। 

 

मूर्त्ति की धातु – श्लोक 4,5  

पूजा के लिए सूर्य की मूर्त्ति तांबे से, चन्द्रमा की स्फटिक पत्थर से, मंगल की लाल चन्दन से, बुध व गुरु की सोने से, शुक्र की चांदी से, शनि की लोहे से, राहु की सीसा धातु से व केतु की काँसे से मूर्त्ति बनवानी चाहिए।  

अथवा पूर्वोक्त ग्रहों के रंग वाले रेशमी महीन वस्त्र  पर उनकी मूर्त्ति लिखें। यदि इसमें भी समर्थ न हों तो जिस ग्रह की जो दिशा पहले कही है, उसी दिशा में गंध (रोली, चन्दन आदि) से मंडल अर्थात वेदी में लिखें। 

 

ध्यान के लिए ग्रहों का स्वरुप – श्लोक 6 का अर्थ 

ध्यानार्थ या मूर्त्ति निर्माणार्थ सूर्य को कमलासन में स्थित, हाथ में कमल का पुष्प, कमल के समान कान्ति वाले, सात घोड़ों के रथ पर सवार दो हाथों वाला समझें। 

 

श्लोक 7 का अर्थ 

श्वेत वर्ण, श्वेत वस्त्र, दस घोड़ों के रथ पर सवार, सफ़ेद आभूषण, गदा धारण किए हुए, दो हाथ, ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यों (द्विजातियों) में श्रेष्ठ चन्द्रमा है। 

 

श्लोक 8 का अर्थ 

लाल माला, लाल वस्त्र, हाथ में माला, शूल, गदा धारण किए हुए, चार हाथों वाला, मेष पर सवार, वरद मुद्रा में अपना दायां हाथ उठाए हुए मंगल का स्वरुप है।  

 

श्लोक 9 का अर्थ 

पीली माला, पीला वस्त्र, पीले कनेर के फूल के समान रंगत, हाथ में ढाल, तलवार व गदा लिए हुए, चौथी भुजा को वरद मुद्रा में उठाए हुए, सिंह पर सवार बुध का स्वरुप है। 

 

श्लोक 10 का अर्थ 

गुरु पीतवर्ण, चतुर्भुज रूप, शुक्र सफ़ेद वर्ण व चतुर्भुज, दोनों के हाथ में दंड, वरद मुद्रा, हाथ में अक्षमाला, जपमाला एवं कमण्डलु यह गुरु व शुक्र का स्वरुप है। गुरु पीतवर्ण व शुक्र सफ़ेद वर्ण हैं, शेष सब चीजें दोनों के स्वरुप में समान है। 

 

श्लोक 11 का अर्थ 

नीलम की रंगत, हाथ में शूल, गिद्ध की सवारी, वरदमुद्रा, बाण व धनुष हाथ में लिए, शनि का स्वरुप समझना चाहिए।  

 

श्लोक 12 का अर्थ 

डरावना मुख, हाथ में चमड़े की ढाल, तलवार, शेर पर सवार, काला नीला वर्ण राहु का स्वरुप है।  

 

श्लोक 13 का अर्थ 

धुंए के समान रंगत, दो हाथ, हाथ में गदा, बिगड़ा चेहरा, गिद्ध की सवारी, इस रूप में केतुओं का ध्यान या मूर्त्ति निर्माण वरदायक होता है। 

श्लोक 14,15,16 का अर्थ 

सभी ग्रहों को मुकुट धारण किए हुए समझना चाहिए। मूर्त्ति की ऊंचाई अपनी अँगुलियों के नाप से 108 अंगुल अधिकतम होनी चाहिए। यह नाप आदमकद मूर्त्ति का है। ऐसे नाप की मूर्त्तियाँ मंदिर आदि में प्रतिष्ठा के लिए होती हैं। सभी ग्रहों को पूजा में ग्रहों के रंग के अनुसार फूल चढ़ाएँ। उसी  वस्त्र, ग्रह धातु के आभूषण, गंध, दीप, गुग्गुलादि की धूप दें। जिस ग्रह का जो भी प्रिय वस्त्र व भोजन है, उसे वही भक्तिभाव से भरे ह्रदय से अर्पित किया जाना चाहिए। 

 

ग्रहों की मन्त्र जप संख्या – श्लोक 17,18 का अर्थ 

सूर्य का मन्त्र 7,000, चन्द्रमा का 11,000, मंगल का 10,000, बुध का 9,000, गुरु का 19,000, शुक्र का 16,000, शनि का 23,000, राहु का 18,000, केतु का 17,000 मन्त्र जप कराना चाहिए।  

 

ग्रहों की समिधाएं – श्लोक 19,20 का अर्थ  

सूर्य की आक, चन्द्रमा की ढाक, मंगल की खैर, बुध की अपामार्ग, गुरु की पीपल, शुक्र की गूलर, शनि की शमी, राहु की दूर्वा, केतु की कुश समिधाएं हैं। ग्रह हवन में इन्हें प्रयुक्त करें। हवनार्थ शहद या घी लगाकर अथवा दही दूध छिड़की हुई समिधाएं प्रयोग करें। प्रत्येक ग्रह की 108 या 28-28 बार आहुति दें। 

 

भक्ष्य पदार्थ – श्लोक 21 

सूर्य के लिए गुड़ व भात, चंद्र के लिए खीर, मंगल के श्यामाक (चौलाई आदि), बुध के लिए दूध व चावल, गुरु के लिए दही चावल, शुक्र के लिए सुपाच्य अन्न रहित हविष्य, शनि के लिए उड़द या तिलमिश्रित, राहु केतु के लिए कई अनाज मिलाकर या तिल भुने हुए व उड़द की दाल की खिचड़ी आदि खाएं या खिलाएं। 

 

ग्रहो का दान – श्लोक 22 का अर्थ 

सूर्य के लिए गोदान, चंद्र के लिए शंख दान, मंगल के लिए वृषभ दान, बुध के लिए सुवर्णदान, गुरु के लिए वस्त्र दान, शुक्र के लिए घोड़ा दान, शनि के लिए काली गाय का दान, राहु के लिए लोहे की वस्तु का दान, केतु के लिए बकरा या मेष का दान करना चाहिए। 

 

श्लोक 23, 24 का अर्थ 

जिस मनुष्य की कुंडली में जो ग्रह ख़राब, निर्बल व अशुभ फलदायक हो, अनिष्ट स्थान में गया हो, नीचादिगत हो तो उस ग्रह की पूजा करनी चाहिए। इन ग्रहों को ब्रह्मा जी ने वरदान दिया था कि जो इन्हें पूजेगा, ये उसे पूजित व सम्मानित बनाएँगे। मनुष्य की उन्नति, अवनति, हानि लाभ आदि, ग्रहाधीन है, अतः ग्रहों की पूजा अवश्य करनी चाहिए।