
बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अध्याय 86 में महर्षि पराशर ने पूर्व जन्म के विभिन्न शापों के साथ में कुछ शुभ संतान योगों का भी वर्णन किया है और इस तीसरे और अंतिम भाग में हम उन्हीं का उल्लेख कर रहे हैं। आइए जानें :-
विलम्ब से पुत्र योग – श्लोक 116,117,118,119,120 का अर्थ
116) लग्नेश होकर मंगल अपने उच्च में हो, अष्टम में सूर्य शनि हों तथा इन पर शुभ दृष्टि हो।
117) लग्न में शनि, अष्टम में गुरु, द्वादश में मंगल, इनमें से कोई भी शुभ दृष्ट या उच्चगत हो।
118) पंचम में शनि, बुध, गुरु हो, पंचमेश शुभ राशि लग्न में या कहीं भी शुभ भाव में राशि हो।
119) पंचम में राहु, सूर्य, शुक्र, गुरु, शुभ राशि में शुभ दृष्ट हों तथा पंचमेश भी शुभ ग्रह की राशि में गया हो।
120) लग्न में शुभ ग्रह, द्वितीय में पाप ग्रह, तृतीय में पाप ग्रह, पुत्रेश शुभ क्षेत्र में हो।
उपरोक्त पाँचों योगों में विलम्ब से संतान होती है।
दत्तकपुत्र योग – श्लोक 121,122,123,124,125,126 का अर्थ
इन योगों में दत्तक पुत्र होता है अर्थात गोद लिया हुआ या वर्तमान समय में कृत्रिम पुत्र भी हो सकता है।
121) पंचम में मंगल व शनि हों, मिथुन या कन्या लग्न हो, लग्न को बुध देखे या योग करे।
122) पंचम में मिथुन या कन्या राशि हो या मकर या कुम्भ राशि हो, पंचम भाव शनि व गुलिक से युतदृष्ट हो।
123) पंचम में मिथुन या कन्या राशि हो, बुध पंचम भाव पर योग या दृष्टि रखे। अथवा मकर/कुम्भ लग्न में बुध पंचम भाव पर योग दृष्टि करे।
124) सप्तमेश एकादश में, पंचमेश शुभयुक्त एवं पंचम में बुध या शनि हो।
125) पंचमेश शनि युक्त हो, मंगल पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो, लग्नेश बुध के नवांश में हो।
126) पंचमेश नवम में, नवमेश दशम में हो व पंचम पर शनि की दृष्टि हो।
इन योगों में दत्तक पुत्र होता है अर्थात निजी पुत्र न होकर गोद लिया हुआ पुत्र होता है।
श्लोक 127,128,129,130,131 का अर्थ
127) वृष, तुला लग्न में जन्म हो, शुक्र उच्चगत हो, पंचम में शनि हो, गुरु बलवान हो।
128) पंचमेश चन्द्रमा हो, लग्न या पंचम में शनि हो, गुरु बली हो।
129) पंचमेश सूर्य लग्न में हो, शनि बुध पंचम में हो, पंचमेश बली हो।
130) लग्नेश होकर बुध पंचम में हो व मंगल से दृष्ट हो, गुरु एकादश भाव में हो।
131) लग्नेश गुरु होकर पंचम में शनि दृष्ट हो, पंचमेश मेष, वृश्चिक राशि में हो।
इन सब योगों में भी दत्तक पुत्र होता है।
बहुपुत्र योग – श्लोक 132,133,134,135,136,137 का अर्थ
इन योगों में व्यक्ति को कई पुत्र होते हैं। कई से तात्पर्य देश कालानुसार एकाधिक संख्या से है।
132) पंचम में राहु, सूर्य, बुध हो, गुरु शुभयुक्त हो या शुभदृष्ट हो।
133) पंचमेश शुभ राशि में हो, शुभदृष्ट भी हो, गुरु केंद्र में गया हो।
134) लग्नेश पंचम में हो, पंचमेश लग्न में हो, गुरु केंद्र त्रिकोण में हो।
135) पंचम में राहु हो, लेकिन शनि के नवांश में न हो, राहु को शुभ ग्रह देखें।
136) पंचमेश उच्च का हो, लग्नेश शुभयुक्त हो, गुरु भी शुभयुक्त, दृष्ट हो।
137) पंचम में पंचमेश या बृहस्पति शुभदृष्ट हो या शुभयुक्त हो।
उपरोक्त सभी योग बहुपुत्र योग है जो महर्षि द्वारा कहे गए हैं।
श्लोक 138,139,140,141,142,143 का अर्थ
138) गुरु पूर्ण बलवान हो, लग्नेश पंचम में हो, पंचमेश भी बली हो।
139) गुरु वर्गोत्तम नवांश में हो, लग्नेश शुभ ग्रह के नवांश में हो, इन पर पंचमेश की दृष्टि या योग हो।
140) द्वितीयेश पंचम में हो, बलान हो, गुरु वैशेषिकाश में गया हो।
141) पंचमेश उच्चगत हो या लग्नेश व पंचमेश एक दूसरे की राशि में हो या एक-दूसरे पर पूर्ण दृष्टि रखें।
142) पंचमेश का नवांशेश शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो।
143) लग्नेश व पंचमेश केंद्र में शुभयुक्त हों, द्वितीयेश बलवान हो।
श्लोक 144,145 का अर्थ
लग्नेश सप्तम में, सप्तमेश लग्न में व द्वितीयेश लग्न में हो।
सप्तमेश ग्रहयुक्त हो, लग्नेश, द्वितीयेश, पंचमेश की स्थिति नवांश में स्वोच्चादि राशि में हो। ये सब बहुपुत्र योग है। बहुपुत्र योगों की आंशिक घटना होने पर भी पुत्रोत्पत्ति देखी जाती है।
ये उपरोक्त भी बहुपुत्र योग कहे गए हैं।
