
बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अध्याय 86 में महर्षि पराशर ने पूर्व जन्म के शापों का जो फल व्यक्ति विशेष को मिलता है, उन सभी योगों का वर्णन किया है। आइए जानें :-
मैत्रेय बोले – श्लोक 1, 2, 3
आपने पुरुषों व स्त्रियों का अलग-अलग फल कह दिया है। अब मैं आपसे पुत्रहीनता का कारण व उसकी निवृत्ति के उपाय जानना चाहता हूँ। पुत्रहीन व्यक्ति को सद्गति नहीं मिलती, ऐसा शास्त्रों में कहा गया है। अतः कृपया कहें कि पुत्रहीनता किस पाप के कारण होती है। जन्म कुंडली से उस पूर्वकृत पापादि का ज्ञान कैसे होगा? तथा बाधा जानकर उसकी शान्ति कैसे होगी, इत्यादि आप कृपा करके मुझे कहें।
पराशर बोले – श्लोक 4
हे मैत्रेय ! तुमने बहुत ही उत्तम प्रश्न पूछा है। पहले पार्वती जी के पूछने पर भगवान् शंकर ने जो कहा था, वही मैं यथावत तुम्हें कहता हूँ।
पार्वती जी बोली – श्लोक 5
प्रभो ! किस पाप या किस योग में संतान हानि या संतान नाश होता है। संतान रक्षा के लिए कृपा उपाय भी कहें।
शंकर जी बोले – देवि ! मैं तुम्हें संतान हानि के योग व दुर्योगों के फल से बचने के उपाय कहता हूँ।
संतान हानि योग – श्लोक 7, 8
गुरु, लग्नेश, सप्तमेश, पंचमेश ये सारे ही बलहीन हों तो संतान नहीं होती है।
सूर्य, मंगल, राहु, शनि यदि बलवान होकर पुत्रभाव अर्थात पंचम में गए हों तो संतान हानि करते हैं। यदि ये ग्रह निर्बल होकर पंचमस्थ हों तो संतानदायक होते हैं।
शापादि का ज्ञान – श्लोक 9, 10, 11, 12
पूर्व जन्म या इस जन्म में जाने अनजाने सर्पहत्या जनित दोषों से संतान हानि होती है जिनके योग निम्न है :-
9) पंचम में स्थित राहु को मंगल पूर्ण दृष्टि से देखे। अथवा राहु मेष या वृश्चिक में हो।
10) पंचमेश राहु के साथ कहीं भी हो तथा पंचम में शनि हो और शनि को या मंगल को चन्द्रमा देखे या योग करे।
11) संतानकारक अर्थात पंचम कारक गुरु, राहु के साथ हो और पंचमेश निर्बल हो, लग्नेश व मंगल साथ-साथ हों।
श्लोक 13,14,15,16
13) पंचम भाव में मिथुन/कन्या राशि हो, मंगल अपने ही नवांश में हो, लग्न में राहु या गुलिक हो तो संतान हानि होती है।
14) पंचम भाव में मेष/वृश्चिक राशि हो, पंचमेश मंगल,राहु के साथ हो अथवा पंचमेश मंगल से बुध का दृष्टि संबंध हो या योग हो तो संतान हानि।
15) पंचम में सूर्य, मंगल, शनि या राहु, बुध, गुरु एकत्र हों और लग्नेश व पंचमेश निर्बल हो तब भी संतान हानि।
16) लग्नेश व राहु एक साथ हों, पंचमेश व मंगल भी एक साथ हों और गुरु व राहु एक साथ हों तब भी संतान हानि।
उक्त दोष का शान्ति विधान – श्लोक 17,18,19
सर्पशाप की निवृत्ति के लिए नागपूजा अपने-अपने वेद व गृह्यसूत्र से, कुल परंपरा के अनुसार करें। नागराज की मूर्त्ति की प्रतिष्ठा करें। या सोने की नागराज की मूर्त्ति बनवाकर प्रतिदिन पूजा करें। तत्पश्चात गोदान, भूमिदान, तिलदान, सुवर्णदान अपनी सामर्थ्य से करें, तब नागराज की प्रसन्नता से वंश चल जाता है।
पूजा का मन्त्र इस प्रकार है :-
ॐ नमोsस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवी मनु ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्य: सर्पेभ्यो नमः।
इसका कम से कम 10 हजार जप भी करें।
पितृशाप से सुतहानि – श्लोक 20,21,22,23
20) पंचम में सूर्य, तुला राशि में मकर/कुम्भ नवांश में हो तथा पंचम भाव के दोनों ओर पाप ग्रह हों।
21) पंचम में सिंह राशि हो 5 या 9 में सूर्य व पाप ग्रह हों तथा सूर्य पापदृष्ट या पाप मध्य में हो।
22) सिंहगत गुरु हो तथा पंचमेश व सूर्य साथ हों। लग्न या पंचम भाव में पाप ग्रह हों।
23) लग्नेश दुर्बल होकर पंचम में हो, पंचमेश सूर्य युत हो तथा लग्न, पंचम भाव पापयुत हो।
इन सब योगों में पितृशाप के कारण संतान हानि होती है।
श्लोक 24,25,26,27 का अर्थ
24) दशमेश होकर मंगल, पंचमेश से युक्त हो तथा लग्न, पंचम व दशम भाव में पाप ग्रह हों।
25) दशमेश, छठे/आठवें/बारहवें भाव में हो तथा संतानकारक गुरु पाप ग्रह की राशि में हो और लग्नेश, पंचमेश पापयुक्त हों।
26) दशमेश पंचम में या पंचमेश दशम में हो तथा लग्न, पंचम भाव पापयुक्त हों।
27) लग्न, पंचम भाव में किसी भी प्रकार से सूर्य, मंगल व शनि स्थित हों तथा आठवें, बारहवें भाव में राहु गुरु हों।
इन उपरोक्त योगों में भी संतानहीनता होती है।
श्लोक 28,29,30
28) अष्टम भाव में सूर्य, पंचम में शनि व पंचमेश राहु के साथ और लग्न में पाप ग्रह हों।
29) द्वादशेश लग्न में, अष्टमेश पंचम में, दशमेश अष्टम में हों।
30) षष्ठेश पंचम में हो, दशमेश षष्ठ में हो तथा गुरु राहु साथ हों।
इन योगों में भी संतान हानि होती है। (उपरोक्त कुल 11 योगों में संतान हानि होती है।)
पितृ शाप शान्ति का उपाय – श्लोक 31,32,33
31) पितृदोष निवारण हेतु गया में श्राद्ध करें तथा एक हजार या दस हजार ब्राह्मणों को वहाँ भोजन कराएँ।
32) उक्त विधान में असमर्थ हों तो कन्यादान करें व गोदान करें।
33) इस तरह विधानपूर्वक शान्ति करने से पितृशाप से मुक्ति होती है तथा पुत्र-पौत्रादि से वंश की वृद्धि होती है।
मातृशाप से संतान हानि – श्लोक 34,35,36,37,38
34) पंचम भाव में कर्क राशि हो और चन्द्रमा भी नीचगत या पापमध्य में हो और चतुर्थ,पंचम भाव में पाप ग्रह हों।
35) एकादश स्थान में शनि हो, चतुर्थ में पापग्रह हो, पंचम में नीचगत चन्द्रमा हो।
36) पंचमेश 6/8/12 भाव में हो, लग्नेश नीचगत हो, चन्द्रमा पापयुक्त हो।
37) पंचमेश 6/8/12 में हो, चन्द्रमा पाप नवांश में हो, लग्न/पंचम भाव में पाप ग्रह हों।
38) पंचम में कर्क राशि हो, चन्द्रमा शनि, राहु व मंगल से युक्त हो, 5 या 9 भाव में उक्त चन्द्रमा हो।
उपरोक्त इन योगों में मातृशाप से संतान हानि होती है या संतानहीनता होती है।
श्लोक 39,40,41,42 का अर्थ
39) पंचम भाव में मंगल की राशि हो तथा मंगल शनि व राहु एक साथ हों, 1 या 5 भाव में चंद्र व सूर्य हों तो संतान हानि होती है।
40) लग्नेश, पंचमेश षष्ठ में हों, चतुर्थेश अष्टम भाव में हो और अष्टमेश, दशमेश लग्न में हो।
41) षष्ठेश, अष्टमेश लग्न में हो, चतुर्थेश 12वे भाव में हो, पंचम में चंद्र गुरु पापयुक्त हों।
42) लग्न पाप ग्रहों के मध्य गया हो, क्षीण चन्द्रमा सप्तम में हो, राहु व शनि चतुर्थ, पंचम भाव में हो।
श्लोक 43,44,45,46 का अर्थ
43) अष्टमेश पंचम में हो, पंचमेश अष्टम में हो, चन्द्रमा व चतुर्थेश 6,8,12 में हों।
44) कर्क लग्न में मंगल व राहु साथ हों, चन्द्रमा व शनि पंचम में हो।
45) लग्न या पंचम या अष्टम या द्वादश में मंगल, राहु, सूर्य, शनि किसी भी प्रकार से हो। लग्नेश, चतुर्थेश 6/8/12 में हो।
46) बृहस्पति अष्टम में हो तथा मंगल राहु साथ हों, पंचम में शनि व चंद्रमा हो।
इन सभी योगों में भी मातृशाप से संतान हानि या संतानहीनता होती है।
मातृशाप का निवारण – श्लोक 47,48,49,50 का अर्थ
इन मातृशाप योगों में संतान की रक्षा हेतु शान्ति करनी चाहिए। रामेश्वरम में स्नान अथवा एक लाख गायत्री जप कर चांदी के पात्र में प्रतिदिन दूध पिएँ। तत्पश्चात ग्रहों का दान करें एवं ब्राह्मण भोजन कराएं।
अथवा 1008 बार पीपल की विष्णुरूप में पूजा करके परिक्रमा करें। इस प्रकार करने से हे पार्वती ! शापमोक्ष होकर सुपुत्र की प्राप्ति होती है तथा कुल-वृद्धि होती है।
